Category Archive: Uttarakhand Calamities

Aug
29

“बदल्याँ मनखि, बदल्युं समाज”

दगिड्यो, दानों क गिच्चा बिटी झणी कथ्गा बगत सूणि कि पुरणा जमना क लोग कथु सीधा-सच्चा अर प्यार-प्रेम वला हूंदा छाया। आजै बगतै हालत देखि मिथें पुरण्यों कि वु छ्वीं याद ऐ ग्येनि अर मि वे लोक मा पौंछि गयुं जु मैखुणि बि कल्पना हि च। पण कुच बच्याँ पुरण्यों देखि जरूर विस्वास होंद कि …

Continue reading »

Jun
01

अपण धरोहर अपण कोशिश: औषधीय वृक्ष भीमल (भीकू )

Bheemal

उत्तराखंड में औषधीय वृक्षों की कोई कमी नहीं है | औषधीय वृक्षों में एक नाम है भीमल, जो की काफी बड़ी मात्रा में पहाड़ों पर खेतों के किनारे पाए जाते है | इसे हम  भीकू, भीमू, और भियुल  नाम से भी जानते है | इस वृक्ष का कोई ऐसा भाग नहीं है जो कम नहीं आता हो | भीमल की टहनियों से पत्तियां तो जानवरों के चारे के लिए उपयोग में ली जाती हैं, टहनियों को सुखा कर, स्थिर जल कुंडों में भिगाने  रख देते हैं, जहाँ हफ्ते दो हफ्ते में बाहरी छाल सड़ जाती है, पानी से बाहर निकाल कर, इस छाल  से रेशे निकाल कर सुखाये जाते हैं, रेशों को  पत्थर पर  पटकने और झटकने से छाल के अवशेष हट जाते हैं और मुलायम से एक मीटर के लगभग लम्बे, भूसे के रंग के रेशे, प्राप्त होते है। स्थानीय भाषा में यह रेशा स्योल्ल्हू के नाम से जाना जाता है।  जिन्हें उँगलियों से कंघी करके बारीक रेशों को अलग करके, बट कर पतली रस्सियां बनाई जाती हैं। इन पतली रस्सियों की तीन लड़ों को बट कर लम्बी मोटी रस्सियाँ बनाई जाती हैं, जिनका उपयोग जानवरों को खूटों से बांधने के लिए होता है. भीमल की रस्सियों मुलायम, मजबूत और नमी  रोधक होती हैं। ये जानवरों की गर्दनों को कोइ हानी नहीं पहुंचाती हैं इसके अलाव, जहाँ भी मजबूत, मोटी रस्सियों के आवश्यकता होती है, वहां यह रस्सी उपयोग में लाई जाती है| भीमल के कच्ची सीटों से चाल निकालकर डंडे से कूट-कूटकर अठाला (गाँव) नामक झाग से महिलाएं बालों को शैंपू की तरह धोती है, शहरों की बड़ी पंसारी की दुकानों पर भी शिकाकाई की मिश्रण सामग्री के साथ अब भीमल की छाल भी मिल रही है खेतों की मेंड़ों पर उगाये जाने वाले भीमल के पेड़, जाड़ों भर दुधारू जानव्रों के लिए हरे चारे का भरोसेमंद जरिया हैं, रेशा, और रेशा निकालने के बाद बची सूखी बारीक टहनियां  चूल्हे में आग जलाने के लिए, और जब सेल वाली टोर्चें नहीं होती थीं , तब बाहर जाने के लिए रोशनी करने के काम आती थीं।  कृषि और पशुपालन के ह्राश के साथ साथ इस इस रेशे की उपलब्धि कम होती जा रही है . दुग्ध उत्पादन बढाने के प्रयासों में अगर भीमल को बढ़ावा दिया जाता है तो यह रेशा उद्द्योग अच्छी आय देनेवाला कुटीर उद्द्योग बन साकता है . चित्र सौजन्य: गूगल

May
18

अपण धरोहर अपण कोशिश: देव वृक्ष पीपल

Peepal

पीपल का पेड़ किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इस वृक्ष का विस्तार, फैलाव तथा ऊंचाई व्यापक और विशाल होती है। यह सौ फुट से भी ऊंचा हो सकता है। हजारों पशु और मनुष्य इसकी छाया के नीचे विश्राम कर सकते हैं। पौराणिक काल से ही पीपल को पवित्र और पूज्य मानने की आस्था रही है। …

Continue reading »

Apr
19

अपण धरोहर अपण कोशिश: चीड़ का पेड़ (सवक बोठ)

cheed

चीड़ (Pine) एक सपुष्पक किन्तु नग्नबीजी पौधा है। यह पौधा सीधा पृथ्वी पर खड़ा रहता है। इसमें शाखाएँ तथा प्रशाखाएँ निकलकर शंक्वाकार शरीर की रचना करती हैं। इसकी ११५ प्रजातियाँ हैं। ये ३ से ८० मीटर तक लम्बे हो सकते हैं। चीड़ के वृक्ष पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में पाए जाते हैं। इनकी 90 जातियाँ उत्तर …

Continue reading »

Feb
14

रोजमेरी (रोजमेरीनस आंफिसिनेलिस’)

Rojmeri

उत्तराखंड के पर्वतीय भू-भाग की जलवायु सगन्ध पौंधों के उत्पादन लिए अनुकूल मानी जाती रही है, लेकिन बदले मौसमी हालात में कुछ ही सगन्ध पादप जमीन पर खरे उतर सके हैं । इनमें रोजमेरी का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है ।। भवाली स्थित राष्ट्रीय पादप आनुवंशिकी (एन0बी0पी0जी0आर0) के द्वारा किये गए प्रयोगों के …

Continue reading »

Older posts «

» Newer posts

Copy Protected by Chetans WP-Copyprotect.