Category Archive: History of Uttarakhand

This section of the block is dedicated to the rich history of Uttarakhand, history of garhwal and history of kumaon

Nov
01

अपण धरोहर अपण कोशिश: Aipan (उत्तराखंड की लोककला- ऐपण)

Aipan

हमारी उत्तराखंडी संस्कृति में विभिन्न प्रकार की लोक कलाएं मौजूद है। उन्ही में से एक प्रमुख कला “ऐपण” भी है। उत्तराखंड की स्थानीय चित्रकला की शैली को ऐपण के रूप में जाना जाता है। मुख्यतया ऐपण उत्तराखंड में शुभ अवसरों पर बनायीं जाने वाली रंगोली है। ऐपण कई तरह के डिजायनों से पूर्ण किया जाता …

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Sep
24

बागनाथ का वरदान (भाग-10)

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आभार : पुष्कर पुष्प/शैलाभ रावत सुबह को जब मेहर भाइयुं को पता चला कि राजुला में खाना नहीं खाया है तो वे समझ गए की उसके मन से मालू की याद निकालना आसान नहीं है । सोच विचारकर उन्होंने फैसला किया कि राजुला राह पर तभी आ सकती है जब उससे शादी कर ली जाय …

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Aug
29

“बदल्याँ मनखि, बदल्युं समाज”

दगिड्यो, दानों क गिच्चा बिटी झणी कथ्गा बगत सूणि कि पुरणा जमना क लोग कथु सीधा-सच्चा अर प्यार-प्रेम वला हूंदा छाया। आजै बगतै हालत देखि मिथें पुरण्यों कि वु छ्वीं याद ऐ ग्येनि अर मि वे लोक मा पौंछि गयुं जु मैखुणि बि कल्पना हि च। पण कुच बच्याँ पुरण्यों देखि जरूर विस्वास होंद कि …

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Jul
24

बागनाथ का वरदान (भाग-9)

