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Jul
20

ढोल सागर के बारे में जानकारियाँ

ढोल सागर के बारे में जानकारियाँ -१

प्रस्तुतकर्ता : भीष्म कुकरेती

ढोल दमाऊ गढ़वाल कुमाऊँ के पारम्परिक वाद्य यंत्र है इन यंत्रों को बजने वाले दास या औजी कहलाते हैं

औजी का शि अर्थ है शिव भक्त

ढोल सागर टाल सम्बन्धी ग्रन्थ है इस ग्रन्थ पर स्वर्गीय केशव अनुरागी , डा. विजय दस् काम कार्य उल्लेखनीय है तथापि अबोध बंधु बहुगुणा , मोहन बाबुलकर व डा विष्णु दत्त कुकरेती का कार्य भी उल्लेखनीय है भीष्म कुकरेती ने भी इंटरनेट पर ढोल सागर के विषय में जानकारी दी हैं

जहाँ तक ढोल सागर का प्रश्न है यह अद्भुत दर्शन शास्त्र है जिसमे शिव पार्वती संवाद वैसे ही हैं जैसे की विज्ञानं भैरव में है . ढोल सागर जहाँ गुरु गोरखनाथी सम्प्रदाय की देन है तो गोरखनाथी भी शिव उपासक ही हैं इसलिए ढोल सागर पर विज्ञानं भैरव का प्रभाव पड़ना समुचित ही है केशव अनुरागी ने ढोल सागर की गोरख्नाठी साहित्य के साथ तुलना की है (बैरिस्टर मुकंदी लाल स्मृति ग्रन्थ पृष्ठ ३३० )

जब की मै समझता हूँ ढोल सागर को विज्ञानं भैरव की दार्शनिकता के हिसाब शे देखना भी आवश्यक है. जरा देखें की विज्ञानं भैरव व ढोल सागर में कितनी साम्यता है

पार्वती उवाच

श्रुतं देव मया सर्व रुद्रयामल्सम्भवं

त्रिकभेदमाशेषेण सरात्सारविभागश : विज्ञानं भैरव –१—

किम रूपम तत्वतो देव शब्दराशीकलामयम –२–

किम व नावात्मभेदेन भैरवो भैरवा कृतौ

त्रिशिरोभेदभिन्नम वा किम वा शक्तित्रयात्मकम —३—

नादबिंदुमयम वापी किम चंद्रार्धनिरोधिका:

चकरारुढ़मन्चकम वा किम वा शक्तिस्वरुप्कम –वि.भ.—४–

विज्ञानं भैरव शाश्त्र के प्रथम सर्ग में पारवती शिव शे प्रश्न करते है की सुख का साधन क्या है

इसी तरह ढोल बाडन प्रारम्भ में ढोल वादकों के प्रश्न उत्तर इस प्रकार हैं

पार्वती उवाच —

अरे आवजी ! नहीं सास नही आस

नहिं गिरी नहिं कविलास

सर्वत धुन्द धुंधकारम

तै दिन की उत्पति बोली जै

इश्वरो उवाच

हमीं उंकार उंकार तैं धौंधोकार

नाद बूंद हमी , कवटों (कर्ता ) विनटो हमी

निरंकार निरंजन हमारू नौंउ

निरंकार ते साकार श्रिस्ठी रची ली

रची लेई नौखंड पिरथिवी

अरे आवजी ! अगवान पिछवान बोली जै

प्रथमे माई क़ि पूत प्रथमे

प्रथमे गुरु क़ि चेला प्रथमे

प्रथम पौन क़ि पाणि प्रथमे

प्रथमे बीज क़ि बिरछि प्रथमे

इश्वरो उवाच –

अरे आवजी गुणि जन प्रथमे सुन्न

सुन्न से सुनान्कार सुनान्कार से साकार

पारवती उवाच

अरे आवजी कस्य पुत्रे भवे शब्दम

इश्वरो उवाच

शब्द इश्वर रूप च , शब्द क़ि सुरती साखा

शब्द का मुख विचार , शब्द का ज्ञान आँखा

यो शब्द बजाई हृदया जै बैठाई

विज्ञान भैरव के प्रथम श्लोक से लेकर चौबीसवें श्लोक तक पार्वती व शिवजी का वार्तालाप ही ढोल सागर में भी औजी प्रारंभ करते हैं

