Feb
18

हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर की पर्वतीय पौरव काल की स्थानीय भाषा :खस भाषा के अंश

हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर की पर्वतीय पौरव काल की स्थानीय भाषा :खस भाषा के अंश
Local Languages of Haridar, Saharanpur Bijnor in Parvatakar Paurava Kingdom

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का ‘अंध युग’ अर्थात तिमर युग इतिहास (647-725 AD )- 19

Paurava dynasty in Dark/ Early Middle Age of History of Haridwar, Bijnor , Saharanpur (647-725 AD ) – 19

Ancient History of Haridwar, History Bijnor, Saharanpur History Part – 296

हरिद्वार इतिहास , बिजनौर इतिहास , सहारनपुर इतिहास -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग – 296

इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
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पिछले अध्याय में डबराल द्वारा पौरव वंशी शासनो की पढ़कर कुछ गांवों के नाम दिए जिन्हे पौरव काल में शासनों में संस्कृत में परिवर्तित किया गया था (1 ) । यह ऐसा ही है जैसे अंग्रेजी शासन में अंग्रेजी में शासन आदेश अंग्रेजी में ही आते थे व कई स्थलों के नाम परिवर्तित हुए जैसे गढ़वाल के गाँव ग्वील को Goil कर दिया गया , बरसुड़ी को Barsuri या महाराष्ट्र के धुळे को Dhule नाम डबराल ने जिन संस्कृत रुपया ग्रामों का गढ़वाली नाम ववरण दिये वे वास्तव में खस भाषा के सूत्र thread लगते हैं यथा बाट , गाड , खोळी , सारी खारी आदि आदि । आज भी ये नाम कुमाऊं -गढ़वाल में विद्यमान हैं। चूँकि विद्वानों के पास रिकॉर्ड में प्राकृत या अपभृंश नाम ही है तो इतिहासकार भी सरलीकृत वृति या सरलीकरण हेतु भाषा संदर्भ में प्राकृत , अपभ्रंश या देश भाषा नाम दे देते हैं जैसे डबराल ने भी लिखा (1 )। दूण , खारी सारी शब्द भी संकेत करते हैं कि तब गढ़वाल कुमाऊं व लग्गे बग्गे मैदानी भागों में खस या खस निर्मित भाषा बोली जाती थी।
यह मानने में अधिक दिक्क्त नहीं होनी चाहिए कि पौरव वंशियों के महाधिराज विरुद से सिद्ध होता है कि पूर्व वंशी राज मैदानों (हरिद्वार, सहारनपुर व बिजनौर तक या कुछ भाग तो था ) . अतः यह भी माना जा सकता है कि हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर में खस भाषा बोली जाती थी जिसे डबराल ने देशज भाषा उल्लेख किया जिसे विद्वान व इतिहासकार सरलीकरण मानसिकता के तहत प्राकृत , अपभ्रंश नाम दे दे दते हैं।
डबराल ने आगे लिखा कि यही देशज भाषा बाद में उत्तराखंड की वर्तमान बोलियां बनीं।

हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर की प्राचीन बोलियां ?

चूँकि मध्य युग व ततपश्चात मुस्लिम आक्रांताओं व मुगल राज आ जाने से इस क्षेत्र में कोई सजातीय समाज न रहा जैसे गढ़वाल या कुमाऊं में तो कोई सजातीय भाषा भी न बच सकी। इस कारण सहारनपुर , बिजनौर , हरिद्वार की प्राचीन बोलियों पर भी किसी विद्वान् का ध्यान भी नहीं गया।
खस भाषा या शौरसेनी भाषा ?
इतना तो तय है कि पहाड़ों में खस भाषा बोली जाती थी और चूँकि सहारनपुर , हरिद्वार व बिजनौर तब तक उत्तराखंड के अभिन्न अंग थे तो यह माना जा सकता है कि सहरानपुर , बिजनौर व हरिद्वार में भी खस भाषा या बोली (स्थानीय बदलाव अवश्यम्भावी है ) बोली जाती रही होगी।
विद्वान मानते हैं कि शौरसेनी हिंदी (हिंदी जो पश्चमी उत्तर प्रदेश , हरियाणा , हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर में बोली जाती है ) की जननी है और इस शौरसेनी का जन्म लगभग 2वीं -3 वीं सदी का माना जाता है (2 )
पौरव काल 645 -725 का है याने इतने काल में तब तो कोई भाषा इतना प्रभाव नहीं डाल सकती थी कि सम्पूर्ण समाज शौरसेनी प्रभावित हिंदी बोलने लग जाय न ही कोई आर्थिक औचित्य था । इन विवेचना से कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण बिजनौर , हरिद्वार , सहरानपुर न सही कुछ भागों में में खस भाषा या खस प्रभावित बोली अवश्य बोली जाती रही होगी। हो सकता है शौरसेनी प्रभावित हिंदी या स्थानीय भाषा व खस मिश्रित भाषा भी बोली जाती रही होगी।

