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Aug
19

श्रध्दा सुमन- गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’

श्री गिरीश चन्द्र तिवारी ‘गिर्दा’ (गिर्दा की कवितओं और गीतों का आनंद लेने के लिए फोटो पर क्लिक करें )

9 सितम्बर 1945 – 22 अगस्त 2010

दुनिया से जानेवाले जाने चले जाते हैं कहाँ.. कैसे ढूंढें कोई उनको…नहीं क़दमों के भी निशाँ ..

प्रसिद्ध रंगकर्मी व जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ ने रविवार, 22 अगस्त 2010 को सुशीला तिवारी चिकित्सालय में अंतिम सांस ली। पिछले कई दिनों से उनकी तबीयत खराब चल रही थी। 65 वर्षीय गिरीश तिवारी गिर्दा को गत 20 अगस्त 2010 को पेट में तेज दर्द होने पर सुशीला तिवारी चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था। अगले दिन पेट का सफल ऑपरेशन भी हुआ, लेकिन उनकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ। 22 अगस्त 2010 की  दोपहर 11 बजकर 31 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वे अपने पीछे पत्नी हेमलता व दो बेटे प्रेम पिरम व तुहिन्नासु को छोड़ गये हैं।

वर्ष 1945 में अल्मोड़ा के ज्योली गांव में माता जीवन्ती व पिता हंसा दत्ता तिवारी के घर जन्मे गिरीश तिवारी को जनमानस ‘गिर्दा’ उपनाम से पुकारते थे। गिर्दा बचपन से ही जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे। गिर्दा अपनी कविताओं से जन समस्याओं और उनके समाधान के लिए बने शासन प्रशासन पर तीखे तंत्र भी कसते रहे। उत्तराखंड की कोई भी समस्या हो, कोई भी आन्दोलन हो, कोई भी पीड़ा हो, गिर्दा अपनी कविताओं के जरिये हर जगह विद्यमान रहते थे। मेहनतकश अभावों से जूझती जिन्दगी को स्वर देने वाले गिर्दा का दर्द लोक गीतों में भी झलकता है। पर्यावरण को बचाने के लिए भी जुझारूपन से लगे रहे तथा पहाड़ के हर संघर्ष में लोगों का भरपूर साथ दिया। क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लेखों के माध्यम से उन्होंने अपने विचार व्यक्त किये। लोक गायक झूसिया दमाई पर शोध  कार्य भी किया। राजीव कुमार निर्देशित फिल्म वसीयत में गिर्दा का अभिनय भी यादगार रहेगा। वर्ष 1996 में गिर्दा को उत्ताराखंड लोक संस्कृति सम्मान से नवाजा गया। जनवादी लेखन के लिए भी मसूरी में भारतीय जन नाट्य संघ ने उन्हें सम्मानित किया।

(Source: http://in.jagran.yahoo.com & http://www.merapahadforum.com )

बातें भूल जाती हैंयादें याद आती हैं.. 

यूँ तो प्रत्येक  उत्तराखंड प्रेमी की  ’ गिर्दा’ से जूडी कुछ यादें होंगी  परन्तु हर व्यक्ति विशेष की स्वयं से जूडी यादें सर्वदा विक्षिप्त होती हैं..

Girda Inaugurating CU-Mera Pahad's Program on 26-Nov-2006

गिर्दा से पहली मुलाकात का मौका मुझे वर्ष 2003 में दिल्ली में मिला, जब श्री नरेन्द्र सिंह नेगी के साथ एक जुगलबंदी के कार्यक्रम के बाद मैं उन्हें उनके घर छोड़ने गया। उसके बाद उत्तराखंड से जुड़े और भी कई सांस्कृतिक कार्यकर्मों में उनसे मुलाकात हुई। उत्तराखंड और उत्तराखंड के विकास के प्रति उनका जोश देखते ही बनता था।   मुझे आज भी याद है 25 नवम्बर 2006 का दिन जब क्रीयेटिव उत्तराखंड-म्योर पहाड़ की टीम  नैनीताल, उत्तराखंड पहुंची और वहां उपस्थित महानुभावो में ‘ गिर्दा भी थे। पहाड़ और हिमालय के प्रति हमारे जुड़ाव को देखकर ‘ गिर्दा’ गुनगुनाये थे…

दिल लगाने में वक्त लगता है…
डूब जाने में वक्त लगता है…
वक्त जाने में कुछ नहीं लगता…
वक्त आने में वक्त लगता है…

 

 

28 जुलाई 2007 में उत्तराखंड असोसिऐशन ऑफ़ नोर्थ अमेरिका (UANA) के  नवे  वार्षिक समारोह के अवसर पर एक बार फिर अमेरिका में उनसे साक्षात मुलाकात  हुई। यह मेरा सौभाग्य था की उनके साथ एक ही मंच पर खड़ा रहकर मुझे हुडुक बजाने का अवसर मिला।

पर शायद मैं इतना खुशनसीब नहीं हूँ की उनके इस धरती से हमेशा के लिए  चले जाने से पहले उनसे आखिरी बार बात कर पाता.. उनके अस्वस्थ होने की खबर मुझे 20 अगस्त 2010 को मिल गयी थी..परन्तु किसी कारणवस उनसे उस दिन बात न हो सकी..  21 अगस्त 2010 की रात भी ये सोचकर सोया, की कल सुबह सबसे पहले गिर्दा के हाल समाचार पूछुंगा… पर वो कहावत की ‘ कल कभी नहीं आता’ सच हो गयी… अगली सुबह का सूर्य अपने साथ उनके देवांगत होने की खबर लाया… और उनसे एक बार बात करने की इच्छा केवल इच्छा बन कर रह गयी।

गिर्दा के जाने से उत्तराखंड ने ना केवल एक निष्पक्ष और निस्वार्थी नागरिक खोया है, बल्कि आजकी युवा पीड़ी जो अपने पहाड़ के लिए कुछ करना चाहती है, उसने एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक भी खोया है। गिर्दा के यकायक चले जाने से उत्तराखंड नव-चेतना में जो शुन्य बन गया है.. उसे शायद ही कभी पूरा किया जा सकेगा. पर गिर्दा की निम्नलिखित पंक्तियों के साथ मैं यही आशा करता हूँ की एक दिन वो दिन जरूर आएगा जिसकी चाह और राह में चलते हुए हमारे गिर्दा हमसे इतनी दूर चले गए की अब उनकी केवल यादें ही शेष हैं….

जेंता एक दिन त आलो ये दुनी में..
चाहे हम न ल्या सकूं, चाहे तुम नि ल्या सको..
जेंता क्वे ने क्वे तो ल्यालौ.. ये दुनी में..
जेंता एक दिन त आलो ये दुनी में..

कितना अच्छा हो…अगर हम और आप उनकी याद में केवल वक्त न बिताएं…बल्कि उन यादों में बसे उनके अधूरे सपनो को सच करने के लिए एक जुट होकर प्रयास करें… वही हमारी उनके लिए सबसे बड़ी श्रधांजलि होगी।

गिर्दा आप कभी जा नहीं सकते क्यूंकि आप हमारी यादों और हमारे पहाड़ की बुनियादों में हमेशा जीवित रहेंगे…

म्योर पहाड़ और अमेरिका में बसे सभी पहाड़ प्रेमियों  की ‘ गिर्दा’ को भावभीनी श्रधांजलि..आपको हमारा शत-शत नमन..

  • मसिर अरुण

    गिर्दा को श्रद्धांजलि और सलाम !

  • http://www.jasknowledge.com jas pandey

    bhatte bhal #sanjuda

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