हाँ ढोल सागर क़ि भाषा ब्रज है केवल कुछ शब्द ही गढ़वाली/कुमाउनी के है . दर्शन शास्त्र का ऐसा अनोखा ज्ञान है ढोल सागर

जहां तक ढोल सागर के प्रकाशन का प्रश्न है ढोल सागर का संकलन श्री ब्रह्मा नन्द थपलियाल द्वारा सन १९१३ में पुरा हुआ और प्रथम बार सन १९३२ में ही प्रकाशित हुआ (मोहन बोलकर क़ि सूचना )

मोहन बाबुलकर ने ढोल सागर को अपणी पुस्तक गढ़वाल के लोक धर्मी (१९७७) के परिशिष्ट में दिया , केशव अनुरागी ने ढोल सागर के संगीत लिपि भी लिखी डा विष्णु दत्त कुकरेती ने अपने ग्रन्थ में उल्लेख किया . डा विजय दास ने ढोल सागर के कई नए तथ्यों को साधरण जन को बताया

Copyright @ Bhishma Kukreti, bckukreti@gmail.com

ढोल सागर का रहस्य

प्रस्तुतिकरण : भीष्म कुकरेती

मूल संकलन स्रोत्र : पंडित ब्रह्मा नंद थपलियाल, श्री बदरीकेद्दारेश्वर प्रेस , पौड़ी , १९१३ में शुरू और १९३२ में जाकर प्रकाशित

( आभार स्व. अबोध बंधु बहुगुणा जन्होने इसे गाड म्यटेकी गंगा में आदि गद्य के नाम शे छापा, , स्व. केशव अनुरागी जिन्होंने ढोल सागर का महान संत गोरख नाथ के दार्शनिक सिधान्तों के आधार पर व्याख्या ही नही की अपितु ढोल सागर के कवित्व का संगीत लिपि भी प्रसारित की , , स्व शिवा नन्द नौटियाल जिन्होंने ढोल सागर के कई छंद को गढ़वाल के नृत्य-गीत पुस्तक में सम्पूर्ण स्थान दिया, एवम बरसुड़ी के डा विष्णुदत्त कुकरेती एवम डा विजय दास ने ढोल सागर की व्याख्या की है )

श्रीगणेशाय नम: I श्री ईश्वरायनम : i श्रीपारत्युवाच i ऊँ झे माता पिता गुरुदेवता को आदेसं ऊँ धनेनी संगति वेदति वेदेतिगगन ग्रीतायुनि आरम्भे कथम ढोलीढोल की सीखा उच्चते i कथर बिरथा फलम फूलं सेमलं सावरीराखम खड़कं पृथ्वी की साखा कहाऊं पजी पृथ्वी कथभूता विष्णु जादीन कमल से उपजे ब्रमाजी तादिन कमल में चेतं विष्णु जब कमल से छूटे तबनहि चेतं i ओंकार शब्द भये चेतं II अथ ऊंकारशब्दलेखितम II यदयाताभ्यां मेते वरण गाद्यामह गिरिजामाप्रं आतेपरत्या हार करी तपस्या म्ये श्रिश्थी के रचते I सातद्वीप नौखंडा i कौन कौन खंड i हरितखंड I भरतखंड २ भीम ० ३ कमल ४ काश्मीरी ० ५ वेद ० ६ देवा ० ७ हिरना ८ झिरना ० ९ नौखंड बोली जेरे आवजी अष्टपरबत बोली जेरे आवजी मेरु परबत I सुमेरु २ नील ० ३ हिम ४ हिंद्रागिरी ०५ आकाश ० ६ कविलाश ०७ गोबर्धन ०८ अष्टपरबत बोली जे गुनिजनम प्रिथी में उत्पति कौन कौन मंडल पृथ्वी ऊपरी वायुमंडल वायु मंडल ऊपरी तेजमंडल तेजमंडल ऊपरी मेघमंडल मेघमंडल ऊपरी गगनमंडल गगनमंडल ऊपरी अग्निमंडल अग्निमंडल ऊपरी हीनमंडल हीनमंडल ऊपरी सूर्य्यमंडल सूर्य्यमंडल ऊपरी चन्द्रमंडल I तारामंडल I तारामंडल २ सिद्ध ० ३ बुद्ध ०४ कुबेर ०५ गगन ०६ भगति ० ७ ब्रम्हा ०८ विष्णु ०९ शिव ०१० निरंकारमंडल II वैकुंटमंडल इतिपृथ्वी की शाख बोलीजरे गुनी जनम बोल रे ढोली कथम ढोल की शाखा I उतब उतपति बोली जा रे आवजी I इशवरोवाच I I अरे आवजी कौन भूमि ते उत्पनलीन्यों कौन भूमिते आई कौन भूमि तुमने गुरुमुख चेतीलीन्या कौन भूमिते तुम समाया I I पारव्त्युंवाच I I

