गाड़ी से उतर कर गंगा सिंह सड़क से नीचे कोसी की ओर उतरने लगे, उन्हें कोसी पार अपनी बहन के घर पहुँचने की जल्दी थी, कोसी के पुल को पार कर ही रहे की उनकी नजर खिलखिलाती हुई, सर पर पिसाई के थैले लिए तीन लडकियों पर गयी जो तीन घटों (पनचक्कियों) के खंडहरों के पास से गुजर रहीं थी. उन्होंने घटों की तरफ देखा तक नहीं उन्होंने अपने जीवन में इन घटों को चलते हुए देखा भी नहीं होगा सिर्फ बढ़े – बढ़ों से सुना था कि यहाँ गेहूँ, मडुआ, जौ, झुंगर आदि पिसा करते थे. वहीं तीन क्या अब तो हर कोई इनकी तरफ देखे बिना ही चल देता है, मानों ये अदने से पत्थर- मिट्टी के ढेर के अलावा कुछ न हों, हाँ अलबत्ता कुछ बढ़े – बूढ़ों के मानस पटल पर ये खंडहर अतीत की चंद धुंधली तस्वीरें उकेर जाते हैं, ऐसी ही यादें ताजा हों गई बूढ़े गंगा सिंह के मन में भी.
घर उनका धुरपाट में था नदी तल से करीब पांच मील उपर गेहूँ पिसाने का एकमात्र साधन कोसी के घट ही थे, बारह साल का गवऊ पहली बार अपने बौज्यू के साथ जब पहली बार घट पिसाने कोसी नदी आया तो हैरान रह गया, तेरह घट थे यहाँ सब जगह भीड़. त्रिलोक सिंह, बिरदेव, परमानन्द, भुर पधान, नर सिंह सब के घटों में दूर – दूर के गाँवों से आये लोगों की भीड़. उधर अट्टहास करती कोसी की धारा, गेहूँ और सरसों से लहलहाते नदी के दोनों तरफ खेत. थोड़े- थोड़े अंतराल के बाद ऊपर सड़क पर घरघराती मोटर गाड़ी, यह सब धुरपाट के गवऊ को हैरान करने के लिए काफी था. वह नरसिंह के घट के आगे नदी तट पर बैठा अपने को ठगा सा महसूस कर रहा था, सुबह कब दोपहर में बदल गई पता ही नहीं चला उसकी तंद्रा बौज्यू की आवाज से टूटी-
“हिट गवऊ, पीसी गया, घर चलें”
फिर तो गवऊ के लिये घट का सिलसिला ऐसा बना की बरसों तक चला वह कभी बौज्यू तो कभी अपने दाज्यू तो कभी दोस्तों के साथ गेहूँ या मडुवा पिसाने यहाँ आता रहा. उसे याद आने लगा गर्मी का मौसम जब कोसी का पानी बहुत कम हों जाता था, घटों के पाटों की गति भी कम हों जाती थी एक – एक थैला पीसने में घंटों लगा करते थे, घटों पर रात भर रौनक होती थी. नैनोई से लोग घोड़ों पर थैले लाद कर आते थे, उधर घट धीरे-धीरे गेहूँ के दानों को चबाता हुआ आटा बनाता इधर कुछ लोग कोसी में कुलोर से मछली मारते, घटों पर ही चूल्हा जलता वहीं मछलियाँ भूनी जाती, कच्ची – पक्की रोटियाँ सकीं जाती. कोई मशान पूजने रात नदी में आ गया तो दावत ही समझो. बोरियत से बचने के लिए कोई अपना दो बेंड का चमड़े के कवर में लिपटा बुश रेडियो साथ लाता तो कोई आधी रात को मुरली की दर्द भरी तान छेड देता, तान भी ऐसी की सुन परदेश में रह रहे पति की विरहणी के दिल में हूक उठा दे. ऐसा रतजगा गवऊ के लिए किसी कौतिक या पिकनिक से काम न था.
