Apr
23

बीड़ी

बीड़ी
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Garhwali Satire by Narendra Kathait
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इन पक्कू नि बतलै सकदाँ कि ‘हुक्का अर् चीलम’ से पैली बीड़ी छै कि नी छै। पर हुक्का अर चिलामिन् बि बीड़्यू क्य बिगाड़ दे? आज बि हुक्का अर चीलाम्या दबदबा बीच बीड़्यू रुतबा कम नी ह्वे। बीड़ी, गरीब-अमीर हर कैकि, करबट मा बैठ जांदि। बीड़ी तैं कामचोर, बग्त कटणू हत्यार बणांैदन्। पर ठुकरयां अर लाचार लोग ब्वल्दन् कि बीड़्या सारा पर लम्बी रात बि कटे जांदि।
सुदामा प्रसाद पे्रमी जी, बीड़ी नौ कि एक कबिता मा लेख्दन ‘जुुगराज रयां तुम मेरी बीड़्यूं, तुमन सैरी रात कटैनी! एक का बाद हैंकि फंूकी, अपणा मन का भाव जगेनी’! पर बीड़्या भरोंसा पर अपड़ा मना भाव हर क्वी नि जगै सक्दु। अपड़ा मना भाव जगौणू तैं बीड़ी तैं समझुणू जरुरी च।
दुन्या मा, द्वी मनखी बि एक जना कख छन? हिन्दुवों देखा त् बडि़ जाति-छुटी जाति, मुसळमनू मा सिया-सुन्नी, सिखू मा मोना-केसधारी, इसायूं मा कैथोलिक अर प्रोटैस्टैंट। बीड़ी मा बि मसालु एक च, रंग-रूप बि एक, पर बीड़्या पैथर खाण-कमोण वळों कि अकड़ैस अलग-अलग छन। जन्कि, छोटा भाई-जेठा भाई, घोड़ा छाप बीड़ी, टेलीफून बीड़ी, पाँच सौ एक, पाँच सौ द्वी बीड़ी। छोटु भै अर बड़ा भै, नौ कि बीड़ी त् हमारि समझ मा ऐगि। किलैकि, छोटु भै अर बड़ा भै बीड़ी सुलगौंद, हमुन् कै द्यख्नि। कै बार इन बि देखी कि ‘जेठा भैन्’ ज्वा बीड़ी प्येकि फुंड चुटै, ‘छुट्टा भैन्’ वी बीड़्यू टुड्डा प्येकि, अपड़ी जिकुड़ी तीस बुझै। हमतैं क्य, कै तैं बि यिं बात पर बिस्वास नि होण कि गणेश जीन् कबि लुकाँ य ढकाँ बि बीड़ी प्ये होवु। पर एक गणेश बीड़ी वूंको नौ लेकि बि खूब धुवाँ उडोणी च।
खादी सूणी तैं, खाद्यू लम्बू कुरता-पैजामु, आँख्यू मा रिटण लग बैठ जांदु। पर खादी नौ की बीड़ी बि च। एक दिन हमुन् एक पनवडि़ पूछी- ‘दीदा! यिं बीड़्यू नौ, ‘खादी बीड़ी’ किलै रखे ग्ये ह्वलु’? वेन उल्टाँ पूछी- ‘खाद्यू मतलब तुम क्या बिंग्यां’? हमुन् जबाब दे-‘खादी यनिकि, सस्ती-मस्ती चीज क्या’। ताँ पर हमतैं सुण्ण प्वडि़- ‘बस्स! इलै हि, यिं बीड्यू नौ खादी च। जथगा सस्ती च, वाँं से जादा वाँ मा मस्ती च’।
क्वी ब्वल्दू ‘टेलीफून बीड़ी’ मा बात हि कुछ हौर च। क्वी ब्वल्दू तौं ‘घोड़ा छाप बीड़ी’ प्येकि मजा नि औंदु। एक आद हमुन् परदेस जाण वळांे कु इन ब्वल्दू बि सुणी ‘यार भुला इना सुणदि! इख या… ‘कामिनी बीड़ी’ नि मिल्दी। अगिल दौं जब घौर ऐली त् एक ‘बुरुस’ कामिनी बीड़्यू लै जै वा… टक्क लग्येकि।
(बक्कि फेर कबि)

