Mar
13

चुनाव हारण पर भगार , दोषारोपण , बहानेबाजी का गुर

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चुनाव हारण पर भगार , दोषारोपण , बहानेबाजी का गुर

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चबोड़ , चखन्यौ , चचराट ::: भीष्म कुकरेती
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यदि आप चुनाव हार गेवां तो तौळs कै बि कारण से छुटकारा पाए जै सक्यांद -
१- जनता की समझ मा हमर बात नि ऐ कि हमन कथगा कार उन्कुण
२-विरोधी पार्टीन हमसे ज्यादा , बिंडी , भौत बिंडी झूठा आश्वासन देन
३- हमर ईख शब्दकोश नि छौ तो हम नया नया आश्वाशन नि दे सक्यां
४- विरोध्यूंन झूठी अफवाह फैलाई कि हमन गुंडों तै टिकेट देन
५- हमन दिल्ली मा इथगा काम कार अर विज्ञापन गोआ अर पंजाब मा बि देन पर ईं अनपढ़ जनतान हमर झूठ विज्ञापनों पर विश्वास ही नि कार
६-जितण वळी पार्टिन धन अर बाहुबल को प्रयोग हम से अधिक कार
७- उंका ज्यादा मंत्री चुनावी कैम्पैन मा छा
८- प्रधान मंत्रीन गैर पारम्परिक ढंग से रैली करिन
९- जातिवाद का खेल चल
१० – हमर विरोधी EVM मशीन की सहायता से चुनाव जीत
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Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India , 13 मार्च 2017
*लेख की घटनाएँ , स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने हेतु उपयोग किये गए हैं।

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Mar
02

श्री सत्यनारायण व्रत कथा” (गढ़वाली म)”