अरे गुनीजन जलश्रमिते उत्पनलीन्या अर नभमिते आया अनुभुमिते गुरुमुख चेतीलीन्या सूं भूमितेसमाया I I श्रीईश्वरीयउवाच I I अरे आवजी कौन द्वीपते ते उत्पन्न ढोल कौन उत्पन्नदमाम I अरे आवजी कौन द्वीपते कनकथरहरीबाजी I I कंहाँ की चारकिरणे बावजी कौन द्वीपते मेंऊँ थरहरीबाजी कौन द्वीपते सिन्धुथरहरी बाजी कहाँ की चार चामणेबाजी कहाँ की चार चरणेबाजी कहाँ की चारबेलवाल बाजी I श्री पारबत्युवाच I I अरे आवजी ढोलं द्वीपते उत्पन्न ढोलं ददीद्वीपते उत्पन्न दमामं कनक द्वीपते कनक थरहरी बाजी किरणो मंडचारचासणेलते चार किरणी बाजे सिन्धुद्वीपते सिन्धु थरहरीवाजी नंदुथरहरीते सिंदुथरहरीवाजी चौदिशा की चार चामणे बाजी चारचासणे की चारचासणेबाजी की चार बेलवाले बाजी I श्री इश्वरीवाच I I अरे आवजी ढोल किले ढोल्य़ा किले बटोल्य़ा किले ढोल गड़ायो किने ढोल मुडाया , कीने ढोल ऊपरी कंदोटी चढाया अरेगुनी जनं ढोलइश्वर ने ढोल्य़ा पारबती ने बटोल्या विष्णु नारायण जी गड़ाया चारेजुग ढोल मुडाया ब्रह्मा जी ढोलउपरी कंदोटी चढाया I श्री इश्वरोवाच I I अरे आवजी कहो ढोलीढोल का मूलं कहाँ ढोली ढोल कको शाखा कहाँ ढोली ढोली का पेट कहाँ ढोली ढोल का आंखा II श्री पारबत्युवाच II अरे आवजीउत्तर ढोलीढोल का मूलं पश्चिम ढोली ढोल का शाखा दक्षिण ढोल ढोली का पेट पूरब ढोल ढोली का आंखा I श्री इश्वरोवाच II अरे आवजी कस्य पुत्रं भवेढोलम कस्य पुत्र च ड़ोरिका कस्यपुत्रं भवेनादम कस्यपुत्रं गजाबलम