Copyright@ Narendra Kathait

Apr
23

गौं

गौं
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(गढ़वाली भाषा की शब्द सम्पदा से गांव की तस्वीर)
Villages from Garhwali language vocbullary
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By Narendra Kathait
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गौं फकत एक जगौ नौ नी होंदू। धारा-पन्द्यारा, ओडा-भीटा, उखड़ी -सेरा अर मल्ली-तल्ली सारौ नौ बि गौं नी होंदू। गौं सि पैली जंै चीजौ नौ सबसि पैली औंदू, वो क्वी न क्वी एक मवासू होंदू। वो मवासू तैं जगा मा अपड़ि मौ बणौंदू। फेर वीं मौ की द्वी मौ, द्वी का तीन, तीनै छै, छै कि नौ अर इनि कयि मवासूं कु एक गौं ह्वे जांदू। पर कुल मिलैकि सौ कि नौ , जब मौ च त तब गौं । निथ्र बिगर मौ कु न क्वी गौं ह्वे सक्दू अर न बिगर गौं कि क्वी मौ। मौ बढ़दि-बढ़दि जब कै मौ कु तैं वे गौं मा घस्ण-बस्णू तैं जगा नी रै जांदि त वा मौ कैं हैंकि जगा बसागतौ चल जांदि। वीं जगा मा वा मौ बि एका द्वी, द्वी का चार, चारा-आठ अर देख्द-देख्द एक हैंकु नयू गौं बसै देंदि। अर इनि होंद-कर्द अपड़ि मौ बणौणू क्वी बि मवासू एक गौं लांघी हैंका गौं, एक पट्टी बिटि हैंकि पट्टी अर पट्यूं बिटि परगनौं तक सर्कि-सर्की अपड़ि झोळी -तुमड़ी, अपड़ि बोल चाल, अर अपड़ा रिति-रिवाज बि उकरी ली जांदि।
गौं मा मौ नौ छन चा सौ, सबसि पैली यि पूछे जांदू – क्या च गौं कु नौ? यि जरुरी नी कि कै गौं कु नौ, कै मौ का नौ पर ह्वलु! गौं कु नौ किरमोळी, पुरमुसी, भुतनीसि बि ह्वे सक्दू। ‘रैं गौं’ का नजीक जैकि हमुन एका मनखी तैं पूछी- भैजी ये गौं कु नौ ‘रैं गौं’ किलै प्वड़ि? वेन जबाब दे- भुला! हमारु क्वी पुराणू बल, ए गौं मा ऐ छौ, वेकु यख मन लगी अर वू इक्खि रै बस ग्या। इक्खि रै बस ग्या त गौं कु नौ बि ‘रैं गौं’ प्वड़ ग्या।
खैर यिं बात तैं हम बि मणदां कि बिगर बातौ कै बि गौं कु नौ नी प्वड़ि। ब्वेन जोड़ी त गौं कु नौ बैंज्वड़ि, ब्वेन गोड़ी त बैंग्वड़ि, उज्याड़ खयेगि त उज्याड़ि। इन्नि घिंडवड़ा, सुंगुरगदन्या, मरच्वड़ा, कंडी गौं, कुखुड़ गौं, मसण गौं का नौ मा बि कुछ न कुछ जरूर ह्वलू। अलग-बगला कुछ गौं का नौ त भै- भयूं का सि लग्दन। जन्कि कोट-कोटसड़ा, घुन्न्ना-पसीणा, सीकू-भैंस्वड़ा । यूं गौं अर वूंका नौ का बीच खूनौ सि रिस्ता लग्दू। कयि गौं मा त मौ, नौ छन चा सौ, गौं कु नौ हि रख दिंदन- नौ गौं। सैद, इनि क्वी पट्टी-परगना नी जख एक ना एक गौं कु नौ ‘नौ गौं’ नी। पर सब्बि गौं, ‘नौ गौं’ नीन्।
पैली बाटा फुण्ड क्वी बि पूछ देंदू छौ- भुला कै गौं कु? फट जबाब तयार रौंदू छौ- फलाणा गौं कु। ये जबाब देण पर हैंकु जरुरी सि सवाल पूछै जांदू छौ – कैं मौ कु? यु बि मुख जुबानी सि याद रौंदू छौ – फलाणी मौं कु। इथगा ब्वन पर पुछुण वळै आँख्यूं मा वीं मौ अर वे गौं कि सर्रा तस्वीर सि गर्र घूम जांदि छै। फेर त ब्वन बचल्योणौ एक तार सि जुड़ जांदू छौ । चा वू पुछुण वळू कख्यो बि, किलै नी रै हो। जन्कि, अरे! इना सुणा दि वे गौं कु त वू बि त छौ। अजक्याळ वू कख ह्वलू?
गौं मा जु कुछ बि छौ वो सौब कैदा मा बन्ध्यूं छौ। कैदा सि भैर क्वी नी जांदम छौ। गौं कि सीमा मा कानून त कबि-कबार औंदू छौ। एक न एक छुटा नौनै किलकार्यू नौ गौं छौ। गौं मा एक नागरजा, एक नरसिंग, एक देब्यू थान होंदू छौ। एक औजी मौ, एक ल्वार मौ बि जरुर होंदू छौ। सजड़ाऽ उंद भ्वर्यूं तमाखू क्वी भेद-भौ नि कर्दू छौ। द्यब्तौं छोड़ि ‘आदेस’ देणै बि क्वी हिकमत नी कर्दू छौ। क्वी कैकु गाक नी छौ। हर क्वी अपड़ा काम मा सल्ली अर अपड़ि मरज्यू मालिक छौ। बक्त पर मौ मदद अर धै कु नौ बि गौं छौ। गौं का नजीक बजारै जगा झपन्याळू बौण छौ।
गौं मा क्वी खास अपड़ा छौ चा नी छौ पर गौं कु लाटू-कालू बि अपड़ा छौ। गौं मा खेती पाती समाळ्नू तैं बल्दी बल्द नी होंदा छा। घर गिरस्थ्या काम मा हाथ बंटौणू तैं गोर- बखरा बि होंदा छा। गौं मा एक द्वी हळ्या, एक द्वी ग्वेर, एक द्वी गितेर, एक द्वी मरखोड्या सांड, एक द्वी गळया बळद, एक आत बोड़, द्वी चार बाछी, दस-बीस गौड़ी, पन्द्रा-बीस भैंसा, एक द्वी लेंडी कुकुर अर एक आत खदोळा कुकुर त होंदै होंदा छा। पर गौं मा बारा मौ अर कुकुर अठारा कबि नी ह्वेनि। या बि क्वी कम बात नी छै । एक बात हौर, उड्यार अर खन्द्वार बिटि च्यूंण वळा पाण्या धारौ तैं ‘पणधारु’ ब्वल्ये जांद। पर पंद्यारु एक इनि चीज च जु गौं का बीच साफ पाणी छळकौंदू नजर औंदू छौ।
गौं कि किस्मत मा झणी कना गरुड़ रिटनी कि लोगुन मौ बणौणू तैं गौं छोड़ देनी। मौ बण गेनी पर लोग गौं तब बि नी ऐनी। कुछ अज्यूं बि घंघतोळ मा छन कि गौं मा रौं कि नी रौं। पर इन क्वी नी ब्वनू कि चा कुछ बि ह्वे जौ मी गौं छोड़ी नी जौं। पैली बड़ी मौ जाणी फेर वीं मौ का पैथर छुटी मौ। कै बि गौं मा मौ एक छै चा सौ, पर गौं मा क्वी न क्वी त छैं छौ। अब त एक-एक कैकि खाली ह्वे ग्येनि, गौं का गौं।
एक दिन हमारा गौं कि एक मौ कु सबसि दानू मनखी भाभर मा बखरौं चरौंद मिल ग्या। रमारुम्या बादा हमुन पूछी -भैजी! क्य अपड़ा गौं याद नी औणू? वेन जबाब दे- अरे भुला! अपड़ा गौं कै तैं याद नी औलू? एक दौं गौं जाणू पैटी बि छौं पर अधबाटा मा जैकि लौट ग्यों। हमुन पूछी- अधबाटा मा जैकी किलै लौट्यां? वेन बोली- किलै त वूलै लौट्यों अरे! घंघतोळ मा प्वड़ ग्यों कि गौं जौं कि नी जौं? हमुन फेर पूछी- तुम घंघतोळ मा किलै प्वड़यां? दानन् बोली- ब्यटा! एक तिरपां ‘कूंडी’ छौ अर हैंकि तिरपां ‘पाबौ’। घंघतोळ मा प्वड़ ग्यों कि पैली कूंड़ी जौं कि पाबौ? कूंडी मा द्यब्तौ थान अर पाबौ मा रजौ दरबार लग्यूं रौंदू छौ। पैली कूंडी जांदू त रजा नरक्ये जांदू अर पैली पाबौ जांदू त द्यब्तौ असगार खांदू। इलै अधबाटा मा जैकी बि लौट ग्यों।
हमुन् बोली- भैजी! अब न रजा रयूं न द्यब्तौ कि डौर-भौर। चुचैं! अब त ऐ ल्या धौं अपड़ा गौं ।