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आभार : पुष्कर पुष्प/शैलाभ रावत पदुवा ने नीचे नदी के पास जाकर पीछे मुड़कर देखा | चुनरी देख कर  लगा कि राजुला बैठी है । उसके पाँव जैसे ही नदी की ओर बढ़े, राजुला वहां से भाग खड़ी हुई ।पदुवा से पीछा छुड़ाने के चक्कर में उसे अपनी पिछौडी से हाथ धोना पड़ा । वह जब पानी लेकर आया तो राजुला की जगह ठूंठ पर उसकी चुनरी देख उसने माथा पीट लिया । वह तब तक आँखों से ओझल हो चुकी थीं । द्वाराहाट से बैराठ ज्यादा दूर नहीं था । राजुला मन में प्रिय मिलन की चाह लिए बेसुध चली जा रही थी। बागेश्वर से चले उसे दो दिन हो गए थे । इस बीच उसने अस्सी कोस का रास्ता तय कर लिया था । इन तीन दिनों में उसके मुंह मेँ अन्न का एक दाना तक नहीं गया था । वह भूख से बेहाल थी । थकान से चूर । उसके कपड़े फट कर तार-तार हो गए थे और पैर लहुलुहान । लेकिन मन में प्रेम की ज्योति जलाकर चलने वाले प्रिय मिलन की चाह में इन बातों पर कहाँ ध्यान देते हैं । भूख-प्यास और थकान से विरक्त राजुला बस एक ही बात सोच रही थी कि एक बार किसी तरह प्रिय के दर्शन हो जाएँ, इसके बाद भले ही उसके प्राण क्यूँ न निकल जाएँ । पांच कोस चलने के बाद राजुला के पैर जवाब देने लगे, तो वह चीड के एक पेड़ के नीचे तने से पीठ सटाकर सुस्ताने बैठ गयी ।एक तो थकान ऊपर से फटे कपड़ों में ठंडी हवा के झोंके तन को काँटों की तरह बेध रहे थे । निढाल-सी बैठी राजुला को नींद ने अपने आगोश में समेट लिया । नींद के तारों में उलझा एक खुबसूरत सपना उसकी आँखों में उतर आया ।उसने देखा  वह अपने प्रिय मालू के साथ नदी किनारे एक शिलाखंड पर बैठी है । उसका सर मालू की गोद में है और मालू धीरे-धीरे उसके बाल सहला रहा है । वह पलकें बंद किये मालू के ख्यालों में खोयी है ।उसकी इस स्थिति का लाभ उठाकर मालू ने चेहरा नीचे झुकाया और अपने तपते होंठ उसके होंठों पर रख दिए । उसने हडबडाकर आंखें खोली ।वह उठकर बैठना चाहती थी प्रयास भी किया लेकिन तभी  मालूशाही ने उसे अपने आगोश में समेट लिया । उसे प्रिय की बाँहों में सिमटना भी अच्छा लगा और उसके होंठों का स्पर्श भी । वह चाहती थी मालू उसे यूँ ही बाहों में समेटे रहे । अचानक घोड़ो के टापों की आवाज सुनकर राजुला का सपना टूट गया । उसने आंखें खोलकर देखा । दिन का देवता पश्चिमी ढलान पर उतर रहा था उसकी किरणें रक्तिम होने लगीं थीं । पश्चिम से कई घुड़सवार घोड़े दौड़ाते हुए उसी और आ रहे थे । उसने गिनकर देखा वह सात लोग थे । शाही सैनिकों जैसे लिबास में । बैराठ पास था । राजुला यह सोचकर खुश हुई कि जरूर वे बैराठ के सैनिक होंगे । उनकी मदद से वह बड़ी आसानी से अपने मालू तक पहुँच जाएगी । राजुला उठाने का उपक्रम करती इससे पहले ही सातों घुड़सवार उसके सामने आ गए । वे इस अप्रतिम सुंदरी को इस हाल में जंगल में देख आश्चर्यचकित थे । राजुला मन ही मन खुश होते हुए उनकी और देखते हुए बोली, “मैं राजुला हूँ । आपके राजकुमार मालूशाही की अमानत । बहुर कष्ट झेलकर यहाँ तक पहुंची हूँ । आप लोग मुझे मेरे मालू तक पहुंचा दीजिये ।” सातों घुड़सवार हँसे । उनका इस तरह हँसना राजुला को बड़ा अजीब लगा । वह कुछ समझ पाती, इससे पहले एक घुड़सवार मुस्कुराते हुए व्यंग्य से बोला,”तुम गलत समझ रही हो सुंदरी । ये इलाका बैराठ का नहीं है । ये जगह जहाँ तुम बैठी हो मेहरकोट है और हम सातों भाई मेहर हैं । हम लोग शिकार पे निकले थे की तुम मिल गयी ।” मैं बैराठ के राजकुमार मालूशाही की अमानत हूँ । आप मुझे उन तक पहुंचा दीजिये । यही क्षत्रिय धर्म है ।” राजुला ने विनती करते हुए कहा तो उनमें से एक घुड़सवार बोला ,”कत्यूर हमारे दुश्मन हैं और तुम दुश्मन की अमानत । हम तुम्हें बैराठ नहीं अपने महल में  ले जायेंगे । मालू के लिए क्षत्रिय धर्म निभाना है तो युद्ध के मैदान में निभाएंगे ।” राजुला समझ गयीं की वह एक बार फिर से मुसीबत में फंस गयी है और इस मुसीबत से निकलना आसान नहीं है । वह अपने बचाव के लिए मेहर भाइयुं से प्रार्थना करती, इससे पहले ही उनमें से एक घुड़सवार ने उसे जबरन घोड़े पर खींच लिया । अगले पल सातों घोड़े मेहरकोट की ओर दौड़ने लगे । मेहरकोट पहुंचते ही मेहर भाइयुं ने दासियुं को आदेश दिया की वह राजुला को स्नान बगैरा कराकर नए वस्त्र पहनाएं । दासियाँ राजुला को ले गयीं, तो सातों भाइयुं के बीच उसी मुद्दे पर बात हुई ।राजुला इतनी खुबसूरत थी कि उस पर सातों भाइयुं  की नजर ख़राब थी । बड़ा भाई शादीशुदा था । तय हुआ,राजुला से दुसरे नुम्बर का भाई शादी करेगा । राजुला को तैयार करके महल के एक कमरे में बंद कर दिया गया । दासियुं ने उसके सामने शाही भोजन परोसा । लेकिन राजुला ने भोजन की ओर देखा तक नहीं ।उसे बार-बार अपने माता-पिता और मालू की याद आ रही थी । वह रात राजुला ने आँखों-आँखों  में गुजारी । जारी ………. चित्र सौजन्य: गूगल

Jul
15

बागनाथ का वरदान (भाग-8)

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आभार : पुष्कर पुष्प/शैलाभ रावत गगास नदी पार करके राजुला बिन्ता के हरे-भरे जंगल में जा पहुंची | अनेक कठिनाइयुं का सामना करते राजुला आगे बढ़ी | उबड़-खाबड़ रास्तों, झाडियूँ पथरीली चट्टानों और राह के पत्थरों की तक उसने परवाह नहीं की | काँटों में उलझकर उसके कपडे जगह-जगह से फट गए | लेकिन उसे …

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