सन्दर्भ :

1- Dabral, Shiv Prasad, (1960), Uttarakhand ka Itihas Bhag- 3, Veer Gatha Press, Garhwal, India page 420

2 – वुलनेर , अल्फ्रेड (2016 ) इंट्रोडक्शन टु प्राकृत रीप्रिंट मोतीलाल बनारसी दास दिल्ली

Copyright@ Bhishma Kukreti , 2019

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कनखल , हरिद्वार इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ; ज्वालापुर हरिद्वार इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ;रुड़की , हरिद्वार इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ;लक्सर हरिद्वार इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ;मंगलौर , हरिद्वार इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ; बहादुर जुट , हरिद्वार इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ;

सहरानपुर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ;देवबंद , सहरानपुर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ;बेहट , रामपुर , सहरानपुर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ;बाड़शाह गढ़ , सहरानपुर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ; नकुर , सहरानपुर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ;

बिजनौर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ; धामपुर , बिजनौर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ; नजीबाबाद , बिजनौर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ; नगीना , बिजनौर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ; चांदपुर , बिजनौर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ; सेउहारा बिजनौर इतिहास में पौरव काल की स्थानीय भाषा ;

Feb
18

Communication between British and King for Ravain Looting

Communication between British and King for Ravain
History of King Sudarshan Shah of Tehri Riyasat – 106
History of Tehri Kingdom (Tehri and Uttarkashi Garhwal) from 1815 –1948- 106
History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) – 1336
By: Bhishma Kukreti (History Student)
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Dabral offers us the details of Ravain looters , British sending , cautioning Sudarshan Shah for taking against Ravain looters looting in nearby regions and creating law and order problems. When the King security force used to enter into disturb region of Ravai, the looting elements used to hide and stop looting , disturbing acts. As soon King force used to return the unsocial elements used to restart their looting activities. (1)
British decided sending troop in Ravain region . Lieutenant Ross establish a army troop camp in Ravain and the King got help in keeping law and order situation (2)
English Pre Mutiny records offer the information that Lieutenant Ross informed Commander Metcalf that King has paid the amount of goods looted by Ravain looters and the King made assurance for improving law and order measures.
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References –
1-Dabral, Shiv Prasad, (1975), Uttarakhand ka Itihas bhag 6, Veer Gatha Press, Garhwal India, page 135-137
2- English Pre Mutiny records , Kumaun series 1 Garhwal Kingdom 1815 , 24
Copyright@ Bhishma Kukreti, bjukreti@gmail.com
Looters of Ravain and British , History of Tehri Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Uttarkashi Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Ghansali, Tehri Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Bhatwari , Uttarkashi Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Tehri, Tehri Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Rajgarhi Uttarkashi Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Narendranagar, Tehri Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Dunda , Uttarkashi Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Dhantoli, Tehri Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Chinyalisaur Uttarkashi Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Pratapnagar , Tehri Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Mori, Uttarkashi Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Devprayaga, Tehri Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Puraula, Uttarkashi Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Jakhanikhal Tehri Garhwal; Looters of Ravain and British , History of Gangotri- Jamnotri Uttarkashi Garhwal to be continued …

Feb
18

‘पलायन एक चिंतन’ आयोजित निखालिश भोजन पर्यटन और देवेश आदमी , रूपचंद जखमोला के अनाज दाल व्यापार पर्यटन सहायक माध्यम

‘पलायन एक चिंतन’ आयोजित निखालिश भोजन पर्यटन
और
देवेश आदमी , रूपचंद जखमोला के अनाज दाल व्यापार पर्यटन सहायक माध्यम

Difference between Food Tourism and Food as Tourism Assisting Medium
भोजन पर्यटन विकास -7
Food /Culinary Tourism Development 7
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना – 393

