Apr
19

कोटि कानासार (चकराता , देहरादून ) के एक भवन में आकर्षक काष्ठ कला

कोटि कानासार   (चकराता , देहरादून ) के एक भवन में आकर्षक  काष्ठ अलंकरण अंकन 

Traditional House wood Carving Art of  Koti Kanasar  Chakrata , Dehradun

गढ़वाल,कुमाऊ के भवन(तिबारी,निमदारी, जंगलादार  मकान,बाखली,खोली,छाज  कोटि बनाल )  में  पारम्परिक  गढ़वाली शैली  की  काठ कुर्याण  की  काष्ठ कला,अलंकरण- 457

 

संकलन – भीष्म कुकरेती 

उत्तरकाशी व देहरादून का जौनसार क्षेत्र कलायुक्त काष्ठ  भवनों हेतु सैकड़ों वर्षों से प्रसिद्ध रहे हैं।  आज इसी क्रम में कोटि कानासार   के एक भवन में पारम्परिक  गढ़वाली शैली  की  काठ कुर्याण  की  काष्ठ कला,अलंकरण पर चर्चा होगी।

प्रस्तुत भवन कला उत्कीर्णन के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना  महत्वपूर्ण है।  कोटि कानासार  (देहरादून ) का प्रस्तुत  भवन धाइपुर है। भवन  भ्यूंतल ground  floor  में कई स्तम्भों पर टिका है जैसे भवन को बर्फ या जल मग्न होने से बचाने हेतु भवन निर्माण होते हैं।  कोटि कानासार  (देहरादून ) के  प्रस्तुत  भवन  में भ्यूं  तल के स्तम्भ कलायुक्त हैं।  स्तम्भ के  आधार   में अधोगामी लम्बोतर पद्म पुष्प से बहु आयामी कुम्भी निर्मित हुआ है , कुम्भी के ऊपर ड्यूल है व ड्यूल के ऊपर सीधे कमल दलों का अंकन उत्कीर्णन हुआ है। यहां से स्तम्भ ऊपर बढ़ता है व शीर्ष कड़ी से मिलने से पहले स्तम्भ में लटकते पुष्प दलों का अंकन /उत्कीर्णन हुआ है फिर दो स्तम्भों का सम्मलित चौकोर ड्यूल है व ऊपर स्तम्भ में बड़े बड़े पुष्प अधोगामी पुष्प दल उभरे हैं जिसके ऊपर कड़ी है। दूर से ये स्तम्भ ऐसे दीखते हैं जैसे कलायुक्त  चारपाई के पाए हों।

पहले तल में व डेढ़ वे तल में मिटटी पत्थर की दीवार नहीं हैं अपितु  ज्यामितीय कला लिए तख्ते  व भर स्तम्भ युक्त संरचना से दीवार निर्मित हुयी है।  तख्तों को जोड़ने वाले पहले तल व डेढ़ वे तल के बीस से अधिक स्तम्भ कला में  भ्यूं तल के स्तम्भों की प्रतिछाया हैं।  और इस तरह भवन का आकर्षण वृद्धि हुआ है। द्रस्वाजे के मुरिन्ड में ज्यामितीय कटान का तोरणम स्थापित है। छत टिन की है।

शेष स्थलों में ज्यामितीय कटान की ही कला दृष्टिगोचर होती है। कहीं  भी मानवीय (पशु पक्षी , देव आकृति ) अलंकरण  के दर्शन नहीं हुए।

संभवतया यह भवन होम स्टे है।

 

सूचना व फोटो आभार:   चंद्रमोहन सिंह चौहान  

* यह आलेख भवन कला अंकन संबंधी है न कि मिल्कियत संबंधी, भौगोलिक स्तिथि संबंधी।  भौगोलिक व मिलकियत की सूचना श्रुति से मिली है अत: अंतर  के लिए सूचना दाता व  संकलन  कर्ता उत्तरदायी नही हैं .