प्रेमी- प्रेमिका का आकर्षण किसी भी देश – काल, सीमा से हमेशा मुक्त रहा है, कई स्थानीय प्रेम युगलों के अफसानों का आगाज इन्हीं घटों से हुआ था. कोसी के ऊपर चढ़ाई चढते हुए गंगा सिंह को याद आता है की ऐसी ही एक प्रेम कहानी परवान चढ़ी थी मोहनी और बिरुवा की. मोहनी दूर ऊपर के गावं से आटा पिसाने कोसी के घटों पर आया करती थी एक दिन परमानन्द के घट पर दोनों की आँखें चार क्या हुई दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठे. मोहनी जब भी घट आती बिरुवा भी अपने घर से बिना सुखाये अनाज को उसी घट की ओर चल देता और घर वालों की गाली खाता क्योंकि घट के अलावा मिलने की जगह थी भी कहाँ, समय लोक लाज से डरने का भी था और बिरुवा में भी आजकल के दीवानों जैसी हिम्मत भी न थी की मोहनी के घर के चक्कर काटा करे. आस पास के गावों के लोंडे लपाड़े इन दोनों के चर्चों को नमक मिर्च लगा कर सुनते और सुनाते थे. कुछ महीनों बाद बिरुवा को नौकरी के लिए दिल्ली जाना पड़ा, गमे इश्क पर गमे रोजगार भारी हों गया मोहनी भी बिरुवा के दिये तोहफे रुमाल, झुमके और पायल को जतन से संभाले उसे भूलने की नाकाम कोशिश करती रही. दो वर्षों बाद समय ने ऐसी करवट ली की सभी हैरान रह गये बल्की कईयों को तो इन दोनों के भाग्य पर ईर्ष्या होने लगी. दोनों के प्रेम प्रसंग से अनजान दोनों के घरवालों ने इनका रिश्ता तय कर दिया. लेकिन ऐसी किस्मत लेकर सब कहाँ पैदा हुए थे अनेकों की तो प्रेम की बेल अंकुरित होते – होते दम तोड़ गयी.
गंगा सिंह का बाद में कोसी के किनारे बसे घटों के गावं में आना जाना और बढ़ गया उसकी बहन का विवाह जो यहाँ हो गया था, नर सिंह घटाव की बिरादारी में. गंगा सिंह को नर सिंह घटाव का चेहरा अपनी आँखों के आगे नजर आने लगा जो हमेशा घट के अंदर उड़ते आटे से पुता रहता, आटे के कारण ही उनके अधपके खिचड़ी बाल झक्क सफेद ही दिखाई देते थे, अस्सी की उमर में भी उनमें काफी दम था बान का रिसाव रोकना हो या घट का भारी चक्का बदलना हो अकेले ही कर लिया करते. भाग (पिसाई) जो अपनी इच्छा से दे दे कोई मलाल नहीं, पर जोगी लाट (गूंगा) के घट पर बात कुछ और थी बोल तो वह नहीं पाता पर काम भाग देने पर उसका चेहरा बता देता की वह खुश नहीं. एक घटाव थे बिशन बहादुर बहुत गुस्सैल शायद ही कभी किसी ने उन्हें हँसते मुस्कराते देखा हों, अगर किसी औरत ने उनके घट के बान (नहर) में घास धो ली तो उसके माँ बाप, सास ससुर का श्राध हों गया समझो. दूसरी ओर देव दत्त घटाव बहुत ही मजाकिया हँसते हँसाते रहते. शेरदा घटाव बहुत ही मीठा बोलने वाले लेकिन आटा चोरी के लिए भी विख्यात. जैसे किस्म किस्म के घटाव वैसे ही घट त्रिलोक सिंह के जोयाँ (जुडवां) घट सबसे अधिक भीड़ खीचने वाला, दो गधेरे के घट थे जो चौमास में तो खूब तेज चलते बाकी साल पानी की कमी के कारण पिसाने वाले को रुलाने के लिए काफी थे, लोग बहुत मज़बूरी में ही यहाँ आते.
गंगा सिंह मिलटरी में भर्ती होने तक इन घटों में जाता रहा. एक बार छुट्टी में आया तो पता चला की पिछले वर्ष बिजली आ गयी और कोसी के ऊपर मोहन सिंह ठेकेदार ने बिजली की चक्की लगा ली घटों की भीड़ अब चक्की पर जुटने लगी, गेहूँ पिसाना, धान कूटना, तेल पिरोना सब यहीं होने लगा . घट अब भी आबाद थे विशेषत: चौमास जब बिजली कई दिनों तक गुल रहती. समय बिताता गया, परदेश से पैसा पहाड़ खूब पहुँच रहा था लोगों के लिए समय कीमती हों रहा था आराम परस्ती भी बढ़ने लगी. कुछ बूढ़े घटाव ऊपर चले गये जो बचे उनके शरीर में घट सँभालने की ताकत नहीं बची सो घट बटाई पर दे दिये गये. दूर धुरपाटो में बिजली तो पहुँची नहीं पर कुछ अति उत्साही लोगों ने उचे डानों में डीजल की चक्कियां लगा डाली फिर क्या था घटों की कमर ही टूट गयी. घट बंजर होने लगे उधर एक के बाद एक चक्कियां लग रही थीं इघर एक एक करके घट उजड रहे थे. दयाल मास्टर जब तक जिन्दा रहे उन्होंने अपने घट को आबाद रखा उनके जाने के बाद कोसी का आखरी घट की घुराट भी हमेशा के लिए बंद हों गयी. अब इन घटों की यादें ही रह गयी बहन के आँगन में पहुचते ही गंगा सिंह के अचेतन मन में घट पहुँच चुका था.
