Apr
26

सुरजेवाला का खम्बा नोचना,अपना सर फोड़ना और राहुल जी लहूलुहान !

सुरजेवाला का खम्बा नोचना,अपना सर फोड़ना और राहुल जी लहूलुहान !
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व्यंग्य – भीष्म कुकरेती
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कैपणि बोल हैं बल जब असहाय फील करें तो बिल्लियों को खम्बे को नोचना चाहिए। आजकल कॉंग्रेस को देखकर एक नई कहावत आ चली है बल राजनैतिक विरोधी कोई अभिनव काम करे तो उस माध्यम , उस उद्द्येश्य को ही गाली दो जो माध्यम विरोधी अपना रहा है।
24 अप्रैल के दिन भारत में पोलटिकल मार्केटिंग में एक बिलकुल नया प्रयोग हुआ कि अभिनेता अक्षय कुमार द्वारा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार सारे टीवी चैनल दिखा रहे थे। मार्केटिंग का प्रोफेसनल होने के नाते मैं तो इस प्रयोग को इक्कीसवीं सदी का विपणन में एक अभिनव प्रयोग ही मानूंगा। सभी टीवी चैनलों ने इस साक्षात्कार को सारे दिन भर कई बार दिखाया। इन टीवी चैनलों ने इस साक्षात्कार को इसलिए सरे दिन भर नहीं दिखाया कि यह मोदी जी का या अक्षय कुमार का इंटरव्यू है बल्कण में टीवी चैनलों को इंटरव्यू प्रसारण के समय ही पता लग रहा था कि दर्शक चॅनेल से हुक हो गए बंध गए हैं। यहाँ तक कि हिंदूवादी विचारधारा धुर विरोधी चैनल NDTV को भी इंटरव्यू दिखाना पड़ा व इस इंटरव्यू पर नकारात्मक ही सही बहस तो चलानी ही पड़ी क्योंकि यह इंटरव्यू टीआरपी खिंचाऊ इंटरव्यू जो था , दर्शक पिड़ -पिड़ टीवी चैनल देख रहे थे।
कॉंग्रेस के महान विचारक सुरजेवाला का महान विचार भी दर्शकों को सुनने को मिला बल मोदी अक्षय कुमार से बड़े नाटककार या फेल नेता आदि आदि। बेचारे सुरजेवाला ने गुस्से में , खुन्नसमें , निराशा में खम्बा इतने जोर से नोचा कि बेचारे राहुल जी क्या प्रियंका ही लहू लहान हो गए। खम्बा नोचु प्रवक्ता सुरजेवाला ने प्रयोग (नए तरह का इंटरव्यू ) को ही गली दे डाली , प्रयोग की ही ऐसी तैसी कर डाली। सुरजेवाला को वरोध अवश्य ही करना चाहिए इसमें कोई बेवकूफ पप्पू सप्पू भी प्रश्न नहीं करेगा कि सुरजेवाला बिलाव खम्बा क्यों नोच रहा है किन्तु सुरजेवाला के शब्द तीखे थे प्रभावशाली न थे कि दर्शक इंटरव्यू से घृणा करते उलटा कॉंग्रेसी दर्शक भी टीवी के पास आ धमके और टीआरपी बढ़वा गए। बेचारे सुरजेवाला गए थे राहुल जी के लिए पीने के लिए घी लेने और मोदी पर इतना गुस्स हुए कि राहुल जी के लिए मिट्टी तेल ले आये । कॉंग्रेस विरोधी पार्टी है और कॉंग्रेस का काम है भाजपा या मोदी के कमजोर पक्ष पर भयानक से भयानक आघात करना। ‘राफेल घोटाला ‘ या ‘चौकीदार चोर’ वास्तव में मार्केटिंग दृष्टि से प्रशंसनीय आघात है किंतु आघात हेतु कॉंग्रेस को नए अभिनव प्रयोग करने चाहिए था। राजनैतिक संचार संवाद में समाचार बनना सबसे बड़ी कामयाबी मानी जाती है किन्तु 2019 चुनाव में कोन्ग्रेस ने कोई नया प्रयोग न कर दिखा दिया कि कॉंग्रेस में सोच बुढ़ा गयी है, बृद्ध सोच कॉंग्रेस की कमजोरी बन गयी है । कॉंग्रेस को तीर व धनुष भी नए लाने चाहिए थे जैसे नए एग्रेसिव स्पोक्सपर्सन लाये।
पोलिटिकल मार्केटिंग में सरकारी दल या बड़ा दल अपने पर ही आघात करता है याने नए नए माध्यम या न्यूज बनता है। अक्षय कुमार पीएम का इंटरव्यू ले रहा है यही बड़ी न्यूज थी। विरोधियों द्वारा इंटरव्यू बेकार था , इंटरव्यू में भूसा था , बकवास इंटरव्यू या अब मोदी को बादी , बादण , नचनिया (फिल्म वाले ) का सहारा लेना पड़ रहा है जैसे व्यक्तव्य कुछ नहीं खम्बे नोचकर अपने को ही लहूलुहान करने वाले व्यक्तव्य थे। पोलिटिकल मार्केटिंग में मोदी तो जीत ही गए ना !
‘अक्षय – मोदी साक्षात्कार’ पर विरोधी प्रवक्ता इतने गुस्सिया रहे थे इतना बौरा रहे थे जैसे कोई इनकी कोई धरोहर भगा कर ले गया हो। वास्तव में इन विरोधियों का रोष ऐसा ही था जैसे पड़ोसियों की मकई खूब हुयी हो और ये महाराज अपने दादा पड़ दादा को गाली देता हो बल हमारे लिए अच्छे उपजाऊ खेत क्यों नहीं छांटे !

