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May
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ज्यूंदाल

Garhwali Poem by Devesh

ज्यूंदाल

भाग-०३
प्र-०३। *दिनांक १०/०५/२०१७
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कन रैंदा छा हम कभि डांडयों म बुग्याल म,,
फुंगड़यों म धाण करदा दिन भर शियाँ गुठयार म,,
संजेत खिलाण म छपटो कि थांतु लगाणा,,
जेठ कौथिग म ज्वान माया कु उल्यार म,,

घसेरि डांडयों म टोखणि दैणा रेंदा छाई,,
ग्वेर छवारा मालू छतुल लेकि गोर चरांडा छाई,,
पर आज बिजोग पोड़ि ग्या औलाद तरफ बैठ,,
ऊन हमर धरकटों फर एक छिटगु आँशु नि भुगाई,,

झेड पुड़ी रैद छाई असंक आई रैंद घास बिठुग मुङ पर बिठुग नि छोड़,,
कीशा म एक लालपाई न पर अपुड़ा ब्वै बाबु नि छोड़,,
आज कुन्ना भुरयां छन पर पित्रों कु मिसरा नि निकुल्द,,
पर दान दिया धर्म लाटो कभि कैकु मुंड म नि पोड,,

कभि ख्वाल म थड्या चोंफलो मु मेल छा,,
लोग बाल सभि गरीब गुरबा पर प्यार कु ब्यापार छा,,
सुनपट त अब ह्वै अपुडों कु पछैणी हुई च,,
छैन सारि सगोड़ों कु साग भुज्जी कु निखणि हुई च,,

कभि ह्युन्द का दिनों म छ्ज्जा म घाम तपदा छाई,,
ऐक आँखिल सर्या कुटुंमदरी का दुनिया दयखदा छाई,,
खट्टू लिम्बुव् म कंकरया लूण रालिक खांदा छाई,,
अब लिम्बुव् त मिठा छन पर अपुडों का जिकुड़ी म खटास ह्वै ग्याई,,

कभि धाण म चूना जौ कु रूटी म प्याज थिंची खांदा छाई,,
जु कभि ओ होलु मैमान त तभि चोंलों कु भात खाई,,
प्याज कु आलण झुंगरा कु भात म दिन कटिंग,,
भुकि तिसि जनि रेंदा पर मेल मिलाप भलु छाई,,
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कुटम दरी का तितर बितर…

देवेश

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B.C.Kukreti

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