May
17
घट और घटाव
May
05
हरक सिंह नयाल
हरक सिंह नयाल उर्फ सफेदा दिल्ली-बागेश्वर की बस में पीछे की सीट पर बैठा खिडकी से बाहर एकटक देख रहा था. वह सैकड़ों बार यहीं से अपने गावं के लिये रवाना हो चुका था पर पहले की तरह उसे आज बस के चलने की कोई जल्दी नहीं थी, आज उसे बस अड्डा अजीज लग रहा था बल्की बस अड्डे के बाहर ऑटो, बसें, दुकानें, आवाज लगा कर समान बेचने वाले सब जाने क्यों अपने अभिन्न अंग लग रहे थे, जिनसे थोड़ी ही देर बाद वह जुदा होने वाला था. यूं दिल्ली जैसे शहर को उसने कभी अपना नहीं समझा यहाँ रहने के बावजूद भी उसका मन पहाडों में ही रमा रहा, जिसे इतने वर्षों में उसने नहीं चाहा उस दिल्ली के प्रति उसके दिल में आज अचानक प्यार उमड़ आया था. चालीस साल की सरकारी नौकरी से आज ही वह रिटायर हुआ था, न जाने उसे ऐसा क्यों लग रहा था कि वह यहाँ अब वापस नहीं आ पायेगा. बस कंडक्टर ने आखिर सीटी बजा ही दी, घरघराते हुए अधभरी बस रेंगने लगी.
चीन की लड़ाई के समय आया था वह दिल्ली, अपने मामा के पास, आया क्या मुफलिसी जबरन उसे खींच लाई थी. पिताजी पहले ही चल बसे थे, घर में माँ, दो छोटे भाई और एक बहन, उपरों की कुछ नाम मात्र की खेती. माँ इधर- उधर कुली बौल करती तब कही जाकर पेट में कुछ जाता, स्कूल भी तभी सुहाता है जब पेट में कुछ गया हो, हालांकि स्कूल मुफ्त था पर कापी किताबों के लिए तो पैसे चाहिए थे जैसे तैसे हरक सिंह के दफा पांच पास की थी फिर लग गया वह भी मजदूरी में पत्थर ढोना, गारा बनाना, लकडियां सारना, घास ढोना यही काम मिलता उसे, उसका बचपन कब आया और कब चला गया उसे पता ही नहीं चला. घर में मुफलिसी का आलम यह था की उसके भाई बहन लोगों के कट चुके खेतों में गिरे हुए धान और गेहूँ की बालियाँ इकठ्ठा करते ताकि कुछ दिन का गुजारा हो सके. बारह साल का हरक सिंह चौदह- पन्द्रह का तो लगता ही था, उसके मामा ठाकुर सिंह इस बार जब छुट्टी में घर आये तो बहन का दुख उनसे देखा नहीं गया और ले आये हरक सिंह को दिल्ली.
ठाकुर सिंह महालेखाकार के कार्यालय में चपरासी थे, सेवानगर में एक कमरे का सरकारी मकान मिला हुआ था, उनका लड़का महेश साथ ही रह कर दसवी में पढ़ रहा था, पत्नी और बेटी हेमा गावं में रहते थे.
महालेखाकार मल्होत्रा जी भले इंसान थे उन्हें एक घरेलू नौकर की जरूरत थी ही हरक सिंह से अच्छा कौन मिलता एक तो ठाकुर सिंह का भांजा ऊपर से पहाड़ी. लगा दिया बंगले पर काम साफ – सफाई, बाजार से समान लाना, बगीचे की देखभाल यही सब था. रहने के लिए उसे सर्वेंट क्वाटर भी दिया लेकिन हरक सिंह रहा अपने मामा के पास ही. खा पी कर कुल वेतन था चालीस रूपये माहवार. जल्द ही हरक सिंह ने अपने काम और व्यवहार से सबका मन मोह लिया.
पहली तनखा में से तीस रूपये का मनीआर्डर हरक सिंह ने अपनी माँ को किया. माँ रूपये पाकर फूली नहीं समां रही थी उसके लिए रुपयों से जायदा खुशी थी की उसके हरकुआ ने भेजे है. वह इस बात का बखान आँखों में आँसू भर कर कई दिनों तक पूरे गावं में करती रही. करती भी क्यों नहीं खुशी बांटने से बढ़ने वाली जो ठहरी. हरक सिंह के मनीआर्डरों का सिलसिला चलता गया घर की हालत में भी धीरे-धीरे सुधार आता गया, भाई बहन स्कूल जाने लगे.
