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Aug
29

श्री विपिन चन्द्र त्रिपाठी

श्री विपिन त्रिपाठी उत्तराखंड के एक विख्यात समाजवादी कार्यकर्ता, पर्यावरण प्रेमी और पत्रकार थे|

द्वारहाट ब्लॉक, अल्मोड़ा जिले के गांव दैरी में 23 फरवरी, 1945 को उनका जन्म श्री मथुरा दत्त त्रिपाठी और श्रीमती कलावती त्रिपाठी के घर हुआ | मुक्तेश्वर में उनकी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा हुई | उन्होंने द्वारहाट से इंटरमीडिएट की परीक्षा पारित की और इलेक्ट्रिकल डिप्लोमा के पाठ्यक्रम के लिए हल्द्वानी चले गए | उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और 1967 में वह समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए | वह डा. राम मनोहर लोहिया के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे | नैनीताल जिले के तराई के भूमिहीन ग्रामीणों के लिए 1965 से 1969 तक वे लड़े | 1968-69 में उन्होंने एक पाक्षिक समाचार पत्र ‘युवजन मशाल’ का प्रकाशन शुरू कर दिया है और लोगों की मांगों की प्राप्ति के लिए काम किया| उन्होंने विभिन्न मांगों को उजागर करते हुए कई सार्वजनिक आंदोलनों का नेतृत्व किया | 1970 में वे युवजन सभा का एक राज्य स्तरीय सम्मेलन रख सकते थे लेकिन इस दौरान उन्हें सरकार द्वारा पहली बार गिरफ्तार किया गया| अपनी रिहाई के बाद वह द्वारहाट वापस आ गए |

1971 में उन्होंने अपना  पाक्षिक समाचार पत्र द्रोनांचल प्रहरी शुरू किया |  इस पत्र के माध्यम से वे गुटों और व्यापारियों (जैसे स्टार पेपर मिल और लालकुआं) द्वारा जंगलों की लूट के खिलाफ लड़े; नतीजतन उनके खिलाफ प्रेस परिषद में एक मुकदमा दायर किया गया | वह उत्तराखंड में वन आंदोलन की दौड़ में सबसे आगे थे | 1974 में  नैनीताल में अन्य कार्यकर्ताओं के साथ उन्होंने वनों की नीलामी का विरोध किया और 18 अन्य कार्यकर्ताओं के साथ उन्हें गिरफ्तार किया गया | इस विरोध प्रदर्शन ने पूरे क्षेत्र में प्रदर्शन को उकसाया | 1974 में उनके नेतृत्व में चिपको की सबसे बड़ी लड़ाई चाचारीधर जंगल को बचाने के लिए, सहारनपुर पेपर मिल के खिलाफ लड़ी, जिसमे सफलतापूर्वक उस वन को बचाया जा सका | 1975 में आपातकाल के दौरान वह 22 महीने से अधिक समय के लिए जेल गए | इसी दौरान उन्होंने द्वारहाट में डिग्री कॉलेज की स्थापना की मांग के साथ भूख हड़ताल किया; जिसमे  उनका बहुत वजन कम हो गया, लेकिन अपनी मृत्यु तक या उनकी मांग की उपलब्धि तक भूख हड़ताल जारी रखने के लिए वे अडिग खड़े रहे|  तत्पश्चात 1986 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा द्वारहाट में कुमाऊँ इन्जिनीरिंग कॉलेज की नीव रखी गयी; जो आज बिपिन चन्द्र त्रिपाठी कुमाऊँ इन्जिनीरिंग कॉलेज के नाम से जाना जाता है|

त्रिपाठी जी हरि दत्त बहुगुणा के साथ उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक सदस्यों में थे | वास्तव में त्रिपाठी जी उत्तराखंड के पहाड़ी लोगों के संघर्ष के लिए प्रतिबद्ध एक लोक – तंत्रवादी थे | वह एक कट्टर दिग्गज थे जो उत्तराखंड की स्थापना के लिए खड़े हुए और उन्होंने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सफलतापूर्वक काम किया | नए बने उत्तराखंड राज्य में वर्ष 2002 में वे उत्तराखंड विधानसभा के एक सदस्य बने | उन्होंने खुद को उत्तराखंड के विकास के लिए समर्पित किया और दुगने जोश और उत्साह के साथ उत्तराखंड के विकास की लड़ाई को जारी रखा|

30 अगस्त, 2004 को 59 साल की उम्र में उनका निधन हो गया | उस समय वे वह उत्तराखंड क्रांति दल की राज्य इकाई के अध्यक्ष थे | उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे पुष्पेश त्रिपाठी को विधायक निर्वाचित किया गया, जो रास्ता उनके पिता द्वारा दिखाया गया था पुष्पेश भी उसे अपनाने की कोशिश कर रहे हैं|

युवाओं के नाम सन्देश (श्रोत: श्री चन्दन डांगी द्वारा लिखित ” उत्तराखंड की प्रतिभाएं “): जब देश नैतिक व चारित्रिक मूल्यों के पतन के कगार पर है | व्यक्तिवाद, परिवार-जातिवाद फैल चुके हैं, भरष्टाचार चरम पर है, ऐसे समय में हिमालय पुत्रों के सामने अग्निपरीक्षा की घड़ी आ गयी है| उक्त महामारियों से छुटकारा पाकर एक आदमी बनना होगा | फिर वे जिस भी क्षेत्र में जायेंगे, उनकी प्रतिभा व योग्यता का लाभ इस प्रदेश, भारत व मानवता को मिल सकेगा | जिस प्रकार हिमालय व गंगा-यमुना ने सारे मानव समाज को दिशा दी है, जीवन दिया है, हम भी उसी अनुरूप आग बढ़ें |

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