ii श्री पारबत्युवाच II अरे आवजी ईश्वरपुत्रभवेढोलं ब्रह्मा पुत्र चंडोरिका पौनपुत्र भवेनाद भीमपुत्रं गजाबल ii श्री इश्वरोवाच II अरे आवजी क्स्य्पुत्रभवेढोल कस्य पुत्र च ड़ोरिका कस्यपुत्रभवेपूड़मकस्यपुत्रं कंदोंटिका कस्य पुत्र कुंडलिका कस्य पुत्र च कसणिका शब्द ध्वनीकस्यपुत्र चं कस्यपुत्र गजाबलम ii श्री पारबत्युवाच II अरे गुनीजनम आपपुत्र भवे ढोलम ब्रह्मा पुत्र च ड़ोरिका विष्णु पुत्रं भवे पूडम कुंडली नाग पुत्र च कुरूम पुत्र कन्दोटिका गुनी जन पुत्रं च कसणिका शब्दध्वनिआरम्भपुत्रं च भीम पुत्रं च गजाबल ii श्री इश्वरोवाच II अरे ढोलीढोल का वारा सरनामवेलीज्ये अरे गुनी जन श्रीवेद I सत २ पासमतों ३ गणेस ४ रणका ५ छणक ६ बेचीं ७ गोपी ८ गोपाल ९ दुर्गा १० सरस्वती ११ जगती १२ इतिवारा शर को ढोल बोली जारे आवजी ii श्री इश्वरोवाच II अरे आवजी कस्यपुत्रं भवेनादम कस्यपुत्रं भवेडंवा कस्यपुत्रं कंदोटी कस्य पुत्रं जगतरां ii पारबत्युवाच II अरे आवजी आपपुत्रं भवेनादं नाद्पुत्र च ऊंकारिका ऊंकारपुत्र भवे कंदोटिका कंदोटीपुत्रं जगतरा ii श्री इश्वरोवाच II अरे आवजी आण का कौन गुरु है I कौन है बैठक की माया लांकुडि का कौन गुरु है i कौन गुरु मुख तैने ढोल बजाया i पारबत्युवाच ii अरे गुनीजन आण का गुरु आरम्भ i धरती बैठकर की माया I लांकूडी का गुरु हाथ है गुरुमुख मैंने शब्द बजाया ii श्री इश्वरोवाच II अरे आवजी कौन तेरा मूलम कौन तेरी कला कौन गुरु चेला कौन शब्द ल़े फिरता हैं ह्दुनिया मिलाया I पारबत्युवाच II अरे आवजी मन मूल मूलं पौन कला शब्द गुरु सूरत चेला सिंहनाद शब्दली फिरा में दुनिया में लाया I ईश्वरोवाच II अरे आवजी कौन देश कौन ठाऊ कौन गिरी कौन गाऊं I पारबत्त्युवाच II अरे गुनी जन सरत बसंत देश धरती है मेरी गाँव अलेक को नगर ज्म्राज्पुरी बसन्ते गाँव I ईशव्रोवाच II अरे आवजी तुम ढोल बजावो नौबत बाजि शब्द बजावो बहुत अनुपम कौन है शब्द का पेट कौन है शब्द का मुखम I पार्बत्यु वाच II अरे गुनी जन मै श्री ढोल बजाया नौबत वाली शब्द बजाया बहू अनूप I ज्ञान है शब्द का पेट बाहू है शब्द का मुखम II ईश्वरोवाच II अरे आवजी कौन शब्द का रूपम I कौन शब्द का है शाखा I शब्द का कौन विचार I शब्द का कौन आँखा I शब्द का कौन मुख डिठ
I टोई पूछ रे दास यो शब्द बजाई कहाँ जाई बैठाई I पार्बत्युवाच I I अरे गुनी जन शब्द ईशरी रूपं च शब्द की सूरत शाखा I शब्द को मुख विचारम शब्द का ज्ञान है आँखा शब्द का गुण है मुख डिठ टोई मैई कहूँ रे गुनी जन यो शब्द बजायी हिरदया जै बैठाई I ईश्वरोवाच I I अरे आवजी तू कौन राशि छयी I कौन राशि तेरा ढोलं I कसणि कौन राशि छ I कन्दोटि कौन राशि छ I कौन राशि तेरो दैणा हाथ की ढोल की गजबलम I पारबत्युवाच I I अरे आवजी शारदा उतपति अक्षर प्रकाश I I अ ई उ रि ल्रि ए औ ह य व त ल गं म ण न झ घ ढ ध ज ब ग ड द क प श ष स इति अक्षर प्रकाशम I इश्वरो वाच I I अरे आवजी आवाज कौन रूपम च I कौन रूप च तेरी धिग धिग धिगी ढोलि तू कौन ठोंऊँ छयी कौन ठाउ च तेरी ढोल I ईश्वरोवाच I I अरे गुनी जन अवाज मेघ रूपमच गगन रूपम च मेरी धिगधिगी ढोली मेई सिंघठाण छऊ गरुड़ ठाण च मेरी ढोल मारी तो नही मरे अण मरी तो मरी जाई I बिन चड़कादिनी फिरां बिन दंताऊ अनोदिखाई इह्तो i मुह मरिये कथं रे आवजी I पारबत्यु वाच I अरे आवजी ढोल का बारासर कौन कौन बेदंती I प्रथम वेदणि कौन वेद्न्ति दूत्तिया वेद्न्ति कौन वेद्न्ति तृतिया ३ कौन चतुर्थी ४ पंचमी ५ षष्ठी ६ सप्तमी ७ अष्टमी ८ नवमे ९ दसम १० अग्यार वै वेदणि ११ बार वै वेदणि १२ I ईश्वरोवाच I I अरे गुनीजन प्रथमे वेदणि ब्रह्मा वेद्न्ति ० द्वितीय ० विष्णु ० ५ त्रोतीय देवी ० चतुर्थ ० महिसुर ४ पंचमे ० पांच पंडव ५ ख्स्टमें ० चक्रपति ६ सप्तमे वेदणि सम्बत धूनी बोलिज्ये ० ७ अष्टम अष्टकुली नाग ८ नवे ० नव दुर्गा वेद्न्ति ९ दसमें वेदणि देवी शक्ति वेद्न्ति I एकादसी वेदणि देवी कालिकाम वेद्न्ति बारों वेदणि देवी पारबती देवी II इति पाराशर ढोल की वेदणि बोलिज्ये I ईश्वरोवाच II अरे आवजी ढोल की क्रमणि का विचार बोलिज्ये I प्रथमे कसणि चड़ायिते क्या बोलन्ती I द्वितीये २ त्रितये ३ चतुर्थ ४ पंचमे ५ ख्ष्ट्मे ६ सप्तमे ७ अष्टमे ८ नवमी ९ दस्मे १० एकाद्से ११ द्वार्वे १२ i पारबत्युवाच II अरे आवजे प्रथमे कसणि चड़ाइते त्रिणि त्रिणि ता ता ता ठन ठन करती कहती दावन्ति ढोल उच्च्न्ते I त्रितिये कसणि चड़ा चिड़ाइतो त्रि ति तो कनाथच त्रिणि ता ता धी धिग ल़ा धी जल धिग ल़ा ता ता अनंता बजाई तो ठनकारंति खंती दावम ति ढोल उचते I चौथी कसणि चड़ाइत चौ माटिका चैव कहन्ति दागंति ढोल उचते I पंचमे कसणि चड़ इतों पांच पांडव बोलन्ति कहन्ति दावन्ति ढोल उचते I खषटमे कसणी चड़ायितो छयी चक्रपति बोलंती कहन्ति दावन्ति ढोल उचते I सप्तमे कसणी चड़ाइतो सप्त धुनी बोलिज्यौ कहन्ति गावन्ति ढोल उचते I अष्टमे कसणी चड़ाइता अष्टकुली नाग बोलन्ती क० ढो ० ढाल उचते I नवमे कसणी चड़ाइतो निग्रह बोलन्ती क० ढा ० ढो ० उ ० I दसमी कसणी चड़ाइतो दुर्गा बोलन्ती क ० दा ० ० ढो ० उ ० i अग्यारे क ० च ० देवी कालिका बोलन्ती क ० दा ० ० ढो ० उ ० i बारों देवी पारबती बोलंती क ० दा ० ० ढो ० उ ० i इति बारो कसणे का विचार बोली जेरे गुनीजन II अरे आवजी क्योंकर उठाई तो ढोल क्योंकरी बजाई तो ढोल फिरावती ढोलम क्योंकरी सभा में रखी ढोलम I इश्वरो वाच Ii अरे गुनी जनम उंकार द्वापते उठाई तो ढोल सुख म बजाई तो ढोल I सरब गुण में फेरे तो ढोल लान्कुड़ी शब्द ते राखऊ सभा में ढोल I पारबत्यु वाच II प्रथमे अंगुळी कौन शब्द बाजन्ति I द्वितीये अंगुळी कौन शब्द बाजन्ति I तृतीय अंगुळी कौन शब्द बाजन्ति I चतुर्थ अंगुळी कौन शब्द बाजन्ति I पंचम अंगुळी कौन शब्द बाजन्ति I I इश्वरो वाच II अरे आवजी प्रथमे अंगुळी में ब्रण बाजती I दूसरी अंगुली मूल बाजन्ती I तीसरी अंगुली अबदी बाजंती I चतुर्थ अंगुली ठन ठन ठन करती I झपटि झपटि बाजि अंगुसटिका I धूम धाम बजे गजाबलम I पारबत्यु वाच I अरे आवजी दस दिसा को ढोल बजाई तो I पूरब तो खूंटम . दसतो त्रि भुवनं . नामाम गता नवधम तवतम ता ता तानम तो ता ता दिनी ता दिगी ता धिग ता दिशा शब्दम प्रक्रित्रित्ता . पूरब दिसा को सुन्दरिका I बार सुंदरी नाम ढोल बजायिते I उत्तर दिसा दिगनी ता ता ता नन्ता झे झे नन्ता उत्तर दिसा को सूत्रिका बीर उत्तर दिसा नमस्तुत्ये I इति उत्तर दिसा शब्द बजायिते I