मल्होत्रा साहब रिटायर होने वाले थे सो जाते जाते उन्होंने हरक सिंह को अपने ही कार्यालय में चपरासी रखवा दिया सरकारी नौकरी और वेतन एक सौ पचास रुपये माहवार. हरक सिंह का जीवन ठीक ठाक गुजरने लगा. इस बीच मामा गुजर गये, उनकी जगह महेश को नौकरी मिल गयी, महेश का विवाह भी दिल्ली में हुआ था छोटा मकान दो पति- पत्नी के लिए ही नाकाफी था इसलिए हरक सिंह ने उनकी शादी से पहले ही अपने लिए आनंद पर्वत में किराये पर एक कमरा ले लिया.
बस एक झटके के साथ मोहन नगर स्टेशन पर रुकती हैं बाहर “ चाय गरम, चाय गरम,समोसे, खट्टी- मीठी संतरे की गोलियाँ” की आवाज आने लगी. हरक सिंह का गला सूख रहा था उसने संतरे की गोलियों का पैकेट खरीद लिया. एक गोली मुँह में डालते ही उसे ‘मीठी’ की याद आई. उसके किराये के मकान की पहली सुबह किसी ने दरवाजा खटखटाया वह आँखे मलते हुए उठा देखा तो दरवाजे पर सावली सी बीस- इक्कीस साल की लडकी चाय का ग्लास लिए खड़ी थी-
“माँ ने भेजी है”
“रख दो” वह बोला
वह चाय का ग्लास रख मुस्कुराती हुई सीढ़ियाँ उतरने लगी.
मीठी मकान मालिक रमेश गौतम की इकलौती संतान थी, वह दसवी के बाद स्कूल छोड़ चुकी थी. रमेश गौतम दो ऑटो का मालिक था कुछ ब्याज पर कर्जे का काम भी करता था, आस पास के इलाके में उसकी छवि एक दबंग की थी इलाके में लोग उससे डरते भी थे. सरकारी नौकरी वाले सुन्दर हरक सिंह से अच्छा जवाई उसे कहाँ मिलता, रमेश की पत्नी उमा को भी वह पसंद था. धीरे- धीरे मीठी को भी हरक सिंह अच्छा लगने लगा. उधर हरक सिंह कुछ समझ पाता एक शाम रमेश ने हरक सिंह से कह ही डाला
“देख भई हरक तू मीठी से शाद्दी करले, मेरी मान के नहीं मेरे पास शाद्दी के बाद तेरा ही है सब मकान, गाड्डी सब”
हरक सिंह “जी वो” करता ही रहा उससे कोई जवाब देते नहीं बन रहा था. रमेश गौतम के सामने डर के मारे वह इंकार करने का साहस ही नहीं जुटा पाया.
रात को उसे नींद नहीं आई, एक तरफ मकान, धन- दौलत था दूसरी ओर ईजा का बीमार जर्द चेहरा जो उसके लिए बहू की आस संजोये गावं गावं से लड़कियों के चिन्ह मगा जोशी ज्यू से मिलवा रही थी. सुबह वह दफ्तर के लिए निकला आँगन में खड़ी मीठी को उसने एक नजर देखा वह भी कनखियों से उसे ही देख रही थी.
दफ्तर में उसका एक ही जिगरी दोस्त था दोरहाट का भगत, भगत से उसने सारा हाल कह सुनाया. भगत बोला-
“पगली गया है हरक दा, पहाड़ में लडकियों का अकाल है क्या, अपना गौ – गाड छोड़ी कहाँ फस रहा है इन चक्करों में”
“भगत यार बता क्या करू” हरक सिंह बोला.
“छोड़ दे वह मकान” भगत ने सलाह दी.
हरक सिंह अब सोचने लगा की अभी महिना भर भी हुआ नहीं, एक महिने का किराया पेशगी दिया, चार सौ का घर का सामान लिया सो अलग, सामान वापस तो आ नहीं सकता नया मकान नया सामान लेने की हिम्मत हो नहीं रही. चलो कुछ दिन रिश्तेदारों का यहाँ ही रहा जाय मकान अगले महिने देखा जायेगा. शाम को वह चल दिया पंचकुइयां रोड अपने दूर के मौसेरे भाई के घर. खूब आव भगत हुई, पूछने पर भगत ने बताया की वह आजकल मिन्टोरोड की झुग्गियों में रह रहा है यह पता भी उसके दिमाग में इसलिए आया क्योकी भगत वहाँ रहता था. अगली सुबह नहा धोकर वह दफ्तर पहुँच गया. शाम को छुट्टी के बाद वह अपने ही गावं के ताल बखई के ख्यालीराम पांडे के घर इरविन के क्वाटर में पंहुचा, ख्यालीराम का घर छडों का अड्डा बना हुआ था, गरमी के दिन थे दो तीन दिन से वह एक ही जोड़ा पहने घूम रहा था लिहाजा उनपर बदबू आनी लाजमी थी, हरक सिंह ने कपड़े धो सुखा दिये, ख्यालीराम की लुंगी से उसने काम चला लिया. सुबह तक उसके कपड़े सूख चुके थे उनहें पहन कर वह फिर काम पर चल दिया. हरक सिंह रोज इसी तरह नरेश गौतम के डर से रोज अपना रैन बसेरा बदलता रहा. समस्या कपडों की आ रही थी इसका हल भी उसने निकाल लिया खादी से वह एक जोड़ा सफेद कुरता पायजामा, एक गमछा और एक झोला खरीद लाया, एक कंघी, दंतमंजन और ब्रश बाजार से लिया बस हो गयी दैनिक उपयोग की सारी वस्तुयें.