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती , 26 अप्रैल 2019
जसपुर ढांगू गढ़वाल से हिंदी राजनैतिक व्यंग्य , गढ़वाल से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य , उत्तराखंड से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य , मुंबई से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य ; महाराष्ट्र से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य , कोंकण से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य ; गैर हिंदी क्षेत्र से राजनैतिक हिंदी व्यंग्य

Apr
25

चिर सुंदरी भुंदरा बौ का नेहरू आलोचना पर प्रियंका बाड्रा को उत्तर

चिर सुंदरी भुंदरा बौ का नेहरू आलोचना पर प्रियंका बाड्रा को उत्तर

विमर्श : भीष्म कुकरेती

चिर सुंदरी भुंदरा बौ – हैल्लो ! हैल्लो ! भीषम !
मैं – हेलो बौ जी , भाभी जी नमस्कार
भुं. बौ – हैं ये मरतण्या , मरी आवाज में रामारूमी क्यों देवर जी ? क्या देवरानी ने बेलनास्त्र या जिह्वास्त्र चला दिया क्या सुबै सुबै ?
मैं – नई बौजी। मैं फिरोज जहांगीर गांधी की पोती प्रियंका बाड्रा के दुःख से अति दुखी हूँ।
भुं. बौ – वोये झूठे ! तू तो आपातकाल से इंदिरा कॉंग्रेस का निप्पत्त विरोधी रहा है और तुझे प्रियंका पर कळकळी , फिरोज पोती पर दया करुणा उमड़ रही है ? ऐसा फरेब क्यों देवर जी ?
मैं – तेरी सौं , सौरी आपकी बहिन की सौं , मुझे मिसेज बाड्रा पर सच्ची मुच्ची दया आ रही है। उसका दुःख सहा नहीं जा रहा।
भुं. बौ – अरे फिरोज पोती ने कर के दिया कह क्या दिया जो तुझ निप्पट इंदिरा कॉंग्रेस विरोधी को किसी कॉंग्रेसी और वह भी फिरोज गाँधी के परिवार सदस्य पर दया आ रही है ?
मैं – आज उसने अपने भाषण में दुःख जताया बल कॉंग्रेस विरोधी नेहरू जी की आलोचना करते हैं। अपरोक्ष रूप से फिरोज जहांगीर पोती रो रही हैं कि नेहरू विरासत , जवाहर लाल लीगेसी खत्म की जा रही है।
भुं. बौ – मी तईं फिरोज जहांगीर पोती के रोने पर तरस नहीं अपितु उसके भारतीय संस्कृति के बारे में जानकारी न होने पर क्रोध आ रिया है बल।
मैं -हैं प्रिंयंका जैसी भद्र महिला पर क्रोध ?
भुं. बौ – राजनीती में कोई भद्र या अभद्र नहीं होते जनाब। फिरोज जहांगीर गाँधी पोती ने सम्भवतया अपने पड़ नाना की पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया नहीं बाँची।
मैं -भाभी जी ! प्रियंका के रोदन से नेहरू रचित डिस्कवरी ऑफ इण्डिया का क्या संबंध ?
भुं. बौ – देवर जी ! पूरा संबंध है यदि फिरोज जहांगीर पोती ने अपने पड़ नाना नेहरू जी की पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इण्डिया बंचि होती ना , तो पता चल जाता कि गैर कॉंग्रेसी नेहरू बिरासत को धूल में मिला कर सही राजनैतिक कार्य कर रहे हैं।