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020

Traditional House wood Carving Art of Dehradun, Garhwal  Uttarakhand, Himalaya   to be continued

ऋषिकेश, देहरादून के मकानों में  काष्ठ कला अंकन ;  देहरादून तहसील देहरादून के मकानों में  काष्ठ कला अंकन ;   विकासनगर  देहरादून के मकानों में  काष्ठ कला अंकन ;   डोईवाला    देहरादून के मकानों में  काष्ठ कला अंकन  ;  जौनसार ,  देहरादून के मकानों में  काष्ठ कला अंकन

 

Apr
19

चरक संहितौ महाचतुष्पाद को अंतिम भाग

चरक संहितौ  महाचतुष्पाद  को अंतिम भाग 

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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  

 

 खंड – १  सूत्रस्थानम दसों  अध्याय  (महाचतुष्पाद )     पद   १८ बिटेन  -२३-२४  तक 

अनुवाद भाग -  ७४  

 

गढ़वालीम  सर्वाधिक  पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार   - आचार्य  भीष्म कुकरेती 

 

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )

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!!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 

 

मेद आदि गंभीर धातुम स्तिथ , रस रक्तादि भौत धातुओं म स्तिथ ,मर्म संधि म आश्रित हो लगातार रत दिन राओ , २४ घंटा बारा मैना रावो , देर तक चार सालो ह्वे  गे हो , द्वी द्वासों से उतपन्न हो ,इन रोग तै यप्य ,अर इन प्रकारो अन्य    तीन द्वासों  से उतपन्न रोगों तै असाध्य  समजण  चयेंद , जु रोग चिकित्सा से भैर चल गे ह्वावो ,भौत बढ़ गे हो ,सब मार्ग ऊर्घ्व , अध: त्रियर्ग’ म पौंछि गे ह्वावो ,अति प्रसन्नता , अति बेचैनी , अति मूर्छा /नींद पैदा ह्वावो ,जै रोगन इन्द्रिय , आँखों दिखण ,कंदूड़न सुणन बंद ह्वे गे  हो , निबल मनिख म जु रोग भौत बढयूं  हो ,जै रॉक लक्षण निश्चित मृत्यु बताण  वळ होवन वो रोग असाध्य रोग हूंद अर रोगी असाध्य रोगी। १८-२०।

वैद तै चयेंद बल चिकित्सा करण से पैल  रोगुं  की पैलि लक्षणों से परीक्षा , करण  चयेंद बल रोग साध्य च या असाध्य।  पैथर  साध्य रोगों म चिकित्सा शुरू करण  चयेंद।  असाध्य रोगों म हथ नि  लगाण  चयेंद।

 जो वैद साध्य अर  असाध्य भेड़ों तै भली प्रकार जणद वो ज्ञानी , बुद्धिमान वैद , मैत्रेय का सामान लोगों की मिथ्या बुद्धि तै नि बढ़ांद।  २१-२२।

ये महा चतुष्पाद नामौ  अध्याय म औषध , चतुष्पाद ,गुण , भेषज, अर  आश्रित प्रभाव ,आत्रेय व मैत्रेय  की द्वी प्रकारै बुद्धि , चार प्रकारौ  रोग अर उंक लक्षण बुले गेन अर ऊं कारणों तै बि बताये गे जां से वैद प्रसिद्ध /यश्स्वासी हूंद।  २३ -२४।

इति   महा चतुष्पाद दसों अध्याय।।   .

*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य

संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १२९    बिटेन  १३०    तक

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021

शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

 

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली

Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charaka  Samhita, First-Ever Garhwali Translation of Charaka  Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charaka Samhita

 

Apr
19

कुछ हौर करण

 

कुछ हौर करण – भाग ४ 

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग   ८२  बिटेन ९१- ९२  तक

(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)

पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १११

s = आधा अ

( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )

पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित

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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े  जण वळ  एक मात्र लिख्वार  -   आचार्य  भीष्म कुकरेती   

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जु द्वी खुट स्वस्तिक , सीधो हथ ‘करिहस्त’मुद्रा म अर  बैं हथ वक्षस्थलम हो त  ‘अर्धस्वस्तिक ‘करण  बुले जांद।  ८२-८३ ।