एक माह कब बीता पता ही नहीं चला, हरक सिंह ने जब हिसाब लगाया तो वह एक महिने में काफी कुछ बचा चुका था. लोगों में अपने गावं देहात के लोगों के प्रति जो अपनापन था वह उसे भरपूर मिल रहा था. इधर अलग अलग लोगों से मिलने और बतियाने में उसे आनंद आने लगा था. घर की जिम्मेदारियां भी बहुत थीं इस तरह थोड़ा बहुत पैसा भी बच रहा था.
उधर ईजा ने उसके लिए दुल्हन ढूंढ ली थी, विवाह भी हो गया. साथ ही साथ छोटी बहन का रिश्ता भी कर दिया गया. दोनों भाई आर्मी में चले गये. साल भर बाद उनके भी घर बस गये. परिवार बढ़ता गया तो दो मकान भी गावं में हरक सिंह ने खड़े कर दिये. बहुओं में खट पट होने लगी तो अपने जीते जी ईजा तीनों को न्यार कर गई. हरक दा की पत्नी केवल एक लड़की ही जनम पायी, लड़के की ललक में हरक सिंह ने उसे अल्मोड़े और हल्दुवानी के डाक्टरों को दिखाया लेकिन आखिरकार उसने हार मान ली, हरक सिंह इसे माथे का लिखा समझा और अपने दिल को समझाने लिया.
बस गजरोला के पास किसी ढाबे पर रुकी तो उसकी तन्द्रा टूटी. कुछ सवारियां खाना खाने बस से नीचे उतर चुकी थी वह भी नीचे उतरा, लघुशंका गया भूख उसे लगी नहीं थी उसके विदाई के लिए दफ्तर वालों ने जलपान का इंतजाम किया था उसने भी वही कुछ खा लिया था, एक सिगरेट फूंक कर वह बस में जा बैठा. हरक सिंह सोचने लगा आज से बीस साल पहले जब वह पहाड़ आता-जाता था तो कितना प्यार होता था लोगो में बस में सफर करते हुए एकदूसरे से बातचीत करते चाय और खाने को पूछते आज चाह कर भी ऐसा कोई नहीं करता पता नहीं सामने वाला क्या मतलब निकाल बैठे. पहले की बात ही कुछ और थी, पहाड़ आते- जाते वह लोगों से बातचीत करता, मिलनसार तो वह था ही लोग भी उसे पता दे कभी घर आने को कहते हरक सिंह एक कापी में उनके नाम पते लिख लेता और कहता की
“आऊंगा कभी आपके दर्शन करने”
कापी में नाम पते शादी ब्याह, नामकरण, शमशान जहाँ भी लोग मिलते वहाँ से जुडते गये, पते बेहिसाब थे किसी के घर आज जाओ तो दो साल बाद ही उसके दोबारा दर्शन होते. न कोई उसके आने का बुरा मानता न किसी पर वह बोझ बनता उल्टा वह जहाँ भी जाता खाली हाथ नहीं जाता कुछ न कुछ ले ही जाता केले, सन्तरे, आम, सेब, मिठाई. साथ ही गावं देहात और परिचितों की खबरें भी लाता यह खबरें चिठ्ठी पत्रों से तेज हरक दा के जरिये उन तक पहुचती थीं. जमुना पार में वह सर्दियों में ही जाया करता था क्योकी वहाँ गर्मियों में बहुत बिजली गुल रहती थी और मच्छर भी बहुत थे, वह बेघर था इसलिए बीमार पड़ने से डरता था, यह भी आश्चर्य था की वह इतने वर्षों में बीमार नहीं पड़ा भोजन वह सात्विक ही करता, शराब से तो वह कोसों दूर ही रहा.
जब हरक सिंह ने सफेद कुरता पायजामा पहनना शुरू किया तो भगत ने ही नाम दिया उसे सफेदा, रंग भी उसका गोरा सफेद ही था. दफ्तर में तो वह सफेदा नाम से मशहूर हो चुका पता नहीं कैसे पहाड़ के उसके परिचित भी उसे सफेदा पुकारने लगे.
