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May
06

मैनेजरौ असली काम च निर्णय नि लिए जाव

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मैनेजरौ असली काम च निर्णय नि लिए जाव

जु मैनेजमेंट कॉलेजुं मा नि सिखाये जांद -8

चबोड़ इ चबोड़ मा मैनेजमेंट संस्मरण ::: भीष्म कुकरेती

मैनेजमेंट किताबुं मा अर भैराक सलाहकारुं सलाह मा एक बात पर जोर हूंद कि मैनेजरौ काम हूंद निर्णय लीण। किन्तु असलियत कुछ अलग इ च।

निर्णय लीण मा खतरा अधिक हूंदन। निर्णय से सकारात्मक फल तै क्वी नि दिखुद अपितु नकारात्मक पक्ष की छ्वीं अधिक लगदन तो मैनेजरूँ पास आलोचना , नकारात्मक फल से बचणो सबसे कामयाब विकल्प हूंद बल

निर्णय मा देरी , निर्णय तै टाळे जाव अर ह्वे साको तो निर्णय लिए इ नि जावो। सरकारी या भौत बड़ा संस्थानों मा इ ना छुट संस्थानों मा बि निर्णय टाळणो अमर संस्कृति हूंद।

हम व्यंग्यकार सरकारी अधिकार्युं , मंत्र्युं तै उलाहना दींदा कि काम किलै नी हूणु च। अर यदि भारत माँ समुचित काम नी हूणु च तो भारतीय प्रबंधन मा ‘निर्णय टाळणो’ संस्कृति ही जुमेवार च। अचकाल GST बिल पर लोकसभा मा छ्वीं लगणी छन अर सरकार लगीं च कि GST बिल पास ह्वे जाव। पिछला एक दसक से संसद मा GST बिल पर चर्चा हूणि च पर बिल पास नि करे जांद। वांक पैथर हमर अमूल्य धरोहर या अमूल्य विचारधारा च कि जखम आलोचनाओं का जोखम हो तो उखम निर्णय तै टाळो। महिला आरक्षण बिल का भी यही हाल छन कि सरकार मा क्वी बि पार्टी हो वा पार्टी निर्णय टाळण मा अपर असली समय लगांद।

आप मादे अधिसंख्य फ्लैटों मा रौंदा ह्वेल्या। अर आपकी बि कॉपरेटिव हाऊसिंग सोसाइटी ह्वेलि तो यदि आप सही माने मा वर्किंग कमेटी का कार्य का विश्लेषण करिल्या तो पैल्या कि कार्यकारणी वळु असली काम हूंद कै बि तरीका से निर्णय लीण से दूर रये जाव , निर्णय तै रुके जावो या निर्णय तै अनिर्णय की स्थिति मा डाळ दिए जाव। निर्णय से कार्यकारणी की भौत सी खामियां समिण आंदन किन्तु निर्णय टाळण या अनिर्णय की स्थिति से कमियां छुप जांदन या संघर्ष से बचे जयांद।

निर्णय रुकणो भौत सा तरीका अपनाये जांदन -

१-इतना अधिक विकल्प समिण लावो या दिखावो कि निर्णय ही नि लिए जावो। जथगा अधिक विकल्प उथगा ही अधिक समय निर्णय लीण मा लगद। छुट मुट बेकार का विकल्पों तै महत्वपूर्ण विकल्पों दगड़ बि समिण लावो तो क्वी बि माइक लाल निर्णय नि ले सकुद। विकल्पों की ढेर लगावो अर अनिर्णय की स्थिति मा आवो से निर्णय टाळे जांदन।

२-निर्णय का प्रति भय दिखावो – कै बि निर्णय तै टळण हो तो निर्णय का फलों मा अधिक से अधिक भय समाहित कर द्यावो तो भगवान बि अनिर्णीत ह्वे जालो। संसद मा हर समय विरोधी दल या सरकारी दल भय, खौफ, डर , खटका की बात करिक निर्णय तै अनिर्णय की स्थिति मा लै जांदन। जब बि क्वी सांसद प्रजातांत्रिक मूल्य या परम्परा की बात करिक कै बि निर्णय का विरोध मा बुलद तो समजी ल्यावो वु अनिर्णय की स्थिति लाण चाँद। एक अधिकारी जब बुलद कि ये अनुच्छेद से यदि निर्णय ल्योल्या तो संविधान की वीं अनुच्छेद पर धक्का लगद तो समझो कि अधिकारी अनिर्णय तै समर्थन दीणु च।

३- निर्णय से नुक्सान – यदि तुम तै निर्णय नि लीणाइ तो निर्णय तै नफा नुकसान का साथ जोड़ द्यावो तो अवश्य ही निर्णय मा देरी ह्वेलि।

४-सीमारेखा निश्चित नि कारो – भारत मा इथगा कमीशन /आयोग बैठदन किन्तु जनता अबि तक परेशान च काधिकांश कमीशन का फल समिण किलै नि आंदन। सबसे बड़ी बात च कि कमीशनों तै समय रेखा नि दिए जांद अर कमीशन बि अपण सुझावों तै अम्ल पर लाणो बान क्वी समय सीमा तय नि करदन तो निर्णय अनिर्णय का तरफ झुक जांदन। संसद मा एक कमेटी हूंद स्टैंडिंग कमेटी। अधिकतर स्टैंडिंग कमेटी तै निर्णय का वास्ता समय रेखा निश्चित नि हूंद तो स्टैंडिंग कमेटी अपण सुझाव समय पर नि भेजदि।

५- निर्णय लीण मा सबसे बड़ी दिक्क्त आंद समुचित ज्ञान का नि हूण। यदि निर्णय तै अनिर्णयित ही रखण तो सबसे बढ़िया तरीका च विषय का वास्ता अधिक सलाहकार तैनात कर द्यावो निर्णय अफिक टळ जालो। संसद जू भारत मा निर्णय लीणो सबसे बड़ी संस्था च उख ही सबसे अधिक देरी से निर्णय हूँदन किलैकि एक बात का वास्ता एक से अधिक कमेटी अर सलाहकार समिति छन।

निर्णय लीण मा देरी अर निर्णय ही नि लीण द्वी अलग अलग विचारधारा छन अर दुयुं तै कारगार सिद्ध करणो अलग अलग या कुछ एकी तरीका छन।

भोळ पढ़ो निर्णय नि लीणो कुछ अमर नियम —–

6/5/15 ,Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India
*लेख की घटनाएँ , स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने हेतु उपयोग किये गए हैं।
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