अग्न्या वायव्या नैरीत्मच ईशानछ तै माशी प्रतक विवाद शब्द दक्षिण दिशा प्रकीर्तित्ता I दक्षिण दिसा को वाकुली बीर वकुली नाम ढोल बजायिते I दक्षिण दिसा नमोस्तुते I इति दक्षिण दिसा बजायिते I पश्चिम दिसा झे झे नन्ता ता ता नन्ता छ बजाइते पश्चिम दिसा प्रक्रीर्तता : II को झाड खंडी बीर झाड खंड नामा ढोल बजाइते पश्चिम दिस नमोस्तुते इति पश्चिम दिसा : II अथ बार बेला को ढोल बजाइता II सिन्धु प्रातक रिदसम अहम गता जननी कं चैव एवम प्रात काल ढोल बजाइते I प्रा प्रा प्रवादे चैत्र पुर कालं सवेर कं जननी क च व प्रराणी नाम ढोल बजाइते I मध्यानी मध्यम रूपम च सर्वरूपी परमेश्वर कं जननी कं चैत्र एवम मध्यानी ढोल बजाइते I लंका अधि सुमेरु वा चैत्र रक्तपंचई शंकरो I सूं होरे आवजी चाँद सूर्य्य का कहाँ निवासं कहाँ समागता सुण हो देवी पारबती I इश्वरो वाच II अरे आवजी चाँद सूर्य्य पूर्ब मसा सूर्य मंडल निगासा II सुमेरु पर्वत अस्त्नगता II इति बार्बेला को ढोल बजायते II अथ चार युग को ढोल बजायते I अरे आवजी

