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Oct
12

ज्याड़ ईजा

ज्याड़ ईजा (मौसी) बिस्तर पर मरणासन्न पडी़ है, बस एक ही रट लगाये हुए है,” म्यर चीनी नि आय ?” बिरादरी की औरतें ज्याड़ ईजा के बालों पर अंगुलियाँ फेरती हुई कहती हैं , “ऐ जाल ओ ज्यू ऐ जाल”। ज्याड़ ईजा के तीन बेटे बहुए, नाती पोते सब उसे घेरे खड़े हैं मगर उसकी जबान पर तो एक ही आखर ठहरा म्यर चीनी।
बात 1962 के भारत चीन युद्ध की है सुबेदार प्रेम सिंह बजेठा अपनी कंपनी के साथ अरुणाचल प्रदेश में तैनात थे। गांव के गांव युद्ध के कारण खाली कराये जा चुके थे। घायल सुबेदार अपनी कंपनी के साथ मोर्चे से पैदल लोट रहे थे तो एक गांव के घर से किसी बच्चे की रोने की आवाज़ आ रही थी, अंदर जाकर देखा तो एक तीन चार साल का बालक रोये जा रहा था। आस पास कोई न था, पूरा गांव खाली हो चुका था, न मालूम कैसे यह बच्चा पीछे छूट गया। सूबेदार से रहा न गया वह सैनिकों की मदद से बच्चे को अपने कैंप ले आये। स्थानीय लोगों से उस बच्चे के परिवार के बारे में पता लगाने की बहुत कोशिश की गयी लेकिन सब बेकार। अंततः सूबेदार प्रेम सिंह उस बच्चे को अपने गांव बजेल ले आये।
सूबेदार घर से काफी सम्पन्न थे, सूबेदार का रौब देखते ही बनता था। चार बेटे अपने थे, पांचवे के आने पर सूबेदारनी यानी ज्याड़ ईजा ने कोई सवाल नहीं उठाया। बच्चे का नामकरण किया गया गुमनाम बच्चा बन गया गजेन्द्र सिंह बजेठा। जल्द ही गजेन्द्र ज्याड़ ईजा से इतना घुल मिल गया कि मानो यह उनका सगा बेटा हो।
ज्याड़ ईजा उसे दिन रात कलेजे से लगाये रहती। अरुणाचल का होने के कारण गजेंद्र के चेहरे की बनावट चीनियों जैसी थी इस कारण उस सब बच्चे चीनी चीनी पुकारने लगे धीरे धीरे गजेंद्र नाम पीछे छूट गया क्या बच्चे क्या बड़े सब की जुबान पर चीनी नाम घर कर गया। यह चीनी को भी पता था कि वह इनकी सगी संतान नहीं उसे अरुणाचल से लाया गया है । अमूमन बड़े बेटे के नाम से मां बाप को पुकारा जाता है जैसे हरिया की ईजा या हरिया के बौज्यू पर ज्याड़ ईजा के चीनी के प्रति अगाध प्रेम को देखते हुए गांव भर की औरतें उसे चीनी की ईजा पुकारने लगीं।
गजेंद्र उर्फ चीनी को रनमन के प्राइमरी स्कूल में डाला गया जहां उसके बडे़ दो भाई भी पढते थे। वह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि का था। पहले दो भाई प्राइमरी पास कर रानीखेत के सैनिक स्कूल में भर्ती हुए। बाद में चीनी को भी दाखिल कर दिया गया।
समय बीतता गया चीनी ठेठ पहाड़ी बन गया था। छुट्टियों में घर आकर खूब धमाल करता काफल तोड़ने गणनाथ के जंगल में जाता, कोसी में मछलियां मारता, बरातों में खूब नाचता, कभी कभी बच्चों के साथ गुच्छी भी खेल लेता।
सूबेदार प्रेम सिंह भी रिटायर हो कर घर आ गये थे, कभी कभार वह बंदूक लेकर जंगलों में शिकार पर जाते तो चीनी और दूसरे भाइयों को भी साथ ले जाते। स्कूल की उम्र में ही चीनी गजब का निशाने बाज बन चुका था।
वक्त अपनी रफ्तार चलता गया। पहले चीनी के दो भाई सेना में भर्ती हुए, कुछ सालों बाद चीनी भी सेना का जवान बन गया।
बड़े भाइयों का विवाह भी हो गया अब चीनी के लिये भी वधू ढूंढने लगे। एक दिन सूबेदार को चीनी का खत आया जिसमें लिखा था,” बाबू आपने मेरे लिए जो किया उसका कर्जा मैं जीवन भर नहीं उतार पाऊंगा, मुझे मेरे परिवार वाले मिल गये हैं मैं वहां जा रहा हूं ।”
ज्याड़ ईजा ने जब यह सुना तो उसके होश ही उड़ गये। उन्होंने सुबेदारजी से बहुत चिठ्ठियां चीनी को लिखवाई लेकिन चीनी का जबाव नहीं आया । ज्याड़ ईजा रोज खीम सिंह पोस्टमैन की राह देखा करती। इस बीच ज्याड़ ईजा पर दुख का पहाड़ टूटा उसका एक जवान बेटा असमय चल बसा। मैं जब भी उनसे मिला तो मुझे लगा सगे बेटे की मृत्यु से अधिक दुख चीनी के छोड़ जाने का है।
आज ज्याड़ ईजा मृत्यु शैया पर है उसे लगता है कि वह अब नहीं बचेगी, उसकी अंतिम ख्वाहिश है सिर्फ चीनी से मिलने की काश हममें से कोई उसका पता जानता।

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