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हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में पांडवों की उत्तराखंड विजय

Winning Uttarakhand in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में पांडवों की उत्तराखंड विजय

History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur Part –76

हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर इतिहास -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -76

इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

इंद्रप्रस्थ में अद्भुत सभा नरीमन के बाद पाडंवों ने युद्धिष्ठर के नेतृत्व में अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। भीमसेन को पूर्व में , अर्जुन को उत्तर , नकुल को दक्षिण व सहदेव को पश्चिम में भेजा गया। उत्तराखंड पुत्र घटोत्कच्छ को लंका विजय हेतु भेजा गया।
पांडवों के उत्तरी सीमा से लगे कुलिंद क्षेत्र की ठकुराइओं को जितने में अर्जुन को अधिक कठिनाई नही हुई।
कुलिन्दों के पडोसी राज्य कालकूट (कालसी ) व अनार्त (तराई (बिजनौर व हरिद्वार सहित ) की ठकुराइयों को जीतकर अर्जुन सुमंडल (जम्मू) नरेश को लेकर स्यालकोट की और निकला।
उत्तराखंड से भेंट
उत्तराखंड नरेश सुमुख ने इंद्रप्रस्थ में युधिष्ठिर को कई वस्तुएं कीं जैसे सोना जड़ा अद्भुत शंख, मेरु व मदिराचल प्रदेश क मध्य से देवरिंगाल वनो के शाशक , तंगण , दीर्घ वेणिक , प्रदर , पशुप , कुलिंद , परतंगण आदि जनजातियों के शासकों ने भी युधिष्ठिर को भेंट दीं।
इन क्षेत्रों की पहचान पर्वतीय उत्तराखंड , भाभर , तराई , बिजनौर हरिद्वार व कुछ भाग सहारनपुर से होती है।
इतिहासविद मदन भट्ट मेरु को पिथौरागढ़ में मानते हैं।
उत्तराखंडी पुरोहित के नेतृत्व में अन्य ब्राह्मणो नारद , देवल आदि के साथ युधिष्ठिर का यज्ञ सम्पन हुआ
** संदर्भ – —
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड इतिहास – भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन

Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India 11 /3/2015

History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur to be continued Part –77

हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास to be continued -भाग -77

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