ढोल सागर के बारे में जानकारियाँ -२

प्रस्तुतकर्ता भीष्म कुकरेती

ढोल सागर गढ़वाल -कुमाओं का दर्शन शाश्त्र है जो कि संस्कृत कर्मकांड में नही मिलता है . भाषा सरल व ब्रज -गढवाली-कुमाउनी मिश्रित है

ढोल कैसे बना इस पर औजियों के मध्य वार्तालाप हॉट है कि –

चारि जुग ढोल मड़ाया

विष्णु ने घोल्या (लकड़ी का खोळ बनाया )

पारबती ने बटोल्या (ढोल पर पूड़ चढ़ाई )

ब्रम्हा ढोल कन्दोरी चढाया (कंधे कि पट्टी )

महेश ने ढोल्या (और महेश ने ढोल धारण किया)

इसी ढोल को शिव जंत्री कहते हैं .

ढोल का उर्घ्व्मुखी मूल ही नाद कि शुरुवात है

उत्तर ढोली ढोल का मूल

पच्छिम ढोली ढोल क़ी साखा

दखिन ढोली ढोली का पेट

पूरब ढोली ढोली का आँखा

आभार : केशव अनुरागी, नाद नंदनी (अप्रकशित )

ढोल सागर में वर्णित गढ़वाल के वाद्य यंत्र
भीष्म कुकरेती

ढोल सागर गढवाल के दर्शन शास्त्र का एक महत्व पूर्ण साहित्य है. इसे अबोध बन्धु बहुगुणा ने आदि गद्य माना है , (जिस सिद्धांत मै विरोध करता आया हूँ ) . सातवी सदी से बारहवीं सदी तल नाथपंथियों के सिद्धों ने नाथपंथी साहित्य गढ़वाल मंडल को दिया . ढोल सागर भी नाथपंथी साहित्य है और शायद बारहवीं या तेरवीं सदी में इसका रचनाकाल हो. जैसे के हर गढवाली नाथपंथी साहित्य का चरित्र है ढोल सागर भी ब्रज भाषा में है और इसमें गढवाली शब्द नाममात्र के हैं . गढवाली शब्दों से अधिक शब्द संस्कृत के हैं .