मैं – क्या बात कर रहीं है बौ जी आप ? क्या भंगुल जमा रही हैं ?
भुं. बौ – अरे जिसे भी भारत के इतिहास की थोड़ी सी भी समझ है उसे पता है गैर कॉंग्रेसियों को सर्व प्रथम नेहरूवाद को भारत वासियों के दिमाग से उगटाना , निपटाना होगा। और यह दो हजार साल पहले भी हुआ , सात सौ साल पहले भी हुआ और आज भी हो रहा है और कल भी होता रहेगा।
मैं – दो हजार वर्ष पहले भी नेहरूवाद…
भुं. बौ – तू भी न पिंडालू , घुँइया खाके बात करता रहता है।
मैं – क्यों ?
भुं. बौ -नेहरूवाद नहीं प् र…
मैं -पर क्या ?
भुं. बौ – देखो देवर जी ! बौद्ध धर्मियों ने जातक कथाएं या बौद्ध साहित्य में बुद्ध को महान दिखने हेतु क्या किया ?
मैं – बौद्ध साहित्य में बुद्ध के सामने सनातन धर्म के मुख्य प्रतीकों को बुद्ध के सामने घुटने टिकाये गए दिखलाया गया
भुं. बौ – बिलकुल सही बुद्ध के सामने ब्राह्मण , राजपूत व धनी बैश्यों को बुद्ध के सामने बौने दिखाए गए वास्तव में उनकी बेज्जती ही की गयी और इसे कहते हैं ब्राह्मणवादी सनातन धर्म की बिरासत को बुद्ध के सामने समाप्त करना। और यह साहित्य जनता के बीच प्रचारित भी किया गया , बौद्ध भिक्षुओं द्वारा।
मैं – हाँ एक वाद द्वारा दूसरे याने प्राचीन वाद को नष्टीकरण का रकार्य बौद्ध धर्मियों ने किया कि नहीं ?
भुं. बौ – अरे वाह देवर तो भाभी को बिल्कुल समज गे। बधाई।
मैं – चेला आपका
भुं. बौ – फिर ज़रा याद कर , वैष्णव धर्मी श्रीमद भगवत को इसमें भी तो
मैं -इसमें क्या ?
भुं. बौ – हैं बिचारा तू वैष्णवी होकर भी नहीं समझा।
मैं -क्या
भुं. बौ – श्रीमद भागवत याने वैष्णव धर्मी पोथी। इसमें वेदों के देव राज इंद्र की बेज्जती की गयी और इंद्र से उप्पर विष्णु या विष्णु अवतार को स्थान दिलवाया गया कि नहीं ?
मैं – हाँ हाँ महभारत व तमाम वैष्णवी साहित्य में इंद्र की बेज्जती ऐसी की गयी कि इंद्र के मंदिर ही नहीं निर्मित हुए यहाँ तक कि राजाओं के सिक्कों में इन्द्र को सफाचट गुम कर दिया गया। यह था वैष्णवी करता धर्ताओं का वेदों के प्रतीकों को ध्वस्त करने की कथा।
भुं. बौ – ब्वा भई ब्वा।
मैं -हूँ हूँ
भुं. बौ – फिर इस्लामिक राजा आये तो उन्होंने क्या किया ?
मैं – इस्लामिक राजाओं ने हिन्दू धर्म या सनातन या बौद्ध, जैन धर्मी प्रतीकों को नस्ट किया व अपने प्रतीकों को आगे लाये।
भुं. बौ – सही वे सही थे क्योंकि शासन में धनद से अधिक प्रतीकों का महत्व होता है। किसी के भी आस्था प्रतीकों को ध्वस्त कर दो और शासन कर लो यह है शासन की रीति।
मैं – हाँ हाँ
भुं. बौ -अंग्रेजों ने भी भारतीय प्रतीकों की बुनयाद हिलायी और शासन किया कि नहीं ?