Copyright@ Narendra Kathait

Apr
23

दूधौ पराण

दूधौ पराण
Satire by Narendra Kathait

दूधौ पराण त् वे दिन हि खट्टू ह्वे ग्ये छौ जै दिन ‘दै’ जमौणू रख्येे.’
दूधै हमेसा कुगत ह्वे। ‘दूध’ सांजी ‘दै ’ जमी, दै कि छाँछ छुळे त् ‘नौण’ निकळि। नौण फूकी ‘घ्यू’ बणी। चट्वा लोग्वा बीच घ्यू कु स्वाद फैली त् घ्यू कि कीमत बढ़ी । तैं बढ़ीं कीमतन् दूधौ स्वाद दब्ये दे। पर अज्यूं तलक बि, कै माई का लालन् इन नि बोली, कि तै ‘घ्यू’ पर ‘दूधै’ कीमत बि दौं पर लगीं छ।
भैजी! दूधौ पराण त् वे दिनी खट्टू ह्वे ग्ये छौ जै दिन ‘दै’ जमाणू रख्येे। पर जमीं दै तैं बि मनखी कतोळी झणि क्य खुजाण चाणू छौ। दै पर्या उन्द खणेकि मन्खिन् रौड्यू बोली- ढूंढ ? तंैन उल्टां फरकी पूछी- क्य ढुंढ़ुण? पर बिना बतलयां मनखी रौड़ि तैं बार-बार गुर्त्याणू रै- ‘ढूंढ़! ढूंढ़!’ वा पुछणी राई- ‘क्य ढुढु़ण?’ बिचारि पर्या उन्द मनख्या हथू पर नच्दि रैगी। पर हंैंकै कांधिं मा बन्दूक रखी मनखी तैं क्य मिलुण छौ। आखिर दौं मन्खिन् थकी हारी सुसकरा भरि आवाज निकाळी- ‘छाँछ’ छुळेगी।
पर्या उन्द निरभै खट्टा पाण्या बीच नौ रखणू क्वी चीज निकळी त् मन्खिन नौ रखी ‘नौण’। छाँछ छुळदि दौं मनखी अगर ताकतै जगा दिमाग बि लगान्दु, त् ह्वे सक्दू छौ, नौ रतन न् सै त् द्वी-चार कौड़ी जरुर निकळ्दि। पर सब्यून् बोली नौण बरोबर क्वी चीज नी।
कुछ टैम तलक नौणौ बोलबाला रै। पर नौणै चिफलैस जादा दिन नि चली। जब मनखी तैं नौण सि बिगळछाण ह्वे त् वेन नौण भवसागर मा तपौण सुरु कर दे। हमुन् क्य सब्यून् देखी तपौन्द दौं नौण पर चिफलैसा तिड़का उठणा-दबणा रैनी पर आखिर दौंनौण पिघळि हि छ। पर नौणै चिफलैस प्येकि ज्वा चीज निकळी वा दिखण लैक छै। इनू बहुरुप्या मन्खिन् अज्यूं तलक नि देखी छौ। मौसम देखी तैन सकल बदळ्न सुरू कर दे। गरम देखी पिघळ जावु अर ठण्डा देखी जम जावू। जन्कि गंगा दगड़ा गंगादास अर् जमुना दगड़ा जमुनादास। मनखी यीं चीजो जन-कन नौ नि रखण चाणू छौ। खोळा-खोळौं ‘कमोळी’ पर नचैकि मन्खिन् पुछुण सुरु करी- भयूं! बता धौं क्य नौ रखला? जैन बि तारिफ सूणी वेनी बोली- माण ग्यां ब्यट्टा! येन प्ये ब्वेकु दूध। नौ पड़ी ‘घ्यू’।
अब चर्रि तिरपां घ्यू कि चराचरी छै। जरा-जरा करी सब्यूं पर घ्यू कि संगतौ असर प्वड़ण बैठी। जु पैली एक गफ्फा खाणू छौ वू र्वट्टि चबौण बैठी। जु र्वट्टि खाणू छौ वु कुण्डी चट कन बैठी। कुठार- कुन्नों की बरकत हर्चिगी। जु घुण्या अन्न पौन-पंक्ष्यूं कु छुट्यूं रौन्दु छौ, वे अन्न मनखी उकरी लौण बैठी। मन्खिन् घ्यूकि भगलोणिम् ‘गळा-गळा तक अन्न ठूंसी अन्नै असन्द गाड़ दे’। पर प्वटगि भ्वरेणा बाद बि मनखी ‘धीत’ नि भ्वरे।
जै मनखी पैली दूध प्येकि छाळि बाच छै वु गरगुरू रौण बैठी। कामा थुपड़ों का ऐंच कुम्भकरण सियां दिखेण लग गेनी। राबण अपणा जूँगो पर घ्यू कि मालिस कर्दू दिख्येे। मनखी घ्यू सूँघैकि अपड़ा पित्रू सान्त कन बैठी। मन्खिन् ‘द्यू’ सि लेकी ‘धुपणा’ तक घ्यू घुसै दे।
अब सब्बि कागजू पर घ्यू बैठ्यंू दिख्येन्दु। योजनो मा घ्यू टपकुदू। दै की जलड़यूं उंद मट्ठा डाळी घ्यू ‘नेता’ बण गी। किताब्यूं मा घ्यून् आखर लिखण सुरु कर यालिन। आज जख देखा घ्यू कि चराचरी छ। घ्यू डाॅंगधर, घ्यू इंजीनैर, घ्यू प्रधान, घ्यू सौकार, घ्यू ठिकादार, घ्यू गुरु, घ्यू चेला।
‘लछमी’ घ्यू का कब्जा मा छ अर् ‘दूध’ बिधवा पिन्सन पर गुजारु चलाणी छ। पर हे लोळा करमकोढ़ी घ्यू! दूध नि होन्द त् तू कख बिटि होन्दि।
कोख्यू दुःख दर्द अज्यूं तलक बि कैन नि पछाणि।