ढोल सागर शिवजी और पार्वती संवाद में है एवम विज्ञानं भैरव शैली में है

ढोल सागर में वाद्य यंत्रों का भी वर्णन है :

I पारबती वाच II अरे आवजी छतीस बाजेंत्र बोलिजे I

ओम प्रथमे I जिव्हा बाजत्र बाजे २ शंख, ३ जाम, ४ ताल, ५ डंवर ६ जंत्र ७ किंगरी ८ डंड़ी ९ न्क्फेरा १० सिणाई ११ बीन १२ बंसरी १३ मुरली १४ विणाई १५ बिमली १६ सितार १७ खिजरी १८ बेण १९ सारंगी २० मृदंग २१ तबला २२ हुडकी २३ डफड़ी २४ श्रेरी २५ बरंग (२६ से ३१ का वृत्तांत भी है ) ३२ रणडोंरु ३३ श्राणे ३४ नगारा ३५ रेटि (रौंटळ/रौंटी) ३६ ढोल II it ढोल की उतपति बोली जे रे आवजी II

पंडित ब्रह्मा नन्द थपलियाल द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ में जो छह वाद्य यंत्र नही हैं वे शायद झांझ, थाली , चिमटा, सींग, घुंघरू ,होंगे

इससे एक बात पता चलती है कि मुस्क्बाजा ब्रिटिश राज के देन है . हारमोनियम का भी वर्णन ढोल सागर में नही है ( सन्दर्भ : सेमलटी, १९९० )

सन्दर्भ : ब्रह्मा नन्द थपलियाल १९१३/१९३२ ढोल सागर , बद्रीकेदारेश्वर प्रेस , पौड़ी

अबोध बंधु बहुगुणा , १९७५ गाड मटयकी गंगा

सुरेन्द्र दत्त सेम्लटी , १९९०, गढ़वाल के वाद्य यंत्र , गढवाल की जीवित विभूतियाँ , पृष्ठ २७६ -२८०

Damau Sagar (दमौ सागर )

Presented by /प्रस्तुति Bhishma Kukreti (भीष्म कुकरेती )

Dhol Sagar and Damau Sagar are the treasurar of Garhwal as these literature are philosophical literature . damau sagar is about explaining the music

The language is Braj with a couple of Garhwali words. As karmkand is in Sanskrit the Garhwali philosophy is in Braj Language because the Nath sect preachers were from Rajasthan, Mathura area who came to Garhwal (from 6th century to 1200 AD)

अथ दमामे सागर -लिखितम I . जब उर्द घोट ताल बाजंती , लबीता तानी ता झे तानी ता तनक झेनता आप वेश्वर चले बलि नन्द न लोई अटल को भेंट मिली

नन लोई दुहातो मिले अग्नि I ज्ल्लाब सरड़ लान्कुड़ गरड़ का पूड़ बाजन्ती हांणी डे दमामे निसाण कापूड़ जै दिनन सुननी सन तै दिन बी तू दमामी कहाँ छयो जै दिन चंदनी सुरजि पौन नि पाणी तै दिन बी तू दमामी कहाँ छयो जै दिन मातानी पितानी तै दिन बी तू दमामी कां छयो जै दिन जातीनी जायो जै दिन तू दमामी काँ छयो अनंग गड़ो अनंग मडो बार जाती नगाजन्ती शब्द संकार चार लान्कुडि काँ काँ बाज्न्ती रे आवजी चम्म लान्कुडि धौंस बाज्न्ती I शब्द लान्कुडि मेरा ढोल का पूड़ बाजन्ती संकार (जोड़ा) लान्कुडि मेरा दमामी का पूड़ बाज्न्ती रे आवजी बारा स्र (स्वर) को ढोल बतीस स्र को दमामम ठणम ठाण बीजे खाणम के ते बार जालता सर एक रग दुई बीर हर सर तीन कुलोली सर (स्वर) चार ब्रुदम बंदनी सर पांच जन्ता सर छै सांवला सर सात अगसर (अक्षर ) आट नी सर नौउ दरमिदरी दमामी निसाण का पूड़ सर दास गोउ गजन्ता सर गयार विरदावली सबद को लान्कुड़ सर बार तेघरंग ते परा सर तेर चंप घर चपेला सर चौद पर ना हो पारबती का नाम सर पन्द्र सोल मदे सेला ब्ररण (वर्ण) सर सोल सबद में सबद धातु बाज्न्ती सर सतर बाट में असट धुनी बाजन्ती सर अट्ठार येंक नंग एक त्रिगुटी बाजन्ती सर उन्नीस छांटी लान्कुड़ बेला बल बाजन्ती सर बीस एक नंग त्रिगुटी सर य्क्कीस बरम कला उच्चारन्ती सर बाईस से घरंग तेपरा सर त्यइस चंप पर चंपेला सर (स्वर ) चौबीस पर ण हो पारबती का नाम सर पचीस छत्र लोक कमन दाव्न्ती सर छबीस सबद में सबद धातु बाजन्ती सर सताईस असट (अष्ट ) में असट धुनों बाजन्ती सर अठाइस नऊ में दरबिंदु ड्या सिंदु सर उणतीस करम लील्या बौ बाजन्ती सर त्रीस टोकती दमामं बाजन्ती कुलोलं सर एकतीस पंच अगुनी मरद नाम टकती सर बत्तीस गारा सर को ढोल बत्तीस सर (स्वर ) को दमामं इति अगम दासं पूड़ हांणी ढे दमामी का निसतारं आदि पुनादी (अद्दी पुन्यादी )

