जहाँ आम आदमी की सोच पर रोक , मन की कहने-सुनने पर प्रतिबन्ध है,
जहाँ लोगों के भावों का मूल्य नहीं, वो कैसे लोकतंत्र है?
जहां शासकों की कथनी-करनी का फर्क देख, प्रजा भौचक्की और सन्न है,
किस बल-बूते पर हम कहते हैं की वो एक प्रजातंत्र है?
जहाँ भ्रस्टाचार का दैत्य निगल चूका सदाचारियों के मन से संत है,
वहाँ रावण को राम रुपी दिखाने का ये कैसा षड़यंत्र है ?
जिस देश के गणों के, ना सर पर छत, ना तन पर कपड़ा, ना ही खाने को अन्न है,
उस देश को क्या जानकार कहते हो की वो गणतंत्र है?

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