Copyright@ Narendra Kathait

Apr
23

अनुज ‘घंजीर’ के ‘व्यंग्य का नंग’ प्रसंग पर ‘नंग’ का रंग ढ़ग

अनुज ‘घंजीर’ के ‘व्यंग्य का नंग’ प्रसंग पर ‘नंग’ का रंग ढ़ग
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Garhwali Satire by Narendra Kathait
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‘नंग’, सीधु हमारु ‘अंग’ नी, अंगौ ‘अंग’ च।
‘दंत्वी’ हद, खबड़ा तक अर ‘नंग्वी’ अंग्ळ्यूं का ‘पोर्यूं’ तक। ब्वनो मतबल यो च कि दाँत अर नंग, द्वी इन्नी चीज छन, जु हद से जादा बढ़ीं, कुस्वाणि लग्दन्। खबडा नंग्येकि, भैर अयां दाँत, कख छा भला। अंग्ळ्यूं कि पोर्यूं सि ऐथर बढ़्यां नंगै बि इज्जत नि रै जांदि। पर याँ मा खबड़ा अर अंग्ळ्यूं तैं दोष देणु ठीक नी। थुड़ा टोका-टाकि कैकि त् दांत खबड़ा भित्र, टप्प टुपरे जंदन्। पर नंग्वा, नाक मा त् सरम नौ कि क्वी चीज छयीं नी।
नंगू, एक हि रोणू च कि मनखी तौं तैं अंगुळों का ऐथर नि बढ़्ण देंदन्। पर अंगुळौं पर नंगू इन्नौ इल्जाम लगौणु, हम तैं जमि नी। किलैकि हम त् अपड़ि आँख्यूंन् द्यखणा छां कि अंग्ळ्यूंन् त् तौंकु तैं, कै दौं बोल यालि कि जा, जख तक तुमारि मर्जि औणि, बढ़ ल्या। पर कै काम औण तनु बढ़यूं? नंग ऐथर त् बढ़ जंदन् पर बढ़ी तैं न त् तौं पैथरै सुद्ध-बुद्ध रौंदि अर् न् ऐथर तौंकि क्वी पूछ होंदि। क्वी सुद्दि थुड़ि बोलगि कि ‘हद से जादा, क्वी बि चीज कख छै भलि? टंगड़ि उथगि तलक फैलावा, जथगा तलके चदरी मिलीं’। कै गरन्थ मा इन बि पढ़ण मा ऐ- ‘स्थान भ्रष्टा न शोभन्ति-दंता, केशा, नखा’।
बढ़्यां नंग्वी, हरकत देखी, कै बार, अंगुळा गरम ह्वे् जंदन्। गरम होणै बात बि छयिं च। क्य अंगुळौंन्, इन्नै-उन्नै नि फरकुणू? य अंगुळौंन्, काम धंधा नि कन्नू। नंग्वी इन्नी हरकत देखी, एक दिन, एक अंगुळू, अपड़ा बरोबर पर खड़ा, हैंका अंगुळा मा गरम ह्वेकि ब्वनो छौ कि ‘भैजी! यूं बढ़्यां नंगून् त् हमारि नाक मा दम्म कर्यालि। एक दिन, जरा बग्त निकाळा दि! सब्बि मिलि-जुली करा छुट्टि। गंदगी, देखा दि! छिः लोळा निरभागि! आखिर… य दिक्कत, हम मद्दि कै एकै त् छ नी, परेसनी सब्यूं तैं च उठौण प्वड़णि। न क्वी चीज अंक्वे कैकि पकडे़णी न् अंक्वे कैकि खयेंणी। यूंका चक्कर मा अपड़ि बि नहेंणी-धुयेंणी नी होणी। उल्टाँ ऐंच वळों कि टुक्वे हमतैं खाण प्वड़दि’।
इथगा सूणी तैं, हैंका अंगुळौ जबाब छौ कि ‘दिदा! त्यरु ब्वनो बिल्कुल सै च! यूं बढ़्यां नंगून्, हमतैं सदानि टुक्वे खलायि। हमारा बचपना मा बि जब यि हद से ऐथर बढ़्यां रैनी त् हमारि ब्वे भग्यनिन्, सयाणौं कि गाळि खैनी। सब्यूंन् हमारि ब्वे खुण्यूं बोलि कि ‘स्या लापबाह च हमारि परबरिस पर ध्यान नी देणी’।
थुड़ा बड़ा होण पर हम बड़ौं कि टुक्वे खाणा छां कि ‘कैन हमतैं तमीज सिखलायि नी’। यूं बढ़्यां, नंग्वी त्…ऐसी-तैसी’। पर झूठी बात! अपड़ा बढ़्यां नंग्वी, ऐसी-तैसी, क्वी नि कर्दू। बढ़्या नंगू तैं मनखी, देखी भाळि कटदू। कै बार, बड़ा पिरेम भौ से मनखी, अपड़ा दांतून् बि नंगू कुतुर्नु रौंदु। नंगू तैं पता च अपड़ा नंगू दगड़ा जोर-जबरदस्ती क्वी नी कर्दू। हम बि पता च कि ‘नंग’, सीधु हमारु ‘अंग’ नी, अंगौ ‘अंग’ च। नंगै त पिड़ा पचायीं च पर जै अंगौ नंग समाळ्यूं च वे पर त् पिड़ा छैं च।
