(उत्तराखंड के राजनैतिक हालात पर एक कहानी)
बहुत समय पहले एक पहाडी नदी के किनारे दो चांडाल रहते थे| दोनो नदी के विपरीत किनारों पर रहकर अपनी जीविका कमा रहे थे|
उनमें से युवा चांडाल एक मठ के अधीन काम करता था और मठ से अपने पारिश्रामिक के एवज में गरीब और लावारिश शवों का अंतिम संस्कार किया करता था| बूडा चांडाल स्वंत्रत रूप से अपना कार्य (रोजगार) करता था| इस तरह दोनों की आजिवीका लोगों के मरने से जुडी हुइ थी| बूडा चांडाल मन लगा कर पूरे विधी विधान से काम करता था, और बाड व महमारी मे ठीक ठाक लेता था -पूस मे जब ह्रदय रोग से अधिक लोगों की मौत होती थी तब बूडा चांडाल काफी कमा लेता था| वह हमेशा दुआ करता था कि लोग मरते रहें ताकि उसकी आजिवीका चलती रहे| वहीं युवा चांडाल को पहले से तय पारिश्रामिक हे देय होता था वह बेमन से आधा-अधूरा अंतिम संस्कार कर देता था| सर्द मौसम में युवा चांडाल प्रार्थना करता कि लोग कम मरें ताकि उसे ठडी नदी में न उतरना पडे पर वह यह भी जानता था कि लोगो के ना मरने पर वह अपना रोजगार खो देगा|
इस कहानी मे उत्तराखंड की जनता ही मर रही है| दो चंडाल कौन हो सकते हैं ? जो पहाडी जनता को धीरे –धीरे मारें ताकि वह लम्बे समय तक अपन उल्लू सीधा कर सकें
अथवा जो विपरीत समय (मौसम) का इंतजार करे, ताकि पहले से ही मार झेल रही जनता को आपात मौत आये और उसका धन्धा जोरों से चलता रहे|