मैं -हाँ हमारे प्रतीकों का इतना नष्टीकरण किसी काल में नहीं हुआ अब भी वर्तमान में हम अपने प्रतीकों को स्वयं नष्ट करने पर तुले हैं।
भुं. बौ – जरा कार्ल मार्क्स का धर्म संबंधित सिद्धांत तो टटोलो।
मैं -मार्क्स ने कहा था बल धर्म एक अफीमची का नशा है।
भुं. बौ -मार्क्स ने भी धर्म पर आघात किया याने धर्म की बिरासत को मटियामेट करने की चेस्टा की तभी मार्क्स प्रसिद्ध हुआ कि नहीं ?
मैं – हाँ धर्म व कैपिटलिज्म की चूल हिलायीं तो ही मार्क्स प्रसिद्ध हुआ।
भुं. बौ – जरा तमिल नाडु में द्रविड़ दलों का इतिहास टटोलो तो सही ?
मैं – हाँ सभी द्रविड़ दलों ने नेहरू विरासत को समाप्ति पर जोर दिया।
भुं. बौ – और आंध्र में ?
मैं – तेलगु देशम याने नेहरू विरासत को नेपथ्य में धकेलना
भुं. बौ – और मुलायम सिंह , चारा श्री लालू यादव ने क्या किया ?
मैं – लोहिया काल से ही नेहरू वाद की नींव खपचयी जा रही थी इन यादवों ने आखरी कील ठोकीं नेहरूवाद पर। इन लोहियावादी राजनीतिज्ञों ने भी नेहरू विरासत को ध्वस्त करने की पूरी चेस्टा की अब कॉंग्रेस के साथ हैं। ..
भुं बौ -होने को तो अब डीएमके भी फिरोज गाँधी पोते पोतियों के संग है पर एक सत्य है द्रविड़ आंदोलन वास्तव में नेहरू वाद के खिलाफ ही था। नेहरू के सामने ही चुनौती दी गयी थी। इसी तरह भारत में बामपंथी तो नेहरू वाद क्या मोहन दस करमचंद गाँधी वाद को ही नष्ट करने को संलग्न थे
मैं – हैं गाँधीवाद की जगह मोहन दस करमचंद गाँधीवाद बोल रही हैं ?
भंु क्योंकि फिरोज जहांगीर गाँधी के परिवार वास्तव में गाँधी वादी हैं ही नहीं अपितु नेहरूवादी है इसलिए आज से मैं गांधीवाद की जगह सदा मोहन दस करमचंद गाँधीवाद कहूंगी।
मैं – तो ?प्रियंका का रोना गलत है क्या ?
भुंदरा बौ – बिलकुल ! अरे जिस नेहरू खानदान ने महात्मा गाँधी की बिरासत को ही मिट्टी में मिला दिया हो उसे नेहरू की आलोचकों की आलोचना का क्या अधिकार ? उल्टा नेहरू , फिरोज जहांगीर परिवार को धिक्कार जिन्होंने महात्मा गांधीवाद को नेहरूवाद से समाप्त किया
मैं मतलब कॉंग्रेस को हटाना है तो विरोधियों को नेहरू लिगेसी समाप्त करनी ही होगी ?
भुंदरा बौ – द्रविड़ आंदोलन, तेलगु देशम आंदोलन , , बामपंथ आंदोलन , जनसंघ आंदोलन , ममता आंदोलन , यादवो द्वारा तथाकथित समाजवादी आंदोलन , केजरीवाल आंदोलन , मायावती आंदोलन तो यही शिक्षा दे रहा है कि कॉंग्रेस विरोधियों को कॉंग्रेस की जड़े हिलानी हैं तो नेहरू की विरासत को जनता के मन से उतारो।
मैं बिचारि प्रियंका बाड्रा !
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती 24 अप्रैल 2019
कृपया इस लेख को दलगत राजनीती दृष्टि से न देखकर प्रतीकों का पर्टकों का नष्टीकरण कैसे किया जाता है दृष्टि से देखें