श्री सत्यनारायण व्रत कथा” (गढ़वाली म)”
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कृष्ण कुमार ममगाईं
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( श्रीमान भीष्म कुकरेती जी का ईं कथा थैं publish करना का सुझाव (face book comment in Group – उदयपुर-ढांगू ” मेरी जन्मस्थली” ) का संदर्भ मा पूरी कथा गढ़वाली छंद म फेस बुक पटल पर प्रस्तुत कन्नु छौं । प्रस्तुति थैं फ़ेसबुक पर संकलन करना हेतु मेरी बिटिया रेणुका मैठानी (ग्राम झैड़) कू स्प्रेम आभार। )
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श्री सत्यनारायण व्रत कथा (संक्षिप्त गढ़वाली अंक)
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ध्यान एवं पूजा :
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ॐ श्री गणेशायः नमः ।
श्री नादबुद भैरवायः नमः ॥
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ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी
भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च,
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव:
सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तुः ।।
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ॐ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तम् येन चराचरम
यत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ।
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श्री सत्यनारायण व्रत कथा – गढ़वाली म
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प्रथम अध्याय:
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शुभ घड़ी एक दिन नैमिशारण्य मां
पुछदना शौनकादिक ऋषी सूत मां ॥
क्या कथा वरत क्या नेम धर्म ह्वलो
पाप संसार को जां से कुछ कम ह्वलो ॥
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बोलि सूतन कथा जो कही विष्णु ना
घूमि नारद गई छौ जबरि धाम मां ॥
होया खुश विष्णु नारद से सब सूंणि की
अर बता सब कथा सत्य–नारैंण की ॥
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जू करलु ईं कथा छल कपट छोड़ि की
पालु सुख शांति ये लोक परलोक की ॥
पुछद नारद कि कनु वरत, क्या रीत चा
कैन कैरी किलै वरत, क्या मीलि चा ॥
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ब्वल्द भगवान यां से खतम हूँद सब
सोक संताप, हर डौर हर रोग चा ॥
पूरि हूंदा सभी इच्छा सौभाग्य की
चाहे सन्तान, धन धान्य कल्याण की ॥
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हूंद पूरी जबरि जै कि मनकामना
वरत भक्ती से कैरा तई साम मां ॥
पिंजरि सवया चढ़ै घौर बांमण बुलै
सूंणा सुन्दर कथा सत्यनारैण की ॥
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कैरा कीर्तन भजन सब्बी भै-बन्ध गण
सुमिरा भगवान थैं कैरा सब शांत मन ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा प्रथमोध्याय समाप्त ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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दूसरा अध्याय:
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कैरि कैना कथा पैलि सुण आज यो
काशिपुर मां छौ बांमण स्यु निरधन बड़ो ॥
देखि नी साक्यो दुख तैकु भगवानना
बुढ्या बांमण बणीं बोलि नारैणना ॥
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घुमदि दुख मां किलै सुद्दि गंगजांणु छै
कत्था नारैण की क्यों तु करदू नि छै ॥
फिर बता सब नियम फल धरम बरत का
अर बतै सब मेरू द्यबता ह्वा लापता ॥
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फिकर से उंणदो पापी रहे रात भर
किरपा नारैण की भीख चौगुणि मगर ॥
फिर कथा कैरि अर सदनि करदू रया
अर कथा कैरि कैरि कि बैकुन्ठ गा ॥
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पूछि सौनक ऋष्युन फेर श्री सूत मां
कैरि कै कैन यो बरत संसार मां ॥
सूंणा विष्णु का मुख की कहीं सूत की
अर रचीं कृष्ण की च फलीं दूब सी ॥
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एकदां जब स्यु बांमण घणां ऐश मां
छौ कनू कत्था भै बन्धु का बीच मां ॥
प्यासु आया लकड़हारु तै द्वार पर
लेकि आनन्द परसाद गा घार पर ॥
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भोल करना कथा तैन प्रण यो करे
बिठगि लखड़ौं कि ब्यचणां कु सिर मां धरे ॥
किरपा नारैण की ह्वा कमाई डबल
भोग परसाद ले की कथा का सकल ॥
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यां का परताप से पुत्र सन्तान पा
ख्याति बैभव करी ऐश बैकुन्ठ गा ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा द्वितीयोध्याय समाप्त ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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तीसरा अध्याय:
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भद्रशीला नदी को किनारो छयो
राजा राणी दगड़ि उल्लकामुख छयो ॥
छा कना कत्था सी सत्यनारैण की
आया लाला तबरि एक कक्खी बटी ॥
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तैन सूंणी कथा पाय परसाद चा
पूछि क्या वरत अर यांकु क्या अर्थ चा ॥
पुत्र पांणू कनू छौं बता राजना
ईं कथा से उ मिलदा जु नी भागमां ॥
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पकड़ि नौका अपड़ि लाला गा घार कू
जिकुड़ि अकतांणि छै जननि मां ब्वनु कू ॥
छै नि सन्तान तैकी न आशा रती
नाम छौ तैकि पत्नी को लीलावती ॥
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ब्वल्द सैरी कथा करद उचणो भलो
ह्वैलि सन्तान फिर मी भि कत्था कलो ॥
सूंणि भगवानना आश बच्चा कि ह्वा
माह दस बाद इक नौनि ना जन्म पा ॥
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नौनि कल्लावती छै बढ़दि रात दिन
ब्वलद मां नामकरणा कि पूजा का दिन ॥
उचणो धरयूं छयो कामना पूर्ण ह्वा
सत्यनारैण को बरत अब कैरि द्या ॥
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लाला लाला छयो खर्च कनमा कदो
ब्वलद ब्यो का समय ईं का कत्था कलो ॥
बीत्या दिन नौनि होया जवान जबा
भेजि इक दूत ब्यो खोजणा को तबा ॥
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लाला कंचनपुरा को मिली एक गा
फिर दमोदांणि ब्यो की भि झट बाजि गा ॥
सौदाबाजी से भगवान नाराज छा
पूजा करना कु ये वक्त स्यू बिसिरी गा ॥
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लालाजी अर जवांई चल्या तब खुशिम
कैरि ब्यापार इक नगरि रत्नापुरिम ॥
राजा तैकू छयो चन्द्रकेतू भलो
दैव परकोप राजा को डाका पड़्यो ॥
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चोर सब राज को धन उठाई लया
रांदु जख लाला तख छोड़ि सब भागि ग्या ॥
लीग्या पकड़ी सिपै राजा का तौं दुयुं
अर उठै लाया सामान तौंकू ज्वड़यूँ
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यख त रुंदन दुई जेलु की सीख मां
वख त घौरम डकैती पड़ी बीच मां ॥
घर मां लीलावती नौनि बुक्की रया
भीख मंगदा भिखारी उ दर दर गया ॥
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एक दिन जब कला भीख कू जांणि छै
रस्ता बामण का घर मां कथा हूंणि छै ॥
पंहुचि घर देर से वा कथा सूंणि की
पूछि मांन किलै देर मूं आंणि छै ॥
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सुणद ही वरत की बात आ होश मा
छौ धरयूं हमना उचणों कभी जोश मा ॥
हैंका दिन स्वारा भार्यूं सहित स्या दुखी
करद नारैण को वरत हूंणूं सुखी ॥
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मंगद अपणों पती अर पती बेटि कू
करलु फिर वरत मेरा मिली जाला जू ॥
सत्यनारैण इतगा मां ही खुश होया
चन्द्रकेतू उ राजा का सुपन्या गया ॥
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राजा थैं अपड़ि गलती कु अहसास ह्वा
वैन धन धान्य देकी सि द्वी छोड़ि द्या ॥
खुलनि बेड़ी मिल्यो माल मय सूद का
छन इ किस्सा वे नारैण का रूप का ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा तृतीयोध्याय समाप्त: ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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चौथा अध्याय:
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ह्वैकि खुश द्वी का द्वी जब चल्या घौर कू
साथ मां छै टनाटन भ्वरीं नाव जू ॥
फिर परीक्षा हे नारैण तू धन्य छै
रूप मां जोगि का इबरि पुछणू कु ऐ ॥
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त्यारा पुछदा हि ब्वलदन उ अभिमान मा
घास पत्ता भ्वर्यां छन हमरि नाव मा ॥
बोलि इन होलु अर जोगि रस्ता लगे
तैका जाँदा हि गरि नाव हलि हवे गये ॥
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घास पत्ता भ्वर्यां जब द्यखिनि नाव मा
चौरु चलि गे झटगि देनि फिर भाग ना ॥
भगनि अकतैकि वे जोगि का पैथर
धन्नि बरमन्ड तौना खुटौं ऐथर ॥
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माफ़ि मांगी त भगवान ना बोलि दे
मेरि पूजा बिमुख ह्वे तु इन कैरि दे ॥
अब तु रूंणु छै फिर करदु मी माफ त्वे
मेरि पूजा करी की तु फिर घौर जै ॥
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जांद वापस त फिर नाव देखी भ्वरीं
करद तन मन से पूजा छै हालत डरीं ॥
एकदां फिर दशा तैकि ह्वा टपटपी
पौंचि ग्या अब गवां पास बिन्डि दिन बटी ॥
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भेजि रैबार एक दूत का हाथ मां
किरपा नारैण की लीला छै पूजा मां ॥
छोड़ि तैन कथा सत्यनारैण की
पाय जब सूचना अपड़ा पति आंण की ॥
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ब्वल्द बेटिम तु परसाद थैं खैकि ऐ
जांदु मी द्यखणुकू त्यारा बाबू जवैं ॥
भागि ब्वै ऐथर नौनि पैथर बटी
छोड़ि परसाद स्या भी कथा से उठी ॥