वुन त् नंगू तैं, हद से अगनै बढ़ी तैं मिलि बि क्या? इन त् छ नी कि अंगुठा वळा नंगै इज्जत, बढ़ी तैं करअंगुळा नंग से जादा ह्वे ग्ये होवु। य बड़ि अंगळ्या मुंड मा, कैन हीरा-मोत्यूं कु मुकुट धार दे होवु। य बढ़ी तैं क्वी नंग, सीधा स्वर्ग चल ग्ये होवु। बढ़्यां नग्वी इज्जत बि तब हि तक च जब तक तौंकि पकड़ अंगळ्यूं का मासा तक च। मासा से ऐथर बढ़्यां नंगू मा, मासौ तैं पिरेम-भौ नि रै जांदु। न तौं मा दया धरम, नौ कि क्वी चीज बचीं रै जांदि। पर नंग इन कबि नि स्वच्दन, कि तौंकि मुखड़ि मा ‘चलकैस’ बि तब हि तलक च जब तलक सि मासा पर चिपक्यां छन। मासू छोड़ी नंगू मा रूखूपन्न ऐ जांदु।
बढ़्यां नंग्वी, सकल बि ‘क्याप’ ह्वे जांदि। वुन् त् सरसुती, कैकि सकल सूरत पर जादा ध्यान नी देंदी। सरसुती त लगन अर् मेनत पर जादा बिस्वास कर्दि। पर बढ़्यां नंगू से त् कलम बि अंक्वे नि पकड़ेंदि। अर् बिगर कलम पकड़्यां त् कुछ होण्यां नी। जब कुछ पढ़्ल्या, कुछ लिखल्या, तबि त् भाषा सिखल्या। यिं बात तैं न् सि समझ्दन्, न् तौंकि समझ मा औंदि। सुद्दि मोळा सि माद्यो! इलै सरसुत्या नजीक रैकि बि नंगून्, ‘बुगदरा’ देणा अलौ, कुछ नि सीखी।
बढ़्यां नंगू तैं कथगा बि समळंनै कोसिस कर ल्या धौं, सि फिर्बि कक्खि न् कक्खि जरुर ‘बिल्क’ जंदन। बिल्कणा बाद य बात पक्की च कि बिलक्यूं नंग, कै न् कैकु नुकसान जरूर करलु य नुकसान न् सै त् अपड़ि मोण तुड़वैकि जरुर लालु।
कै योगि अजक्याल इना बि छन, जु नंग्वा ‘मुंड’ लड़ौण सिखौणा छन। अपड़ा नंग्वा, आपस मा मुंड लड़ौंदु, एका योगि तैं हमुन् पूछि- ‘योगि जी! नंग्वा बारा मा कुछ बतलावा’? वेन् जबाब दे- ‘तंदुरुस्त रौण चाणा छयां त् खाली बग्त मा अपड़ा नंग रगड़ा’। हमुन् अगनै पूछि- ‘नंग रगड़ि-रगड़ी त् झड़ जाला’। योगिन् बोली- ‘भुला! क्वी बात नी, एक दौं का नंग झड़ जाला त् हैंकि दौं का जम जाला’। ताँ पर हमतैं ब्वन् प्वड़ि- ‘पर आखिर कथगा दौं आला, नंग त् रगड़ि-रगड़ी हरेक दौं झड़दि जाला’। योगि जीन्, बात समाळि- ‘अच्छा इन बता, दांत कथगा ‘भै’ छन’? हमुन् जबाब दे- ‘बत्तीस’।
हमारा ‘बत्तीस’ ब्वन पर योगि जी कु ब्वल्यूं सुण्ण मा ऐ- ‘बत्तीस न भुला! दाँत, कुल-कुलांत, द्वी भै छन’। ‘हे राँ! अब वू जमानू अब कख रयूं, जब सब्बि भै मिली-जुली रौंदा छयां। अब त् भै बिगळेकि सोरा, जख देखा ओडै-ओडा। जब तक एक भै सांस लेणू रौंदु, वेका धोरा-धरम हैकू नि औंदु। दंत्वा मामला मा बि इन्नी च, जब एक टूट जांदु, तब हैंकु औंदु। द्वी दांत अगर, एक हि जगा मा ऐ ग्या त् तौं मद्दि एका तैं तोड़्ण प्वड़दू’। हमुन् पूछि- ‘अर नंग’? वून जबाब दे- ‘भुला! नंग सात भै छन’। हम अगनै पुछूण चाणा छया कि वू सात भयूं मद्दि तुमुन् कथगा द्यख्नी? पर ऐन मौका हमारि बुद्धििन् हमारु हाथ पैथर खैंच दे। हम रुक ग्यां। किलैकि वू बोल सक्दा छया कि एक दौं अपड़ा नंग रगड़ी टुटुण त् द्या।