Apr
07

डुंकुर बडा जी : व्यंग्य कसो पर पैथर बिटेन

डुंकुर बडा जी : व्यंग्य कसो पर पैथर बिटेन
कुछ व्यक्तियुं चरित्र संस्मरण , लड़ी -1 !
समळौण – भीष्म कुकरेती

म्यार चबोड़ या व्यंग्य लिखण अचाणचक नि ह्वे। यांक पैथर मि मणदु म्यार गाउ जसपुर (ढांगू ) कु कम से कम सौ साल कु इतिहास त जुम्मेवार छैं इ च। म्यार चबोड़ म रूचि इनि सुदी त नि आयी भौत सा व्यक्त्युं हथ च। हमर गाँव म डुंकुर बडा जी अंग्रेजो के जमाने के राजपूत थे जो अंग्रेजों के जमाने के ब्राह्मणु गांव म जन्मी छा। एकमात्र राजपूत परिवार। वु जमन जात पात कु छौ त एक राजपूत परिवार तै सौ बामणु परिवार इ नि सम्भळण छौ बल्कणम पचासेक शिल्पकार परिवार बि। डुंकुर बडा जीक कूड़ हमर कूड़क एक पुंगड़ तौळ छौ तो भौत सा माने म हम एकी थोक म इ आइ जांद छा (जात से न ) . म्यार बडा जी आर्य समाजी छा तो हिन्दू पूजन संस्कृति से म्यार जु बि भिड़ंत ह्वे स्यु डुंकुर बडा जिक इख हुयां पूजनों से ही ह्वे। डुंकुर बडा जी जागरी छा।
मलेसिया जंग्या , मलेसिया कुर्ता , सुडौल सरैल , थांत जन खुट (कृषि कार्य की निसानी ) आज बि याद च। मलेसिया सुलार सिरफ ब्यौ काजम या जागरी काम से दुसर गांव जाणम पैरदा छा वो बडा जी।
बामणु गांवम पांच छै साखी से एक राजपूत परिवार याने सामजस्य आवश्यक रै होलु। एक परिवार याने कैपर सीधा हमला से बचण। डुंकुर बडा जी से मीन यी सीख बल सीधा हमला क बजाय अपरोक्ष हमला ज्यादा कामगार हूंद। म्यार समज आण वल आयु -एज तक डुंकुर बडा जीन एक हास्य -व्यंग्य शैली उपजै ऐली छे अर वा शैली छे चबोड़ , हँसी से कै तै झपोडो , पीटो किन्तु अपरोक्ष रूप से। या शैली छे डुंकुर बडा जी की।
जन कि क्वी नौनु पढ़णो समय खिलणु हो तो डुंकुर बडा जी सीधा नि डांटदा छा बल्कणम बुल्दा छा बल ,” ब्यटा ! कतै नि पढ़न , किताब नि खुलण कखि तू पास ह्वे गे अर फोकटम त्यार बुबा तैं भिल्ली खर्च जि करण पोड़ल !”
कैक नॉन -नौनी क नाक बगणी हो तो नौनु -नौनी ब्वे कुण सलाह हूंदी छे ,” बुबा नि पुंजण नाक। बिचारा माख कनै पुटुक भौरल ?”
डुंकुर बडा जी तुलना करणम बि उस्ताद छा। एक दै लयड़ भदवाड़ , ग्वाठम मीन फ़तेराम जखमोला भैजी , हृदयराम आर्य भैजी अर डुंकुर बडा जी मध्य विचित्र तुलना सूण छौ किन्तु तब मि दस साल से छुटू ही छौ
इनि भौत सा डायलॉग हूंद छा डुंकुर बडा जी का जो चबोड़ व व्यंग्य का उमदा उदाहरण छया। काश मि सब याद रखी सकदो !
Copyright @ Bhishma Kukreti , April 2019