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कोप भगवान कू इक दफा फेर हवा
तैंकु बाबू उतरि अर पती डूबि ग्या ॥
छौयु मातम फकत रूंण कू ही अबा
डूबि गै छौ जंवै, नाव, कमयूं सबा ॥
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नौनि कल्ला त रुवे रुवे कि बेहोश हवा
हूंदु छौं मी सती ब्वल्द जब होश आ ॥
लाला अर लीला म्योली लगाणा छया
माया भगवान की छै ऐड़ाणा छया ॥
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अंत मां सोचि किरपा च नारैण की
माफि मांगी कि तौना स्यु उचणो करी ॥
देखि नी साक्यु फिर दुख यु भगवान ना
कैनि आकाशवाणी सि असमान मां ॥
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तां थैं सूणी कलाबेटि फिर घौर गा
खैकि परसाद तैंना पती अपणो पा ॥
लाला इक बार फिर हवा अमन चैनमा
अर प्रभू प्यार का आंसु छा नैन मा ॥
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करद रैनी कथा तब सि तै दिन बटी
आंद छै जब भि संगरांद, पूरण-मासी ॥
पांदा रैनी सभी सुख कथा करदा छा
सब कथा कैरि सूंणिं कि बैकुन्ठ गा ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा चतुर्थोध्याय समाप्त: ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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पांचवां अध्याय:
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फिर बता सूतना त्वंगध्वज की कथा
पाय वेना भि दुख जब नि परसाद खा ॥
करदा छा ग्वेर छोरा कथा बोण मा
द्याय परसाद तै थैं भि तख औंण मा ॥
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खाय नी तैन परसाद अपमान का
घरमा सौ नौना अर धन खतम होई गा ॥
ऐकि फिर तैन ग्वैरुम करैकी कथा
खैकि परसाद पैनी जु कुछ खोइ छा ॥
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फिर नियम से कथा सदनि करदू रया
अर कथा कैरि का वो भि बैकुन्ठ गा ॥
बोलि सूतन हे सौनक रिष्यूं सूंण अब
जन्म अगल्यो कथा कैरि छै जौन तब ॥
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आया बामण सतानन्द सुदामा बणीं
पाय मुक्ती कृष्ण की दगड़ि छै घणीं ॥
भील गुहराज बणिं स्यू लकड़हारु छौ
सेवा रामै करी तैन भी मोक्ष पौ ॥
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उल्लकामुख जनमि राजा दशरथ छयो
रंगनाथै दया से छौ स्यो भी तरयो ॥
बणद मोरध्वज साधु लाला छौ जू
नौना थैं काटि भगवान थैं दींद ऊ ॥
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आरि ना काटि इक फाँक द्यबता चढ़ा
कैरि इनु त्याग वैना भि खुद मोक्ष पा ॥
पैदा होया मनू छौयु त्वंगध्वज्ज जू
भगति भारी करी गाय बैकुण्ठ स्यू ॥
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ईं तरह या कथा चा सकल रूप मा
ह्वैलि जै बिरधि कैरलु जु जै रूप मा ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा पंचमोध्याय समाप्त: ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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स्तुति एवं आरती – श्री सत्यनारायण ब्रत कथा (गढ़वाली)
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आदिदेव जै श्रीधरम् हरि विष्णु रूप जै माधवम्
सत्य नारायण जै तेरी रूप शंकर व्यापकम् ॥
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सर्वदा कल्याण करदा विप्र देव गौ रक्षकम्
सत्य आश्रय दीन हीन कु जगत्कारण सुन्दरम् ॥
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भाग दक्षिण गंगा छविमय बाम भाग च प्रिय रमा
जैंकि सुन्दरता से सुन्दर, स्याम सुन्दर तक छन॥
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नाम सत्य कु संकटों मा मधुर भाव से जो भजे
लोक नायक मुक्ति दायक कस्ट संकट सब हरे ॥
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निराश्रय हो इच्छा दुरलभ कर मनन सकलाश्रयम्
सहज मन जन सकल सुणदा भक्ति प्रिय विश्वाम्भरम् ॥
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बेद, ब्राह्मण, वैश्य, साधू, तुंगध्वज भक्ती करे
लोकनायक की कृपा से अमर सब अब तक रहे ॥
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सृष्टि सृजन, सृष्टि पालन, सृष्टि भारम् वाहनम्
भक्त अर भक्ती के प्रिय प्रभु जयति जय गुणसागरम् ॥
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देव मुनि सास्वत बोलें अकंटक सत्यहि प्रियम्
पुत्र पौत्र च भक्ति मुक्ती पूर्ण दे नारायणम् ॥
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सत्य नारायण कथाष्टक शब्द सुरसरि मंगलम्
सुमिरि कर ही पाप नाशै दींद फल हरि वांछितम् ॥
*
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[{(.....महा शिवरात्रि पर्व की बहुत बहुत शुभ कामनाएं).....}]
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Of and By कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म]