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -393

आलेख – विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

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भोजन पर्यटन व पर्यटकों हेतु भोजन अनाज , यंत्र प्राप्ति सेवा में अंतर् जानना आवश्यक है।

पलायन एक चिंतन का ‘ शीला -बांघाट ‘ क्षेत्र में ‘ऑर्गेनिक किचन ‘ भोजन पर्यटन उदाहरण

अजय रावत द्वारा उन्ही की वाल में फेसबुक में 14 फरवरी 2019 की पोस्ट में एक सूचना मिलती है कि पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड के दोनों नयार संगम तटीय क्षेत्र शीला -बांघाट क्षेत्र में पलायन एक चिंतन संगठन ने ‘ऑर्गेनिक व ट्रेडिशनल किचन ‘ का शुभारम्भ किया व शीला बलूण तोक क्षेत्र में बंजर पड़ी जमीन में जैविक कृषि कर इस किचन में ऑर्गेनिक भोजन परोसेंगे। इस प्रयत्नो गामी कृत में स्वयं अजय रावत , रत्न सिंह असवाल , अनिल बहगुणा , राकेश बिजल्वाण व कृष्ण काला शामिल हैं।

जैविक कृषि अपने आप में पर्यटन गामी माध्यम है और जैविक अनाज दाल , सब्जी से बना भोजन पर्यटकों को परोसना अति विशेष भोजन पर्यटन कहलाया जाता है। ऐसे किचन में अभी अधिकांशतः विदेशी पर्यटक व धनी पर्यटक ही एते हैं जिन्हे जैविक भोजन की महत्ता ज्ञात है। इसे निश मार्केटिंग तहत निश टूरिज्म भी कहा जाता है। सामन्य पर्यटक किचन में भोजन नहीं करेंगे व जैविक पादप खेतों में नहीं घूमेंगे केवल जैविक कृषि प्रेमी ही आनंद लेंगे इसलिए ऐसा कार्य अति विशेष भोजन पर्यटन श्रेणी में आएगा।

रतन सिंह असवाल व अजय रावत के पोस्टों से अनुमान लगता है वे शीला बलूण तोक (मनियार स्यूं ) में जैविक प्रेमी पर्यटकों हेतु विलेज टूरिज्म हेतु सुविधा जुटाएंगे। फ़ूड टूरिज्म का आधार व उद्देश्य विलेज टूरिज्म विकसित करना ही होता है।

रतन सिंह असवाल , अजय रावत के सोशल मीडिया में पहाड़ी भोजन चित्र व विवरण किस तरह विलेज टूरिज्म का प्रचार प्रसार करना चाहिए के प्रशंसनीय उदाहरण हैं

उपरोक्त पर्यटन निखालिश भोजन पर्यटन की श्रेणी का श्रेष्ठ उदाहरण है।

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देवेश आदमी व रूपचंद जखमोला द्वारा पहाड़ी अनाज दाल व्यापार निखालिश भोजन पर्यटन नहीं है

पैनों पट्टी के देवेश रव्वत ‘आदमी ‘ देहरादून में बालावाला स्थान में पहाड़ी अनाज , दाल भाजी के व्यापार में संलग्न हैं व गाँवों में ग्रामीण क्राफ्ट विकास व प्रचार प्रसार हेतु कार्यरत हैं जैसे पादप पत्तल व शिल्पकारों द्वारा निर्मित क्राफ्ट्स /शिल्प वस्तुओं की प्रदर्शनी व प्रचार आदि आदि।

इसी तरह मल्ला ढांगू के रूपचंद जखमोला भी ऋषिकेश में पहाड़ी अनाज , दाल , भाजी सुक्सा आदि का व्यापर करते हैं।

इसी तरह देहरादून में युगवाणी के पास निखालिश पहाड़ी अनाज दूकान , रेवती हॉस्पिटल निकट , हरिद्वार रोड धर्मपुर देहरादून में सेमवाल स्टोर द्वारा पहाड़ी अनाज दाल सुक्सा , बड़ी व्यापार भी पर्यटनोगामी हैं। देवेश रावत आदमी , रूपचंद , सेमवाल स्टोर के कृत्य वास्तव में उत्तराखंडी प्रवासी पर्यटकों को आकर्षित करने वाले भोजन संबंधी कृत्य तो हैं किन्तु निखालिश भोजन पर्यटन श्रेणी में नहीं आते। धर्मपुर देहरादून में ही सेमवाल स्टोर के पास कलसी कुठार (मल्ला ढांगू ) के रावत का ‘रावत सीड्स स्टोर’ वास्तव में भोजन-कृषि पर्यटन का एक उदाहरण है। इस स्टोर में उत्तराखंड पहाड़ों के कृषक पहाड़ी बीज , कृषि यंत्र क्रय हेतु गाँवों से आते हैं तथापि दूसरे शहरों के प्रवासी भी पहाड़ी बीज व कृषि यंत्र क्रय हेतु आते हैं।