Curtsey ; Shri Prem lal Bhatt of Village, Seman, Dev Prayag, for his collection

Abodh Bandhu Bahuguna , Gad Matyk Ganga

Dr Vishnu Datt Kukreti for interpretetion in His Nathpanth Book

Late Keshv Anuraagi and Dr Vijay Das also wrote comments on this Philosphical literature

Copyright for comments @ Bhishma Kukreti


ढोल सागर में ढोल के ३९ तालों का वर्णन और संगीत लिपि

(केशव अनुरागी व डा शिवा नन्द नौटियाल का गढवाल के लोक गीतों के संरक्षण में योगदान, भाग -१ )

भीष्म कुकरेती

गढवाल के लोक साहित्य को अक्षुण रखने के लिए कई विद्वानों व गुनी जनों का अथक योगदान है
इनमे से स्व केशव अनुरागी व डा शिवा नन्द नौटियाल का योगदान कहीं अलग भी है . केशव अनुरागी ने ढोल बाडन की शैली को

देहरादून में प्रायोगिक धरातल में प्रचारित व प्रसारित किया . केशव जी राम लीला या अन्य कार्यकर्मों में ढोल बाडन ही नही करते थे अपितु

कईयों को ढोल बाडन का प्रशिक्षण भी देते थे. मुझे अनुरागी जी द्वारा ढोल बादन सुनने का अवसर चुखुवाले की गढ़वाली रामलीला में प्राप्त हुआ है

केशव जी ने कई लोक गीतों की स्वार लिपि भी तैयार कीं हैं और श्री शिवा नन्द नौटियाल जी ने कई लिपियों को अपने ग्रन्थ में स्थान भी दिया है

यथा एक उधाह्र्ण है जिसमे केशव जी ने ढोल सागर के चैती प्रभाती में ढोल दमाऊ युगल बंदी की स्वर लिपि . ढोल में ३९ टाल हैं व दमाऊ में तीन

१ २ ३ ४ ५ ६ ७ I ८ ९ १० ११ १२ १३ १४

झे नन तू झे नन ता – I झे गा तु झे ननु ता –

१५ १६ १७ १८ १९ २० २१ I २२ २३ २४ २५ २६ २७ २८

त ग ता झे गु त – I झे गा झे न्ह न ता –

२९ ३० ३१ ३२ ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ I १ २ ३

ता – क झे ना तु झे गा — ता — I झे ननु तु

यह लोक गीत चैत महीने में बजाया जाता है जिसे चैत प्रभाती कहते हैं चैत संगरांद के दिन औजी अपने ठाकुरों के यहाँ घर घर जाकर सुबह इस्ताल पर ढोल दमाऊ बजाते हैं

इस पारकर हम पाते हैं की केशव अनुरागी ने आने वाली पीढ़ी के लिए एक विरासत छोडि है . प्रवास में जब अब प्रवासी इन ढोल बजाना नही जानते हैं वे इन सन्गीएत लिपियों के बल पर शी तरह से ढोल-दमाऊ बजा सकते हैं

हमारा नमन स्व केशव अनुरागी को और डा शिवा नन्द नौटियाल को जिन्होंने हमारी धरोहर को बचाने में अतुल्य योगदान दिया

सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती

लिपि अधिकार @ श्रीमती केशव अनुरागी

  • Dhirendra Bisht

    Here is your great contribution … Thanks for share

  • Asavari Honavar

    beautiful. Kalimath mein bahut das milte hai.

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