Thanking You with regards

B.C.Kukreti

Feb
08

शूद्रक का विदूषक याने हिंदी फिल्मों का महमूद , ओम प्रकाश शर्मा का कैप्टन हमीद

Satire and its Characteristics, Sanskrit Drama by Shudraka’s Vidushak & Satire, व्यंग्य परिभाषा, व्यंग्य गुण /चरित्र
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शूद्रक का विदूषक याने हिंदी फिल्मों का महमूद , ओम प्रकाश शर्मा का कैप्टन हमीद
(संस्कृत नाटकुं मा हास्य व्यंग्य )
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(व्यंग्य – कला , विज्ञानौ , दर्शन का मिऴवाक : ( भाग – 24 )

भीष्म कुकरेती
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शूद्रक नामी गिरामी प्राचीन भारतीय नाटकोंकारों मादे एक प्रमुख नाटककार माने जान्दन। शूद्रक एक राजा व नाट्यलेखक छ्या (सुकुमार भट्टाचार्यजी , विश्वनाथ बनर्जी ) । यद्यपि शुकध्रक की जीवनी बाराम भ्रान्ति ही च।
शूद्रक का रच्यां मृच्छकटिकम , वासवदत्ता अदि तीन नाटक माने जान्दन।
शूद्रकन बि अपण नाटकुं मा कालिदासौ तरां हास्य अर व्यंग्य उत्पति करणो बान विदूषक को सहारा ले। कालिदास का या अन्य प्राचीन संस्कृत नाटकुं विदूषक जख मन्द बुद्धि , लालची , खाउ हून्दन तो शूद्रक का मृच्छिकटिकम का विदूषक राजा का सहचर , अनुशासनयुक्त , अफु पर काबु करण वळ अर चतुर च। हाँ वाक्पटुता अर अलंकार प्रयोग दुइ प्रकार का विदुषकुं चारित्रिक गुण छन। शूद्रक की या विदूषक चरित्र की परिपाटी हिंदी फिल्मुं मा सन 1970 तक राइ तो ओम प्रकाश शर्मा सरीखा हिंदी जासूसी उपन्यासकारों न बि अपणै।

मृच्छकटिकम कु पंचों अंक मा वसन्तसेना द्वारा ब्राह्मण चारुदत्त तै भोजन दीणम उदासीनता का प्रति मैत्रेय नामौ विदूषक कसैली , कांटेदार , कड़क टिप्पणी उपमा अलंकार या कहावतों से करद -
————–”बगैर जलड़ो कमल , ठगी नि करण वळु बणिया , सुनार जु चोरी नि कारो , बगैर घ्याळ -घपरोळ की ग्रामसभा की बैठक , अर लोभहीन गणिका मुश्किल से ही ईं मिल्दन। ” —–
पंचों अंक मा विदूषक चारुदत्त तै हास्य व्यंग्य रूप मा सलाह दीन्दो -
——–”गणिका जुत्त पुटुक अटक्यूं गारो च जैतै भैर निकाळण बि मुश्किल ही हूंद ” —–
मृच्छकटिकम नाटक का खलनायक च शकारा अर वैक दोस्त च विट जैक नौकर च चेत। यी चरित्र अलग अलग बोली -भाषा वळ छन अर प्राकृत याने स्थानीय भाषा प्रयोग करदन । (तिलकऋषि )
शूद्रकन प्राकृत अर संस्कृत का प्रयोग हास्य -व्यंग्य उत्तपन करणो बड़ो बढ़िया प्रयोग कौर। मृच्छकटिकम मा कल्पना, उपमा अर मुहावरों मिळवाक् से तीखा व्यंग्य करे गे।

शूद्रक की शैली अनुसार ही हिंदी मा महमूद , जॉनी वाकर जन हास्य कलाकारुं से काम लिए गे तो जासूसी उपन्यासकार ओम प्रकाश शर्मा का कैप्टन हामिद बरबस शूद्रक रचित मृच्छकटिकम का मैत्रेय चरित्र की याद दिलांद।

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8 / 2/2017 Copyright @ Bhishma Kukreti

Discussion on Satire; definition of Satire; Sanskrit Drama by Shudraka’s Vidushak & Satire,Verbal Aggression Satire; Sanskrit Drama by Shudraka’s Vidushak & Satire, Words, forms Irony, Sanskrit Drama by Shudraka’s Vidushak & Satire,Types Satire; Games of Satire; Sanskrit Drama by Shudraka’s Vidushak & Satire,Theories of Satire; Sanskrit Drama by Shudraka’s Vidushak & Satire,Classical Satire; Censoring Satire; Sanskrit Drama by Shudraka’s Vidushak & Satire,Aim of Satire; Satire and Culture , Rituals
व्यंग्य परिभाषा , व्यंग्य के गुण /चरित्र ; (संस्कृत नाटकों में हास्य व्यंग्य ) व्यंग्य क्यों।; (संस्कृत नाटकों में हास्य व्यंग्य )व्यंग्य प्रकार ; (संस्कृत नाटकों में हास्य व्यंग्य ) व्यंग्य में बिडंबना , व्यंग्य में क्रोध , व्यंग्य में ऊर्जा , व्यंग्य के सिद्धांत , व्यंग्य हास्य, व्यंग्य कला ; व्यंग्य विचार , (संस्कृत नाटकों में हास्य व्यंग्य )व्यंग्य विधा या शैली ,(संस्कृत नाटकों में हास्य व्यंग्य ) व्यंग्य क्या कला है ? (संस्कृत नाटकों में हास्य व्यंग्य )