नंग्वी कमी छुपौणू तैं दुन्या, नंगू पर लाल, गुलाबी पौलिस बि कर्दि। पर पौलिस कैकि, सकल सुधरि ह्वलि, आदत सुधुर्दू त् हमुन् कैकि नि देखी। भ्वर्यां दरबार मा त् कालीदासा जबाब ‘इसारौं’ मा पढ़ै ग्येनि। पर इसारौं का, सारा-भरोंसा पर त् जिंदगी चल्दि नि। क्वी मानुु चा नि मानु य बात बि हमारि, खूब कैकि अजमयीं च कि एक न् एक दिन त् बात खुली ही जांदि। क्य कालीदासौ पता बिद्योतमा तैं बाद मा नि चलि? हम त् साफ अर् सीधी बात जणदाँ कि नंग अंगुठाऽ मुंड मा खड़ो होवु चा करअंगुळ्या चुफ्फा मत्थि, नंग द्यख्येणा छ््वटा-बड़ा ह्वे सक्दन् पर संत-मात्मा तौं मद्दि क्वी नि।
य बात बि क्वी सुद्दि नि बोल ग्ये ह्वलू कि नंगून् बगदौर्यूं घौ, बिस्सै जांदु। घौ पर बग्त पर ध्यान नि द्या त् कीड़ा गिजबिजाण बैठ जंदन्। पर इथगा त् हम बि द्यख्णा छां कि नंगू पर बुद्धि नौ कि बि क्वी चीज नी। भुज्जी, खाण गिच्चन् च पर नंग पैलि पर्वाण बण जंदन्। लौकि, ग्वदड़ि अर भट्टै त् नंग्वा ऐथर सामत हि अयिं रौंदि। लौकि, ग्वदड़ि अर भट्टा, कुंगळा होवुन् चा बुढ़्या, नंगै मर्जि सि जख चावुन् तौं पर गंज, गंजाक मार देंदन।
एक दिन, नंग्वी सतायिं-पितायिं, एक बुढ़्या लौक्यू’ ब्वल्यूं हमुन् इन सूणी ‘भुली! पैलि हम समझ्दा छा कि दाँत हि हमारा सबसि बड़ा दुस्मन छन। पर यूं नंगुन् त् म्वन से पैलि, हमारु जीणू हराम कर्यालि। घौर होवु चा बौण, गंज, गंजाक मार देणान। ये अन्यो द्यख्ण वळु क्वी नी। परमेसुरा बि झणि किलै, आँखा बुज्यां छन’। यीं बात पर ग्वदड़िन्, चक्रबिरधि ब्याजौ सि छौंका ढेाळी बोलि- डंक मन वळौं का दाँत नि हुंदन् दीदी!
लोेग यि बि ब्वल्दन् कि ‘नंग’ अर ‘बाळ’, चैबाटौं मा पुजणा काम अंौंदन्। कुजाणि भै! हमुन् त् यि देखी कि नंग अर बाळ तैं एका-हैका सि क्वी मतबल छयीं नि। म्वर्दू-म्वरदू तक न त् बाळ अपड़ि जगा बिटि जरा बि हिटदु अर न् नंग इन्नै-उन्नै ठस्कुदु। बाळ अर नंग एका-हैकै दुख-तकलीफ मा बि सामिल नि हुंदन्। द्वी खाणा-प्येणा, अफ्वी मा मस्त रौंदन्। जब बच्यां मा दुयूं का यि हाल छन त् मुर्यां मा यि चैबाटा पुजणा काम, कनक्वे ऐ जंदन्’?
बढ़्यां नंग, खून खतरी बि कर्दन। यीं बातौ पता हमतैं, एक दौं, इंत्यान देंद दौं, तब चली जब तै इंत्यान मा हमतैं सवाल पूछै ग्ये छौ कि ‘काळा डांडा रैंदु छौं, लाल पाणि प्येंदु छौं, नंगना सहर मा मरेंदु छौं, बता दौं, कु छौं’? ये सवालो जबाब देण मा हमतैं एक घंटा त् अपड़ो कपाळ खज्योण पर लगी। पर जबाब बि कपाळ खज्यांैद-खज्यांैद तब मिली, जब तख बिटि कैन जबाब दे- ‘अरे! टपरौणु क्य छयि? म्यरु नौ लेख ली दि’। हमुन् सुरक पूछि- ‘तू कु छयि’? वेन जबाब दे- ‘अरे कु त् वु छवूं, किस्मतौ म्वर्यूं, जँू छवूं भयि’! इनै, इंत्यान मा ‘जँू’ लेखी, जनि हमारु एक लम्बर पक्कू ह्वे, नंगून् भैर खैंची, वो जँू कचमोड़ दे।
हे लोळा नंगू….! कब आलि तुम पर सुबुद्धि्?
(नंग- व्यंग्य संग्रह – नाराज नि हुयां)
Copyright@ Narendra Kathait