सभी भोजन दाल व्यापार निखालिश भोजन पर्यटन नहीं कहलाया जा सकता है। हाँ यह व्यापार पर्यटन विकासोन्मुखी अवश्य होता है।

Copyright @Bhishma Kukreti, bjkukreti@gmail .com

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पौड़ी गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; उधम सिंह नगर कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास ; चमोली गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; नैनीताल कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; अल्मोड़ा कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास ; टिहरी गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; चम्पावत कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास ; उत्तरकाशी गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; पिथौरागढ़ कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास; देहरादून गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; रानीखेत कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास; हरिद्वार गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास ; डीडीहाट कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास ; नैनीताल कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास :

Feb
17

भोजन पर्यटन का एक ही उद्देश्य : स्थानीय उत्पादों की उन्नति

भोजन पर्यटन का एक ही उद्देश्य : स्थानीय उत्पादों की उन्नति

Aim of Food Tourism:Promotion of Local Products
भोजन पर्यटन विकास -6
Food /Culinary Tourism Development 6
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना – 392

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -392

आलेख – विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

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आज पर्यटन उद्यम या विचार आमूल -चूल परिवर्तन की सीढ़ी पर है। उपभोक्ता कुछ नया अनुभव की खोज में पर्यटन को महत्व दे रहा है। इसीलिए भोजन केंद्रित पर्यटन विचार /कंसेप्ट तेजी से विकसित हो रहा है और विपणन विचारक भोजन पर्यटन विकास को अति महत्व दे रहे हैं। भोजन पर्यटन स्थल विकास से कई लाभ मिलते हैं जिनकी चर्चा पिछले अध्याय में हो चुकी है।

भोजन पर्यटन के मुख्य उद्देश्य निम्न हैं -

१- स्थानीय भोजन व स्वाद को समृद्ध किया जाय ना कि बाह्य स्वाद को।

२- भोजन पर्यटन स्थानीय भोज्य सामग्री पर ही निर्भर हो

३- भोजन पर्यटन से स्थानीय कृषि व स्थनीय कृषि सहायक उद्यमों में समृद्धि आवश्यक है

४- भोजन पर्यटन के सहायक कारकों में स्थानीय संस्कृति को महत्व दिया जाय जैसे धार्मिक अनुष्ठान आदि होने चाहिए

५- भोजन पर्यटन में सहायक कारक जैसे मनोरंजन में स्थानीय कला ही का समावेश हो -स्थानीय गीत संगीत , खेल का समावेश निश्चित करना

६- भोजन पर्यटन को संबल देने वाले अन्य कारक जैसे श्रमिक स्थानीय ही हों

७- भोजन पकाने पाठशाला म स्थानीय भोजन पाठ्य क्रम अवश्य शामिल हो

८- भोजन पर्यटन से स्थानीय कलाओं का विकास हो ना कि भोजन पर्यटक स्थल चीन का सामन बोक्ने वाला कुरियर ब्वाय बन जाय।

९- भोजन पर्यटन से कृषि पर्यटन को बल मिलना चाहिए

१० – सौगात भोजन पदार्थ भी स्थानीय ही हो जैसे अन्य सौगात वस्तु

मैंने पिछले एक अध्याय में लिखा कि उत्तराखंड में पर्यटन समृद्ध हुआ किन्तु स्थानीय उत्पादों के प्रयोग न होने से उत्तराखंड को समुचित लाभ न मिल सका। अतः बहपजं पर्यटन विकसित करने के लिए उपरोक्त उद्देश्यों पर ध्यान देना आवश्यक होना चाहिए