Thanking You .
Jaspur Ka Kukreti

Feb
07

कालिदास साहित्य मा हास्य -व्यंग्य

Satire and its Characteristics, Satire and Humor in Kalidas Literature , कालिदास साहित्य में हास्य -व्यंग्य, व्यंग्य परिभाषा, व्यंग्य गुण /चरित्र
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कालिदास साहित्य मा हास्य -व्यंग्य
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(व्यंग्य – कला , विज्ञानौ , दर्शन का मिऴवाक : ( भाग – 23 )

भीष्म कुकरेती
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महाकवि कालिदास संस्कृत का नाटक शिरमौर छन। ऊंको महाकव्य , गीतों में प्रतीकों से सटीक बिम्ब बणदन, कालिदासन शास्त्रीय शैली अपणाइ। कालिदास का नाटकुं माँ चरित्र अपण पद अर जाती का हिसाबन व्यवहार करदन तो कालिदास का नाटकुं माँ
हास्य -व्यंग्य करणो काम विदूषक /भांड करदन। किन्तु विदूषक का हास्य बि परिष्कृत हास्य व्यंग्य च। बलदेव प्रसाद उपाध्याय (संस्कृत साहित्य का इतिहास , 1965 , शारदा मन्दिर प्रकाशन ) लिखदन बल कालिदास का कवितौं माँ हास्य व्यंग्य पर्याप्त मात्रा माँ च और उंका नाटकुं मा वीम का सिर बि दर्शकों तैं हंसाण मं कामयाब च , हास्य च तो व्यंग्य बि ऐई जांद। गोविंदराम शर्मा (संस्कृत साहित्य की प्रमुख प्रवर्तियाँ, 1969 ) लिखदन की कालिदास का हास्य प्रयोजन बि श्रृंगार कारस का अनुकूल च।.
जे . तिलकऋषिन अपण एक लेख ‘ THE IMAGES OF WIT AND HUOUR IN KALIDAS’S AND SUDRKA’S DRAMAS ‘ मा कालिदास अर शूद्रक का नाटकों माँ व्यंग्य की पूरी छानबीन अर व्याख्या कार। कालिदास कृत अभिज्ञान शाकुंतलम का रूपान्तरकार विराजन बि कालिदास कृत ये नाटकम हास्य व्यंग्य का कथगा इ उदाहरण देन।
अनन्तराम मिश्र ‘अनन्त ‘ अपण ग्रन्थ ‘कालिदास साहित्य और रीति काव्य परम्परा (लोकवाणी संस्थान , 2007 , पृष्ठ 297 ) मा लिखदन बल ‘हास्य -व्यंग्य क्षेत्र में रीतिकवि कालिदास से अधिक सफल हैं। यद्यपि कालिदास ने नाटकों में विदूषक के माध्यम से हास्य रस उद्भावना के विभिन्न प्रयास किये हैं तथापि उनमे हास् भाव रीतिकाव्य के जैसे स्फुट और विशद नही हैं ‘ ।
सुषमा कुलश्रेष्ठ (कालिदास साहित्य एवं संगीत कला, 1988 ) मा बथान्दन बल कालिदास साहित्य मा हास्य भरपूर च (भरत कु नाट्य शास्त्र माँ हास्य माँ ही व्यंग्य समाहित च ) .
कालिदास का विदूषक अंक मा हास्य व्यंग्य पैदा करणो बाण कालिदासन अलंकार , उपमाओं को बढ़िया प्रयोग कर्यूं च। विदूषक की भाषा में अपभ्रंश व प्राकृत शब्दावली प्रयोग हुयुं च।