मकान न ले परिचितों के यहाँ रात गुजारने की मानों उसने कसम खा ली थी. हालांकि भगत ने कई बार उससे यह यायावरी छोड़ने के लिए कहा भी, यहाँ तक कहा की-
“हरक दा रह जा मेरे साथ ही, मत देना किराया मेरा परिवार तो गावं में ठहरा. क्या करेगा इतने पैसे जोड़ कर, लड़की का तूने विवाह कर ही दिया है बहुत कमा चुका है दो बुड्डा- बुढिया के लिए”
केवल हँस भर दिया सफेदा.
बस तेज गति से आगे भागी जा रही थी, पिछली कई यादें चलचित्र कि तरह हरक सिंह को याद आने लगी बीच बीच में उसे झपकी आती तो कभी मीठी तो कभी ईजा का चेहरा नजर आता वह चौंक कर आँखे खोलता फिर वही पुरानी भुली यादों का सिलसिला चलने लगता.
पिछले कुछ सालों से वह यह भी देख चुका था की कुछ लोगों अब पहले जैसा प्रेम भाव नहीं रहा, न अब पहले जैसी आव भगत रही ऐसे कई लोगों का नाम वह अपनी लिस्ट से काट चुका था.
बस हल्दुवानी पहुँच चुकी थी स्टेशन पर कैसेट की दुकानों से एक साथ कई पहाड़ी गाने जोर – जोर से बज रहे थे, चाय पीकर वह बस में बैठ गया बस आगे बढ़ी तो धुंधले पहाड़ सामने पड़ने लगे ठंडी हवा जो उसकी चिरपरिचित थी उसके गालों को सहलाने लगी. चालीस साल वह बिना घर के दिल्ली में गुजार आया उसके मन में इसपर गर्व और आत्मग्लानी के मिलेजुले भाव उभर आये. उसे एक तरफ तो लग रहा था की उसने जिन्दगी की लड़ाई जीत ली लेकिन अपने संबंधियों और परिचितों के भरेपूरे जीवन को देख उसे अपने अधूरेपन का अहसास होने लगता लगने लगता कि वह एक हारे हुए सिपाही की तरह घर लौट रहा है.
May
03
Voice against Child Labor
Team Bedupako raises its voice against Child Labor all this month…
आमदनी के लिए बच्चों से काम कराना है गलत…बल मज़दूरी दंडनीय है यजमान…
ना बच्चों से काम कराइये…ना ही ऐसे किसी व्यवसाय में दीजिये योगदान…
यदि आप १४ वर्ष से कम आयु के बच्चे से अपने घर, दफ्तर या दुकान पर काम कराते हैं..तो आप है समाज और कानून के गुनाहगार…
बाल मज़दूरी को जड़ से मिटाइए…बनिए देश के उज्वल भविष्य में भागीदार…
May
03
उत्तराखंड की प्राचीन और परंपरागत प्रोद्योगिकी –ओखली(Okhali), ऊखव
ओखली एक प्राचीन प्रोद्योगिकी का एक बहुत-ही बेहतरीन नमूना है | जब चक्कियां नही हुआ करती थीं , तब ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रयोग कूटने-पीसने के लिए किया जाता है | इसमें प्रायः छिलके वाला अन्न कूटा जाता है | ओखली में प्रायः धान, मडुवा, जों,बाजरा,गेहूं आदि कूटा जाता है | ओखली का निर्माण एक ठोस बड़े पत्थर में नीचे की ओर संकरा गड्डा बनाकर किया जाता है | इसमें अनाज कूटने के लिए मूसल का प्रयोग किया जाता है, जिसे साल या शीशम की लकड़ी से बनाया जाता है | इसके एक सिरे पर लोहे का एक छल्ला लगाया जाता है, जिससे अनाज आसानी से कूटा जाता है | ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसका प्रयोग किया जाता है | अनाज के अतिरिक्त कई प्रकार के तिलहनों को भी ओखली में कूट कर उनसे तेल निकला जाता है |