जु (यदि ) ‘अर्धस्वस्तिक’करण  की अवस्थाम ‘करिहस्त’ मुद्रा वळ हाथ चक्राकार घुमाव म घूमो तथा परिवृत्त रखे जाव अर  तब नासिका क अगनै वळ  भाग की ओर  घुमाये जाय तो यु  ‘अंचित’ करण  ह्वे।  ८३ -८४।

जब ‘कुंचित” मुद्रा का खुटों   तै उब  उछाळा  जाय , वै तै तिरछा घुमै  दिए जाय अर कटि  व जांघ बि  वै  इ क्रम म घुमै  दिए जाय तो ‘भुजंगन्नासित  ‘ करण  हूंद।  ८४ -८५।

जु कुंचित पाद तै उब  उछाळे  जाव , घुंड तै उब लिजैक छाती बरोबर फैलाये जाय अर  द्वी हथ नृत्य का प्रयोग का अनुकूल (ताल नाद आदि )  रखे जावन  त  यु ‘ऊर्घ्वजानु’ करण  हूंद।  ८५ -८६।

जु ‘वृश्चिक’ करणम खुटों  तै रखि हथ  कोखै  छ्वाड़ झुकै  द्या , अर  सीधो हथ  तै नाकै  नोक क अग्रभाग म पर झुकाई धरो त  ‘ निकुंचित’ करण  हूंद। ८६-८७।

जु  बैं अर  सीधो खुटों  द्वारा एक चक्करदार घुमाव लेकि तब वाई तै भ्यूं  पटके जाव , द्वी नाच करदा हाथ उद्वेष्टित अर अपविद्ध गति प्र्दशन करिन त  वु  ‘मत्तल्ली ‘ करण  हूंद।  ८७ -८८।

जु खुटों तैं ‘स्खलित’ करण म पिछ्नै लिजाये  जाय बैं हथ  तै ‘ रेचित’ जाव , बैं  हथ  तै कटिम धरे जाव ,त अर्धमत्तल्ली’ करण हूंद। ८८ -८९।

जु  सीधो हथ ‘रेचित’ , दैं खुट उद्घट्टित ‘ अर बैं  हथ दोला मुद्रा म धरे जाव त  ‘ रेचित -निकुट्टित’ करण  हूंद।  ८९-९०।

जु  द्वी हथ ‘कटकामुख’मुद्राम नौला निकट हथकुळ्युं  (हथेलियां ) तै  समिण जिनां करद  धरे जाव अर  द्वी खुट  ‘सूचीबद्ध ‘अर  ‘अपक्रान्ता’ चारि से युक्त हों त  ‘पादपविद्धक’ करण  बुले जांद।  ९० -९१।

जु हथ अपविद्ध’ मुद्राम अर खुट सूची’ चारी म अर  त्रिक (अपण  अधोभाग सहित पीठ को भाग )  तै घुमा दिए जाय त  ‘वलित’ करण  ह्वे  जांद।  ९१ -९२।

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सन्दर्भ – बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  ९८  – १००

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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई

भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा

भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

 

Apr
19

उत्तराखंड पर्यटन विकास हेतु भारतीय शहरों व उनकी भोजन संबंधी पहचान को पहचानना

उत्तराखंड पर्यटन विकास हेतु भारतीय शहरों व उनकी भोजन संबंधी पहचान  को पहचानना 

Understanding Indian cities famous for their street food items

भोजन पर्यटन विकास -15

Food /Culinary Tourism Development 15

उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 399

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -399

 

आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती   

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भोजन किस तरह  किसी स्थल को प्रसिद्धि दिला सकता है यह किसी से छुपा नहीं है।  मोदी नगर के निकट हों  तो जैन जल जीरा याद आ ही जाता है।  आंध्रा या तेलंगाना में हों तो बिरयानी (विशेषकर मांशाहारी )  यद् आ ही जाता है।  मुम्बई आओ और बड़ा पाँव न चखा तो समझिये मुम्बई आये ही नहीं।