विक्रमोर्वशीय का तिसरो अंक मा विदूषक का भोजन की कल्पना व्यंग्य को बहुत सुंदर उदाहरण च जब भोजन व चिन्नी -मीठा प्रेमी प्रिय विदूषक ‘ चिन्नी ‘ की याद माँ चन्द्रमा की तुलना चिन्नी -पिंड से करद (ही ही भो खांडमोदासस्सिरियो उदीदो रा। … ) ।
‘मालविकागणिमित्र’ मा बि विदूषक का हाव भाव व वार्तालाप हास्य -व्यंग्य पैदा करद ( तिलकऋषि)
शकुंतलम (दुसर अंक ) मा बि विदूषक का भाव भंगिमा , वार्ता से हास्य व्यंग्य पैदा हूंद। विदूषक का वार्तालाप शब्द अर मच्छीमार का शब्द सामयिक प्रशासन अर समाज पर व्यंग्य पैदा करदन।
कालिदास का सभी नाटकों में हास्य व्यंग्य उतपति का वास्ता विदूषक ही मुख्य चरित्र च। कालिदास का नाटकुं मा मुख्यतया उपमा अलंकार का प्रयोग हास्य -व्यंग्य उत्पन करद।

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/ 2/2017 Copyright @ Bhishma Kukreti

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Jaspur Ka Kukreti

Feb
04

पँचतन्त्र मा हास्य व्यंग्य

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पँचतन्त्र मा हास्य व्यंग्य
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(व्यंग्य – कला , विज्ञानौ , दर्शन का मिऴवाक : ( भाग – 22 )

भीष्म कुकरेती
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पण्डित विष्णु शर्माs रच्यूं कथा खौळ (संग्रह ) पँचतन्त्र आज भी उपयोगी च , लाभकारी च अर प्रासंगिक च। कथा चूँकि शिक्षा दीणो रचे गै थै त इखमा निखालिश व्यंग्य की गुञ्जैस कमी च।
फिर बि पँचतन्त्र मा व्यंग्यक झलक झळकां मिलदी च। दंभ , मिथ्याभिमान, लोलुपता , नारी दगड़ विश्वासघात आदि जन व्याख्यानों में कम ही सै व्यंग्य तो छैं इ च (सत्यपाल चुग , 1968 , प्रेमचन्दत्तरो उपन्यासों की शिल्पविधि ).
Leonard Feinberg न अपण ग्रन्थ ‘Asian Laughter (पेज 426 ) मा पँचतन्त्र का कथाओं मा हास्य व्यंग्य ढूंढ।Leonard Feinberg का हिसाब से संसार तै जानवरों आँख से दिखण अपण आप मा व्यंग्य च अर जानवरों चरित्र से मनिखों मनोविज्ञान व्याख्या करण बि एक तरां को व्यंग्य ही च।
पँचतन्त्र माँ सूक्ष्म हास्य या व्यंग्य च अर वो झळकां ही च (Meena Khorana , 1991 , The Indian subcontinent in literature for children and Young)
Mathew Johan Hodgart अपणी किताब Die Satire ( पृष्ठ 127 मा )लिखदन कि पँचतन्त्र या अन्य पुरणी कथाओं मा कथा उद्देश्य अपणा आप मा व्यंग्य च अर फिर जानवरों द्वारा कथा तै जीवन्त बणये जाण बि त व्यंग्य को एक रूप च।
सम्मेलन पत्रिका 19 77 माँ बि इनि बोले गे बल पँचतन्त्र मा अपरोक्ष रूप से व्यंग्य मिल्दो जखमा एक पात्र अर्जुन तरां संशय से भर्यूं रौंद अर दुसर चर्तित्र कृष्ण तरां उपदेश दीन्दो वास्तव मा यु सुकराती आइरोनी च।

पँचतन्त्र मा चरित्रों नाम गुण बि बथान्दन अर यो भि व्यंग्य को एक भाग च। यही शील गढ़वाली नाटक का शिरमौर भवानी दत्त थपलियालनन अपण द्वी नाटकों मा बि अपणाइ। नाम से हास्य व्यंग्य पैदा करण एक व्यंग्य शैली च

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4/ 2/2017 Copyright @ Bhishma Kukreti

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