ओखली प्रायः प्रत्येक घर के आँगन में एक खुले स्थान पर होती हैं | प्रत्येक गाँव में एक या एकाधिक छत युक्त ओखलियाँ भी होती हैं | एक कमरे के भीतर कभी-कभी दो-दो ओखलियाँ होती हैं | इन कमरों की लम्बाई लगभग 8 फीट और चौड़ाई लगभग 6 फीट होती है | धूप और वर्षा में इन्हीं ओखलियुं में धान आदि कूटे जाते हैं | इस कमरे वाली ओखली को “ओखलसारी ” कहा जाता है | ये ओखलसारियां सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों प्रकार की होती हैं | आज भी शादी व्याह के अवसर पर सभी ग्रामीण महिलाओं को बुलाकर मसाले आदि ओखली में ही कूटे जाते हैं |
May
02
फसल
पहाड़ी सीढ़ीदार खेतों में हरी गेंहूँ की बालियाँ अब पकने को तैयार ही थी चैत की गर्म ठंडी मिली जुली हवा में रह रह कर गेहूँ की फसल की खुसबू फैल रही थी. फसल भी इस बार बहुत अच्छी हुई, दिन दिन भर पहरा दे बानरों से बचा कर रखी गई थी. भागुली आमा ने गेहूँ की दई (मनाई) के लिए गोबर और लाल मिट्टी से अपना आँगन लीप कर चमका डाला. हिमतुआ भी पांडेखोला से एक बैल खरीद लाया उनका बूढा बैल पिछले पूस के जाड़े को नहीं झेल पाया और दम तोड़ गया था. खिमुली काकी में अपने भकारों की सफाई कर उनमें कीड़े मारने की दवा डाल दी थी. हरुआ पार की बखई से गौत (गौ मूत्र) मांग लाया ताकि महोटों को सुखा कर उनपर छिड़क सके. पुरे गावं में गेहूँ मनाई की तैयारियां जोरों पर थी, उधर पनरदा की चिन्ता दोगुनी थी उनकी बेटी लछिमा की बारात एक हफ्ते बाद आने वाली थी इधर फसल का काम उधर शादी के सौ काम.
अगली सुबह हुई तो बदल छाए हुए थे और गरज भी रहे थे हवा भी ठंडी और तेज थी, पधान बुबू लोटा ले दिशा मैदान को लिकले तो ऊपर नजरें उठा कर बडबडाये ‘य गडाट- भिडात भाल लछन नहीं लग रहे हैं’. थोड़ी देर में बारिश भी होने लगी, तेज होती बारिश के साथ ही लोगों में फसल की चिन्ता भी बढ़ने लगी, अचानक आसमान से ओलों की बौछार गिरने लगी, बूढी कमई आमा खाट पर पड़े-पड़े अपनी बहुओं से कह रही थी, ‘डाव पडगे आब खाओ…. रवाट’. दोपहर होते होते सब तरफ सफेदी ही सफेदी थी मानो पहाडों पर कफन ओढा दिये गये हों और मौजूद थी वीरानी मौत जैसी ठंडी. गाव वाले असहाय अपनी महनत को जमीभूत होता देख रहे थे, मानों शेर हीरण के बच्चे को उसकी आँखों के आगे नोच खा रहा हो. सन्नाटा बना रहा रातभर सड़क मार्ग बंद हो गया था इसलिए सन्नाटे को चीरता कोई ट्रक भी नहीं गुजरा, बिजली भी गुल हो गयी थी. सुबह जब नरसिंह सुबदार का रेडियो घरघराया तो उससे पता चला कि अल्मोड़े जिले में भीषण ओलावृष्टि से जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया, फसल नष्ट और कई स्थानों से सड़क संपर्क भी टूट गया है.
विधान सभा चुनावों का मौसम आने वाला था नेताओं को चुनावी रोटी सकने का एक सुनहरा अवसर मिला कैसे जाया करते, एक हफ्ते बाद सफेद टोपी लगाये गले में तिरंगा पट्टा डाले कुछ नौनिहाल नेताओं की पौध गाँवों में दिखाई देने लगी, ‘आमा जरुर आना, बूबू जरूर आना, काकी आप समझदार हो आस पड़ोस की औरतों को भी लाना अगले इतवार को हाई स्कूल के मैदान में आपके माननीय विधायक जनसभा करने आ रहे हैं, फसल चौपट हुई है उस बारे में सरकार तक बात पंहुचानी है जरुर आना’. पहाड़ी लोगों में नेताओं के आश्वासनों पर भरोसा न करने जैसी कोई बात होती नहीं सो लोगों में कुछ तो आस जगी चलो कोई तो हमें सुख दुख में पूछने वाला है. नर सिंह सुबदार बोले ‘नेता आ रहा है बल उससे स्कूल, खड़नचा, पानी के लिए भी पूछ लेंगे हिटना रे सब’.