Copyright @Bhishma Kukreti, bjkukreti@gmail .com

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पौड़ी गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; उधम सिंह नगर कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; चमोली गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; नैनीताल कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; अल्मोड़ा कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; टिहरी गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; चम्पावत कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; उत्तरकाशी गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; पिथौरागढ़ कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास; देहरादून गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; रानीखेत कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास; हरिद्वार गढ़वाल में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; डीडीहाट कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति ; नैनीताल कुमाऊं में भोजन पर्यटन विकास का उद्देश्य स्थानीय उत्पाद उन्नति :

Feb
16

पर्वताकार पौरव ताम्र शासनों में ग्राम नाम

पर्वताकार पौरव ताम्र शासनों में ग्राम नाम
Village Names in Copper Inscriptions of Parvatakar Paurava Rulers

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का ‘अंध युग’ अर्थात तिमर युग इतिहास (647-725 AD )- 18

Paurava dynasty in Dark/ Early Middle Age of History of Haridwar, Bijnor , Saharanpur (647-725 AD ) – 18

Ancient History of Haridwar, History Bijnor, Saharanpur History Part – 295

हरिद्वार इतिहास , बिजनौर इतिहास , सहारनपुर इतिहास -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग – 2945

इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
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पर्वताकार पौरव काल में जनभाषा देश भाषा संस्कृत नहीं अपितु स्थानीय थी जिसे अपभ्रंस आदि नाम दिया जाता है। पूर्व ताम्र शासनों में उत्तराखंड के पहाड़ी गाँवों के नाम पर बड़ी रोचक जानकारी मिलती है। पूर्व ताम्र शासन में इन नामों को संस्कृत रूप देकर अंकित किया गया है (1, )-
पौरव ताम्र शासन में नाम —–संभावित गाँव या खेत , स्थल नाम , पौरव ताम्र शासन में नाम —–संभावित गाँव या खेत , स्थल नाम,
उदुंबरवास ———————————– गोविलवास , ——- कपिलगर्ता ——————-कपिल्या गाड ,
कोल्लपुरी ———————————–कोली गांव ——— खण्डाकपल्लिका ————-खंड गांव
खट्टलिका ———————————–खाटली —————- खोहिलका ——————-खोळी
गोहबाटक ———————————गोरबाट ———— चम्पक ————————चम्बा
चन्दुलाक पल्लिका ———————चंडा पाली ———– छिद्रगर्ता ———————- उड्यारी
जयभट्टपल्लिका ——————-जैगांव भट्ट गाँव ———- जंबुशालिका ————– जामुणसारी
डिंडिका ———————————– डिंडा ——————— दुभाया ————————-डोभ /डोभा
तोली ————————————–तोळी ——————- तापल्ली ———————-थापळी
द्रोणी ————————————दून दूण —————– देवखल ————————दिखैत
दीपपुर ——————————–दिउळा —————————– दूण्णा ————————- दूणी
नागिलक्षेत्र —————————-नागर जातोक , नगळि , नगळी , ——-निंबसारी —————————— नीमसारी
पल्ली ——————————–पाली , —————————-पटलिका ——————-पटवाळ गां
पुष्पदन्तिका —————————फुल्यार गां , —————————- बुरासिका ————————-बुरांसी
बृद्धतर पल्लिका —————————-बड़ी पाली , —————————बंजाली ———————–बंजा गां बंजण गां
भट्टिपल्लिका —————————–भट गां , ———————————भुतपल्लिका ———————–भूत गां
मालवकक्षेत्र —————————–मालूखेत ——————————– रजकस्थल ————————धोबीघाट
लवणोदक ——————————लूणियासोत —————————-श्रृंगारखोहलिका ——————-स्याळै खोळी
सेम्मकक्षेत्र ——————————-सेम , सीम ———————————सेम्महिका ————————-सिमलगा
सन्दर्भ :

1- Dabral, Shiv Prasad, (1960), Uttarakhand ka Itihas Bhag- 3, Veer Gatha Press, Garhwal, India page 420

Copyright@ Bhishma Kukreti , 2019

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सहरानपुर इतिहास ;देवबंद , सहरानपुर इतिहास ;बेहट , रामपुर , सहरानपुर इतिहास ;बाड़शाह गढ़ , सहरानपुर इतिहास ; नकुर , सहरानपुर इतिहास ;
बिजनौर इतिहास ; धामपुर , बिजनौर इतिहास ; नजीबाबाद , बिजनौर इतिहास ; नगीना , बिजनौर इतिहास ; चांदपुर , बिजनौर इतिहास ; सेउहारा बिजनौर इतिहास ;

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