Apr
23

Tribute to Chinmay Sayar by Narendra Kathait

Tribute to late Chinmaya Sayar by Narendra Kathait
साहित्यकार चिन्मय जी की पैली बरसी पर द्वी सब्द
जब तक लोक साहित्ये य छतरी रालि तब तक चिन्यम जी कि याद बि बरोबर औणी आली !!
दुन्या मा औणु अर दुन्या बिटि जाणु परमेसुरा हथ मा च। पर औण अर जाणा बीच जाण वळू हमारा बीच अपड़ि ज्वा छाप छोड़ जांदु, वांकि भरपै हमारि भरसक कोसिसा बाद बि नि ह्वे सक्दि। बस, जब-जब तौं पि़त्र्वी याद औंदि त तौं पि़त्र्वा ऐथर हम गौ बंध ह्वे जंदां। चेतन चोळा छोडुण सि पैली तौं पि़त्रू बिटि ज्वा सीख अर आसिरवाद मिली, वां खुणी एक बार न बल्कि बार-बार इस्मरण कनू हम अपड़ु फर्ज समझ्दां।
आज सि ठीक साल भर पैली ठेठ गुजराता छोड़ बिटि साहित्य स्यवा मा लग्यां, छुटा भुला गीतेश नेगीन् फोन पर जब य खबर सुणैं कि ‘साहित्यकार चिन्मय सायर अब हमारा बीच नीन’। गीतेशा यूं सब्दू पर बिस्वास नी ह्वे। फौरन सायर जी का मोबैल लम्बर 9634670194 पर वूं तैं टटोळनै कोसिस कै। अपड़ा मन मा सोची कि उन्नै बिटि हमारा बीच घुलीं-मिलीं आवाज सुणैली- हलो! भुला ऽऽ ! अर मि तपाक ‘ भाई साब ऽऽ नमस्कार!!!’ ब्वनू तयार रवूं। पर उन्नै बिटि वूंकि गम्भीर आवाजै जगा, वूंकि ब्वार्या ब्वल्यां यूं सब्दू पर मन मारी बिस्वास पक्कू कन प्वड़ि- ‘ससुर जीन् दस मार्च द्वी हजार सोळौ तैं आखिरी सांस ले।’ यिं खबर सूणी तैं गीतेशा फोन कन्ना बाद धुकधुक्या जु बादळ कट्ठा ह्वे छा वू छांटा ह्वे छा वु दिल मा गैरु घौ कैकि चिन्मय जी की फकत याद छोड़ गेनी। एक इना बग्त पर जब्कि हमारि भाषा अपड़ी जगा बणौणू तैं छटपटौणी च, चिन्मय सायर जना बड़ा साहित्यकारो हमारा बीच बिटि जाणू, हमारा साहित्यो भौत बड़ु नुकसान ह्वे।
चिन्मय सायर जी कि साहित्यिक जात्रा वूंका सुरेन्द्र सिंह चैहान मूल नौ बिटि सुरु होंदि। पर भरसक कोसिसा बाद बि सुरेन्द्र सिंह चैहान बिटि चिन्मय सायर बण जाणा हालात कबि मालूम नि ह्वे सक्नी। जथगा बार पूछी, हंस्दि-हंस्दि टाळ गेनी। पर इथगा सब्बि जणदन कि 17 जनवरी उन्नीस सौ अड़तालिसा,ै पौड़ी जनपद, रिखणी खाल बिलौका अन्दरसौं नौ का गौं मा, मयाळू मां चन्दा देब्या कोख बिटि खुशहाल सिंह चैहान जी का गुठ्यार मा आपौ जलम ह्वे।
पढ़ै-लिखै कि बुन्याद गौं का नजीकै इस्कूल मा प्वड़ि। अगनै एम.ए. तक स्या पढ़ै-लिखै, छोरा-छापर्यू जन ठोकर खै-खै मिली। लुपड़ा उमुरौ कुछेक बग्त, बाॅम्बै मा बि काटी। घौर ऐकि द्वी बार मास्टरी छोड़ी। पर आखिरी मा मास्टरी मा ही सकून मिली। सन् द्वी हजार आठ मा हैड मास्टरी बिटि रिटैर होणा बाद हौळ-तांगळ अर पुगड़ा-पटळौं कि धाण दगड़ा साहित्य स्यवा मा जुट्यां छा। गौं मा कम्प्यूटर बि रख्यूं छौ त दूर आपस मित्रू दगड़ा ब्वन- बच्याणू मौबैल बि। पर बिस्वास कबि बि कैका मुंड मा नी ढोळी। हाथन ही तमाम चिट्ठी पत्री लेखणा रैनी। चिन्मय जी की चिठ्यूं का ऐंच ‘शब्द संधान’ नौ का द्वी सब्द पढ़दि बिथेक कबीरौ खाकू दिमाग मा ऐ जांदू छौ।