उत्तराखंड के शहरों व  कस्बों ही नहीं गाँवों को भी किसी विशेष भोजन से जोड़ना ही सही ब्रैंडिंग मानी जाएगी।

अतः  किस शहर या कस्बे या गांव को किस भोजन से जोड़ना उचित होगा के लिए प्रथम  भारत के प्रमुक शहरों व उनसे जुड़े भोजन को पहचानना आवश्यक है।

निम्न शहर निम्न भोजन से जुड़े हैं -

शहर ———-  भोजन नाम जिससे शर की पहचान /छवि निर्मित हुयी है

अमृतसर  ——– लंगर - गुरूद्वारे में सामूहिक भोजन, न जलेबी

अलीपे /केरल  – ———फ्राइड करीमन मच्छी

अहमदाबाद  —–दबेली (सैंडविच ) , ढोकला , फाफड़ा

आगरा ————–पेठा

इंदौर ———–पोहा व दाल बाटी

कुर्ग , —–कर्नाटक पांडी करी

कोच्ची ——-इडली बड़ा आदि / सी फ़ूड

कोल्हापुर  —-कोल्हापुरी चिकन व कोल्हापुरी हड्डी रस्सा

कोलकत्ता ——— रसोगुल्ला व  माछ रस्सा , चाइनीज भोजन

गोआ  ——- फेनी , प्राउन , केकड़ा जलचर जंतु भोजन /सी फ़ूड

चंडीगढ़ ———-नान बटर चिकन , पंजाबी भोजन

चेन्नई —————-मुर्कुस व दक्षिण भारतीय इडली डोसा

जगन्नाथपुरी  —— बाराकुडा फिश फ्राई

जयपुर कचोरी

जोधपुर —–राजस्थानी थाली

तवांग अरुणाचल ———थुकपा

दिल्ली ————–   बटर चिकन व छोले भटूरे

धर्मशाला ————–फ्राइड मोमोज व तिबती भोजन

पटना  ————-लिट्टी चोखा

पॉन्डिचेरी———- फ्रेंच भोजन

पुष्कर ———दाल बाटी

पुणे  ——उसल पाव

बंगलोर  ————–मांशाहारी भोजन व दक्षिण शाकाहारी

बनारस  —————–पान ,  लस्सी , रबड़ी

बागा  कोंकण ———लैम्ब राविओली

मथुरा —————पेड़ा

मैसूर  —————मैसूर पाक

मुंबई  ———बड़ा पाँव , पाँव भाजी

लखनऊ ———–कबाब , बिरयानी कोरमा। कुल्फी

शिलॉन्ग ———– पोर्क  बेली रोस्ट

श्रीनगर कश्मीर——— मटन रोगन जोश

वाइजैक —————- बिरयानी

हापुड़  ————–पापड़

हैदराबाद ————- कबाब व बिरयानी

उत्तराखंडियों को अपने गाँव को किसी भोजन या अनाज , फल आदि से जोड़ना आवश्यक है।

 

Copyright @ Bhishma Kukreti ,2021

 

Apr
19

Shukraniti Defining Atharvaveda

Shukraniti Defining Atharvaveda

Strategies for CEOs of Educational institutions and Social organization, -9

Strategies for CEOs of organizations related to Skill development – 9

Strategies to be known by political leaders, administrators, statesmen for administrating the country

Immutable Strategic Formulas for Chief Executive Officer

(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)

(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)

Successful Strategies for successful Chief executive Officer – 300

Guidelines for Chief Officers (CEO) series – 300

s= आधी अ

By Bhishma Kukreti (Management Acharya)

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अथर्वांगिरसो नाम ह्युपास्योपासनात्मक:

In Atharvaveda, there is descriptions of gods and prayers  to  them .

Shukraneeti, Chapter 7 Vidya VA Kala Nirupan, 13)

References:

1-Shukra Niti, Manoj Pocket Books Delhi, page –214

Copyright@ Bhishma Kukreti, 2021

 

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