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Apr
24

उत्तराखंड का एक औषधीय वृक्ष ‘तिमूर’ ( जेंथेजाइलम अरमेटम )

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उत्तराखंड राज्य अपनी वन सम्पदा और प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण समस्त संसार में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है | यहाँ के पावन वातावरण में अनेक प्रकार की जड़ी बूटियां उत्पन्न होती हैं जो हर पल मानव के लिए उपयोगी सिद्ध होती हैं | ऐसी ही एक औषधीय गुणों से युक्त वृक्ष का नाम है ‘तिमूर’, जो यहाँ पर बहुतायत से पाया जाता है |

यह वृक्ष उत्तराखंड में लगभग 2000 मीटर की ऊँचाई पर पाया जाता है | इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम ‘जेंथेजाइलम अरमेटम’ (Zanthoxylum Armatum or also known with other bilogical names such as Zanthoxylum Alatum or Zanthoxylum Americanum or Zanthoxylum Oxyphyllum) है | परन्तु इसे कुमाओं में ‘तिमूर’ (Timur), गढ़वाली में ‘टिमरू’ (Timru) और संस्कृत में तेजोवटी (Tejowati in Sanskrit) के नाम से जाना जाता है | झाड़ीनुमा इस वृक्ष की लम्बाई लगभग 10 -12 मीटर तक होती है | यह सम्पूर्ण वृक्ष अपने आप में औषधीय गुणों से परिपूर्ण है | झाड़ीनुमा इस वृक्ष का जड़ से लेकर तना,छाल,पत्ती,बीज ही नही अपितु फूल भी मानव शरीर की तमाम व्याधियुं के लिए रामबाण साबित होता है |
जिस प्रकार मैदानी क्षेत्रों में नीम में तमाम गुण पाए जाते हैं, उसी प्रकार ‘तिमूर’ को पहाड़ का नीम कहा जा सकता है | सामान्य तौर पर इसकी टहनियुं का इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्रों में दातून के लिए किया जाता है | तिमूर के दातून से दांत सम्बन्धी सभी रोग दूर हो जाते हैं | इसका नित्य प्रयोग दांतों को सुन्दर व मजबूत बनाता है | पायरिया जैसे रोग के लिए यह गुणकारी साबित हुआ है | ‘उत्तराखंड हिमालयी आजीविका सुधार परियोजना’ प्रबंधक के० सी० भट्ट का कहना है की तिमूर को ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अर्थोपाजन का बेहतर जरिया बनाने के लिए कार्य योजना तैयार की गयी है | इसकी खेती के लिए काश्तकारों को तैयार किया जा रहा है | उनके अनुसार इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन  से सुखद तथ्य सामने आये हैं | इसके बीजों का प्रयोग माउथ फ्रेशनर,क्रमिनाशक,पेट सम्बन्धी रोगों के लिए तो होता ही है इसके बीज का बाहरी छिलका मसाले के रूप में भी प्रयोग किया जाता है |
इसके बीजों में सुगन्धित तेल की भरपूर मात्रा पायी जाती है |  इसके तेल में ‘लीनानूल’ नामक रसायन पाया जाता है, जो ‘एंटीसेप्टिक’ है अनेक दवा बनाने वाली कंपनी में इसकी बहुत मांग है | इसकी पत्तियुं का चूर्ण दातों को साफ़ रखता है | यह वृक्ष रक्तचाप नियंत्रित करने में भी महत्वपूर्ण  भूमिका निभाता है | इसकी मोती टहनियुं को नियमित हथेलियुं में दबाकर रक्तचाप नियंत्रित होता है | इस वृक्ष को खेतों की मेड़ों में लगाने से जंगली जानवरों से खेतों की रक्षा की जा सकती है और आय भी उपार्जित की जा सकती है | सरकार द्वारा भविष्य में इसकी खेती के लिए विशेष योजनायें संचालित करने का कार्यक्रम है | इससे गाँव के बेरोजगार लोगों को वर्ष भर रोजगार भी मिल सकेगा और साथ-साथ लगातार हो रहे पलायन पर कुछ हद तक ब्रेक भी लगेगा |

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  • Mansijoshi Nidhi

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    • Anonymous

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