«

»

Nov
30

उत्तराखंड में है गाँव मेरा…

पली बड़ी दिल्ली में मैं… दिल्ली है जन्म स्थान मेरा …
पर मम्मी-पापा कहते हैं… उत्तराखंड के अल्मोड़ा में है गाँव तेरा…
हिमालाय के पहाडों से है जुड़ा पुश्तैनी नाम मेरा…
ऊँचे-ऊँचे हैं पहाड़ जहाँ और पेड़ों से है जो हरा-भरा …
पापा जब भी बीते दिनों की बात बताते हैं…
उनके और अपने बचपन में अन्तर कई हम पाते हैं…
पहाडों में खेले कूदे वो, मीलों चलकर स्कूल को जाते थे…
पानी बहुत कम मिलता था..शायद हफ्तों में कभी नहाते थे … :)
जो भी था, जैसा और जितना भी था, सब कुछ अपना-अपना था …
आज की तरह सुविधायें ना थी, पर आंखों में सच्चा सपना था…
सपना था की पढ़ लिखके, मेहनत करके कुछ बन दिखाना है…
केवल अपना नहीं सभी अपनों का जीवन स्तर ऊपर उठाना है ..
इसी चाह में.. इसी राह में…पढ़ते रहे …चलते रहे..
छूट गया पीछे घर उनसे…पर यादों में पहाड़ बसे रहे…
कई बार उन सपनो में वो दोबारा खो से जाते हैं…
कहते-कहते आंखों में उनकी आंसू भी आ जाते हैं…
प्यार बहुत है उन्हें अपने गाँव से, उनके आंसू एहसास दिलाते हैं …
बसे हैं चाहे दिल्ली में आज, पर लौटकर फिर वहीं वो जाना चाहते हैं…
प्यार मिला संस्कार मिला उनको जिन पहाडों में…
बसा हुआ है आज भी वो उनकी मन की धारों में…
उनकी बातें सुनके लगता है.. शायद वो सच में कोई सपना था…
जहाँ प्यार बसता था दिलों में और हर कोई अपना-अपना था…
आज तो मतलब की है दुनिया.. कौन किसी का होता है…
वही धोखा देता है जिसपर सबसे ज्यादा भरोसा होता है…
कोई किसी का नहीं.. पैसा सबका बना चहेता है…
सुना है बाप और भाई से भी बड़ा आज रुपैया है…
कहाँ गए वो दिन जिनकी याद मेरे पापा करते हैं…
आज तो हम अपनों को भी अपना कहने से डरते हैं…
दिल्ली क्या पहाडों में भी अब ऐसा ही होता है…
देख अपनी मिट्टी की ये हालत ही शायद पापा का अंतर्मन रोता है…
याद करते हैं पापा जिनको क्या वो दिन लौटकर फिर आयेंगे…
हम अपने बच्चों को कौन से पहाड़ की कहानी सुनायेंगे …
इजा-बाबू , अम्मा-बुबू कौन होते हैं …कैसे उन्हें समझायेंगे..
शायद हम उन्हें अपनी येही दुनिया दिखायेंगे…
दुनिया जहाँ दिन के चौबीस घंटों में अपनों के लिए कोई वक्त नहीं…
और सौ किलो के शरीर में मातृभूमि के लिए दो ग्राम भी रक्त नहीं…
जहाँ खुली हवा में सांस लेने से जान को खतरा है….
प्रदूषण और जाने कितने ही रोगों ने इंसान को हर तरफ़ से जकडा है…
हाँ पापा की तरह उत्तरखंड में ही है गाँव मेरा …
पर शायद उनकी तरह गहरा नही पहाडों से प्रेम मेरा ….
प्यार होता तो पहाडों की सच्चाई खोते देख मेरी आँख में भी आंसू आते…
और हम केवल उनके बारे में लिखते या पढ़ते नहीं… मिलजुल कर कुछ कर दिखाते…

opinions powered by SendLove.to
  • Dashrathsajwan

    Dil ko chhu gayi ji …..Bahut sachcai se likhi gayi hai ye kavita.

    • Bedupako

      Dhanyawaad Dashrath ji…

  • Lucky74negi

    Badi sachai or dard chhupa hain in laino me jo dil ko chhooti hain……Bahut sunder ati sunder 

    • Bedupako

      Sarahana ke liye dhanyawaad Lucky ji!

  • Ghildiyalpreeti

    wow

    • Bedupako

      Thanks :)

  • soban singh

    wah kya shansh kar hai aap ke kushi ji boht khub kya tarifh karu labj nahi hai 

    • Bedupako

      Dhanyawaad!

  • ashu rawal

    sach mai dil ko chu jane wali bat hai jis dil mai phado ke liye pyar nahi wo dil dil hi nahi ho sakata hai mai aapni bat kahu to maa bap bhai bahan dostu ki jitni yad mujhe aati hai pahad bhi mujhe utne hi payare hai jai ho devbhumi……….

    • Bedupako

      Dhanyawaad…

  • Kavita Rawat

    कमोवेश यही हाल हम सब शहरों में आकर बस चुके पहाड़ी भाई बहनों का है….. रोजगार की तलाश में भटकते भटकते जाने कहाँ कहाँ हमने अपना ठिकाना बना लिया है…. ..मैं तो जब भी गाँव जाती हूँ सोचती हूँ सबसे पहले कौन इन विराट पहाडियों के बीच आकर बसा होगा ..तब के और आज के हालातों में बहुत बड़ा अंतर दीखता है.. ..कविता का माध्यम से आपका परिचय जानकर मन को प्रसन्नता हुयी ..मेरे हिसाब से बस सभी जहाँ भी रहें लेकिन अपने उत्तराखंड के लिए कुछ न कुछ करते रहें यही कुछ कम नहीं  …  . 
    हार्दिक शुभकामनाओं सहित 
    सादर 
    कविता रावत भोपाल 

    • Bedupako

      प्रोत्साहन के लिएय धन्यवाद कविता जी…

  • Nareshbhatt

    very good 

    • Bedupako

      Thanks!

  • Adhoori Kahani

    great one

    • Bedupako

      Thanks!

  • http://twitter.com/vijaybisht1988 vijay bisht

    Heart Teaching Lines….Great One…

    • Bedupako

      Thanks!

  • Didi1to1

    हम अनाड़ी बन्दुक भाय के काम होलो बताया हो …हम लै आपण कणी मुजरिम  माननु के नि कर पाय आपंड पहाड्क  लिजी यो बताक बड अफ़सोस छू 

    • Bedupako

      अफ़सोस करिबे के हौल दीदी..के न के तो करण पडौल अंतर जब पहाडे नि रौल तो कंक पहाड़ी बतौंल अपु कें ?

Copy Protected by Chetans WP-Copyprotect.