Mar
20

उन्नीसवीं सदी में गढ़वाली में चौकीदार हेतु पासवान शब्द प्रयोग होता था

उन्नीसवीं सदी में गढ़वाली में चौकीदार हेतु पासवान शब्द प्रयोग होता था

कुछ समय पहले मैंने सोशल मीडिया में पूछा था बल गढ़वाली में चौकीदार शब्द का रूपांतरित या वैसे शब्द क्या होना चाहिए। अच्छी प्रतिक्रियाएं मिलीं और निम्न शब्द चौकीदार के विकल्प सुझाये गए -

जुगळेर
जगळया
वाड जुगलण
पतरोळ
पैरादार
सन्तरी
ग्वैर
ऐतिहासिक दृष्टि से हमें उत्तराखंड में गाँवों चौकीदार /चौकीदारी शब्द संबंध संदर्भ 1847 के लगभग मिलता है जब ब्रिटिश सरकार ने प्लेग , हैजा , चेचक ‘ व विषेशतः प्लेग /महामारी रोकथाम हेतु प्रत्येक गाँवों हेतु ‘पासवान ‘ भर्ती किये।
पासवानों का मुख्य कार्य था -
गाँवों में हरिद्वार , ऋषिकेश से बद्रीनाथ जाते हुए रोगी पर्यटकों का प्रवेश रोक, उन्हें अंदर ग्रामीण क्षेत्र में न घुसने देना
गाँवों में सफाई चलाना
गाँवों में ग्रामीणों को उन पेड़ पौधों को आंगन के पास न उगाना जैसे भांग
गौशालाओं को गाँस से बाहर निर्माण जागरण
घरों के निकट गंदगी ढेर न होने देना
जब भी चूहे मरें तो उसकी जानकारी ऊपर पंहुचना

संदर्भ
शिव प्रसाद डबराल , ब्रिटिश गढ़वाल का इतिहास भाग २ , पृष्ठ ६१-१०३

Feb
24

व्यवसायिक बकरी पालन

व्यवसायिक बकरी पालन

व्यवसायिक बकरी पालन का पर्यटन हेतु महत्व -1 Commercial Goat Farming as Tourism Tool -1
भोजन पर्यटन विकास -11
Food /Culinary Tourism Development 11
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना – 397

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -397

आलेख – विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

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बकरी पालन भूमिका व लाभ तुलना

राष्ट्रीय ही नहीं उत्तराखंड में बकरी पालन अर्थव्यवस्था हेतु एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। भारत में 70 प्रतिशत भूमिहीन कृषि मजदूर व छोटे किसान बकरी पालन में संलग्न हैं। छोटे किसानों व अन्य हेतु बकरी पालन के कई लाभ मिलते रहे हैं। भारत में आज भी कई जंतु सामजिक छवि जुडी हैं जैसे सुअर पालन , मुर्गी पालन सवर्णों में आज भी ताज्य है। किन्तु बकरी पालन में कोई सामजिक बंधन जैसे धर्म , जाति , उप जाति , महिला या पुरुष नहीं जुड़े हैं। बकरी से औषधीय दूध , दही , मक्खन, गोबर के अतिरिक्त मांस तो मिलता ही है बकरी की खाल कई व्यवसायों में प्रयोग होती है।