दरसल, चिन्मय जी हमारि लिख्वार बिरादर्या वीं सोच का अग्ल्यार छा जौं सदानि यू पक्कू बिस्वास रै कि हमारा गौं-गौंळौं की भाषन् ही हिन्दी भाषा मजबूत ह्वे। इलै गौं-गौळौं की यिं भाषा तैं बचैण जरुरी च। पर हमारि अजक्यालै लोक भासै दसा अर दिसा देखी चिन्मय जी खुस नी छा। आपन एक चिट्ठी मा अपड़ि य पिड़ा इन लेखी- ‘अफसोस च! लेख्ण वळौं कु ना,…..बल्कण वूं कु तैं, जु गढ़वाळि ह्वेकि बि गढ़वळि पढ़ण-लेख्णै नी जण्दन। य सिख्ण समस्या समझ्दन। एक जगम बेधड़क लेख्यूं बि च कि-
लोग/ब्वे ;भाषा,जन्मभूमि, राष्ट्र।’
ैडुण सि बढ़िया
कटाणा छन…..
अर/म्यार लाटा
टै लटकै/ झटकाणा छन!!!
चिन्मय जीन् हिन्दी अर गढ़वाळि द्वी भाषौ मा खूब लेखी। गढ़वळि कबिता ‘पसीनै खुसबू’, ‘तिमलाऽऽ फूल’, ‘मन अघोरी’ अर ‘औनार’ किताब्यूं मा सुनागण जन चमकिणी छन। अन्धविस्वास पर यिं चोट देखा-
म्यर मुल्कौ जगरी
रात हूंण पर/लगांद रांसा
अर, फजल हूण से पैल
से जांद
लोग खुस छन कि/ यनम मवसि ह्वे जांद।
अजक्याळै भाग दौड़ वळि जिन्दगी पर चिन्मय जी की नजर देखा दि-
खाणा छल, पींणा, हंसणा छन / रूंणा छन
पण, ऐ जिन्दगी त्वे थैइ, क्वी-क्वी जींणा छन।
कबितौं मा मजबूत पकड़ होणा बाबजूद बि चिन्मय जी छर्क्या कब्यूं का जना लटका-झटकों सि दूर रैनी। एक-आत बार कबि मंच पर गै बि ह्वला पर वुन अफु तैं वे खांचा मा फिट नि समझि। प्रसिध्यू तै सौल-दुसाला ओडुण सि बढ़िया वून अपड़ा काम मा मग्न रैकि सिद्ध होण सहि समझी।
चिन्मय जी हलन्त, नवल, दुदबोली, बाल प्रहरी, शैलवाणी, हिमशैल मा चिन्मय जी बरोबर लेखणा रैनी, छपणा रैनी। गढ़वाळि मा नप्यां-तोल्यां सब्दू दगड़ा जु भौ चिन्मय जी का लेख्यां मा देख्ण मा मिल्दू, वू हौरि कक्खि खुज्योण पर्बि नि मिल्दू। इन ब्वन मा बि क्वी बड़पन्नै नी कि चिन्मय जीन् जु बि लेखी, दमदार लेखी। मन लगै कि लेखी। गैरा मा झांकी न, गैरा मा उतरी लेखी।
चिन्मय जी कु योगदान कुछैक पन्नो मा समेटणू सौंगु नी। द्वी किताब पे्रस मा छै। अज्यूं बि चिन्मय जी, थकी नी छा। वूं सि, अबि बि भौत उम्मीद छै। पर बिधातन अपड़ि हठपनै कु जु सांसू दिखै, वांकि उम्मीद, कै तैं बि, कतै नी छै।
चिन्मय जी आखिरी तक अपड़ि लोक माटि मा डट्यां रैनी। कक्खि उड-फुड भागी नीन्। यु ये लोक माटा दगड़ा चिन्मय जी कु गैरु पिरेम भौ हि छौ कि पराण बि वूंन अपड़ा माटा मा हि त्याग्नि। म्यरा मोबैल मा चिन्मय जी कु लम्बर आज बि मौजूद च। पर यिं बात जाणी-सुणी हौरि बि खुसि होंदि कि वे ही लम्बर बिटि वूंकि कुटुम्बदार्या बि हम दगड़ा अपड़ैसा तार जोड़ी रख्यां छन।
साहित्य तैं अगर हम एक छतरु माण ल्यां त् इन समझा कि चिन्मय जी का जाणन् छतरै एक सीक सि टूट ग्या। पर चिन्मय जीन् अपड़ा ठोस कामा बदौलत, ये छतरा तैं अपड़ि तिरपां बिटि जु बल अर टिकणै सामर्थ दे, वां तैं सब्दू मा बंधणु बड़ू मुस्कल च। फिर्बि इथगा जरूर बोल सक्दां कि जब तक लोक साहित्ये य छतरी रालि तब तक चिन्यम जी कि याद बि बरोबर औणी राली !! बरोबर औणि राली!!
10 मार्च 2017

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