इतवार को हाई स्कूल के मैदान में तिल रखने की जगह नहीं थी, कुछ औरतें तो स्कूल के पार के धार पर ही आसान डाल कर बैठ गई, पास के दुकानों की चहल पहल भी बढ़ गई थी रतन सिह सुबह से दस- बारह किलो जलेबी बना चुके थे उनके बेटे रनजीति को चाय बनाने में सांस लेने तक की फुरसत नहीं थी. दूर धुरपाटो से लोगों के आने का तांता लागा था मानो कौतिक में आ रहे हों. करीब बारह बजे सायरन बजाती पुलिस की गाड़ी आई उसके पीछे ए़क सफेद कार. कार में से एक सहेद्पोश के निकलते ही आस पास खड़े चमचों ने जय जयकार की तो कई गाववालों ने बिना कुछ सोचे समझे ही जयकारा लगाना शुरू कार दिया. मंच पर पुष्पमालाओं से स्वागत के बाद जब विधायक जी माइक पर दहाड़े तो आस पास की घाटियाँ गूंजने लगी. काफी देर तक सुनने के बाद जब पनुआ काल के पल्ले कुछ नहीं पड़ा तो बगल में बैठे केदार कका से बोला ‘कदुक बोरी ग्यो दियाल हों यो’. सभा समाप्त हुई कोई समझा कोई नहीं इतना तो सब समझे की फसल बरबाद हुई है इसलिए नेताजी सरकारी गल्ले से हर घर को पांच-पांच बोरी गेहूँ दिलाएगें, कई बूढी औरते तो सफेदपोश नेता को आशीष देती घर जा रहीं थीं. दुकानदार आज बहुत खुश थे, रनजीति आज अंगरेजी का अध्धा चढ़ा कर चने और आलू के गुटुक बेचने वाले भौंन दत्त से कह रहा था ‘दाज्यू इतनी बिक्री तो शिवराती के कौतिक में भी नहीं ठहरी’.
कुछ दिनों बाद गावों में भगवा रंग भी दिखाई देने लगा, ‘हमारे प्रदेश अध्यक्ष अगले मंगलवार को हाई स्कूल मैदान में विशाल जन सभा को संबोधित करेंगे अवश्य आयें’. फिर लगा जमघट, बिकने लगी रतन सिंह की जलेबियां और भोंन दत्त के चने और आलू के गुटुक. इस बार भगवा नेता बोले ‘यह सरकार निकम्मी है देश में इतना गेहूँ है की रखने के लिए सरकार के पास गोदाम नहीं, लाखो टन अनाज खुले में सड़ रहा पर यह भ्रष्ट सरकार जरुरतमंदों को एक दाना भी नहीं देगी. हम संसद का घेराव करेंगे जब तक प्रत्येक प्रभावित परिवार को आठ-आठ बोरे गेहूँ राहत के तौर पर नहीं मिल जाते हमारा आंदोलन जारी रहेगा’ धुमा कोट का लछमी अपनी पत्नी से बोला ‘हाड़ तोड़ मिनहत करने पर भी दो बोरी नहीं होने वाला ठहरा ये आठ देंगे, का धरेगी पनुली’ ‘हाई तमुके भौते बाकि हो रही है पैली मिल तो जाने दियो’ पत्नी ने झिड़क दिया.
धान की फसल का समय आ गया था उपरों के खेतों में धान बो दिये गए, तलाऊ की रोपाई के लिए धान की पौध की क्यारियाँ बना दी गयी, फसल की बर्बादी का गम दबा कर किसान सदियों से चली आ रही नियति को जी रहा था, जिनके पास पुराने गेहूँ थे उनका तो ठीक ठाक चल रहा था बाकी भागे राशन की दुकानों की तरफ, वक्त की नजाकत को भांपते हुए बलुवा जैसे दुकानदारों ने दस – दस किलो की आटे की थैलियां हल्दुवानी से मंगा ली.
उधर लाल झंडा भी लोगों सच्चा हमदर्द बन आ धमका, मजमा फिर लगा पर पहले जितनी भीड़ नहीं दिखी कामरेड बोले अपना हक मांगने से नहीं मिलता उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है, वर्ग संघर्ष कोई चाय पार्टी नहीं..’. कुछ दिनों में हाथी ने भी छोटी सी दलित आधारित सभा कर डाली. पनुआ हिमत राम से चुटकी लेते हुए बोला ‘हिमत दा य हाथी वाले तियर भकार तो भर ही देंगे, हमुके मिलो नी मिलो’.
चनाव की काव – काव भी बंद हो गयी. गावं वालों से सरकारी राहत का इंतजार अब सहा नहीं जा रहा था कई लोग रोज दुकानों में जा समाचारपत्रों को चाट आते, कई तो समाचार आते ही रेडियो से चिपक जाते कि कहीं राहत की कोई खबर तो नहीं आई. उधर धान मान लिये गये, गेहूँ की बोआई सर पर आ धमकी थी, एक दिन खबर आई की विकास केन्द्र पर गेहूँ मिल रहे हैं पहले दिन पहले पहल पहुचने वाले ठगे से रह गये जब पता चला की बीज के लिये चार – चार किलो गेहूँ हर परिवार को राशन कार्ड पर दिये जा रहे हैं.
समाप्त.






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