अन्य जीवों की तुलना में बकरी पालन के कुछ लाभ

१- गरीब जो गाय भैंस नहीं पाल सकते उनके लिए बकरी पालन अधिक सरल है। कम क्रय लागत , कम मेंटेनेंस व्यय व बिक्रय लाभ अधिक भी है

२- बकरी पालन में कम जगह की आवश्यकता होती है।

३- बकरी मरखुड्या /मरखने व इकहत्या (एक ही हाथ से दुहा जाय ) नहीं होते हैं। अतः पालने , दूध दुहने में समस्या नहीं के बराबर है।

४- बकरी पालन हेतु कृषि खेत या भीमल , गूलर , खड़िक जैसे पादपों की आवश्यकता नहीं पड़ती

५- घास हेतु जल की आवश्यकता नहीं पड़ती या बकरी स्नान , पानी पिलाने हेतु निकट जल स्रोत्र आवश्यक नहीं है तथापि बंजर क्षेत्र , पहाड़ी क्षेत्र में भी बकरी पाली जा सकती है

६- बकरी को चराने के लिए निकट ही गौचर /चराई क्षेत्र आवश्यक नहीं है किसी भी वन में चारयि हो सकती है। बकरियां एक दिन में अधिक चल सकते है

७- बकरी चराने हेतु केवल बाघ , सियारों के अतिरिक्त कोई बड़ी सावधानी नहीं बरतनी पड़ती है जैसे बकरी का भेळ में गिरने /लमडने का भय कम होता है तो मजदूरी पर चरवाहे रखे जा सकते हैं जो दूध भी दुह सकते हैं व देखरेख भी कर सकते हैं ।

८- बकरी बेचना सदा ही सरल रहा है और सदा ही बाजार उपलब्ध रहा है आज भी बकरी को कैश क्रॉप जैसे कभी भी कहीं भी बेचा जा सकता है।

९- बकरी की उत्पादकशीलता अधिक होती है।

१० – बकरी पालन का व्यवसायिक भविष्य उज्जवल है। श्राद्ध छोड़ बकरी मांस भक्षण की कोई सामयिक वर्जना नहीं है। बकरी नास्ते , दोपहर भोजन व रात्रि भोजन सब समय भक्षण हो सकता है। इसी तरह बकरे मारने में कोई वर्जनाएं नहीं है। ब्राह्मण क्या उच्च वर्ग ब्राह्मण भी बकरी मार सकता है। भारत में कुछ क्षेत्र छोड़ बकरी भोजन में कोई जातीय बंधन नहीं है

११- मृत गाय , भैंस की कीमत नहीं के बराबर होती है किन्तु बकरी के साथ यह कमजोरी नहीं है। मृत गाय -भैंस को खड्यारना व लसोरना कठिन है किन्तु मृत बकरी का मांस बिकाऊ होता है याने मृत बकरी डिस्पोजेबल /उपयोगी होती हैं। थैंक गौड गौरक्षक बकरी रक्षा में अतिक्रमण नहीं करते।

१२- बकरी का बकर्वळ बिकाऊ है। बकर्वळ की डिस्पोजिबिलिटी गोबर से सरल है

१३- आधुनिक प्रजनन तकनीक उपलब्ध हैं व वाह्य स्पर्म गर्वाधान तकनीक सरल है

१४ -बकरी पालन में आधुनिक तकनीक उपलब्ध है

सबसे बड़ी कमजोरी

भारत में बकरी पालन से जुडी सबसे बड़ी कमजोरी है बकरी पालन में संगठित , व्यवसायीकरण न होना याने बकरी पालन को दुकान दृष्टि से न देखना।

Copyright @Bhishma Kukreti, bjkukreti@gmail .com

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