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Jun
12

घिंड्डा अर घिंडुड़ि (A Garhwali Folk Story)

घिंड्डा अर घिंडुड़ि (A Garhwali Folk Story)
Narration and Collected by Mahesha Nand
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(लोक कथा) यह कथा उन कायर बच्चों को सुनाई जाती थी, जो बाघ का नाम सुनते ही डर जाते थे। कथा सुनकर हंसते और उनका बाघ का डर रफुचक्कर हो जाता।
एक छौ घिंड्डा अर एक घिंडुड़ि। द्विया एक हैंकS दग्ड़ि छक्क पिरेम कर्दा छा। सगळ्या दिन खौळि-मखोळि कर्दा छा।
मंगसीरौ मैना छौ। बग्वळ्यू तिवार आंण वळु छौ।
घिंड्डन घिंडुड्यू बोलि— “बार-तिवार आंणु च, त्यरु क्य सदोप (व्यवस्था) कर्यु च ?”
“भित्र त् सौं खांणु बि नाजै चुंग्टि नी च।”
“गौं मा जौदि अर मांगि-द्येखि ल्हौदि।”
घिंडुड़ि गौं मा ग्या। एक जिमदन्यू बिसकूंण घमांण घल्यूं छौ। घिंडुड़िन वीं खुंण बोलि- “जिमदनि जी!तिवार आंणु च अर हमSरा ड्यार दाळ नी च। दाळ-दाळ तुमू कु, रिकचंणा-रिकचंणा मैकु।”
“दाळ त् मि त्वे द्यूलु पंण ल्हि जैलि क्यां फर ?”
“इतनु सुप्पु सि कंदूड़ त् म्यारु च।” घिडुड़िन् अपड़ु सुप्पु सि कंदूड़ पसारी बोलि। जिमदनिन् वीं थैं दाळ द्या। घिंडुड़ि दाळ अपड़ा ड्यार खंण्येकि आ।
तब ग्या वS हैंकि मौ कS ड्यार। एक कज्यांण कुलड़म् तेल अंट्यनि छै। घिंडुड़िन बोलि–”दीदी, तेल नी च। तेल-तेल त्वैकु अर खौळ-खौळ मैकु।”
“भुली तेल त् मि त्वै द्यूलु पंण ल्हि जैलि क्यां फर?” घिंडुड़िन् वन्नी बोलि—”इतुनु सुप्पु सि कंदूड़ त् म्यारु च।”
इन्नि कै वीन सौब धांण निड़ै द्येनि। बग्वळ्या दिन वीन बार-बन्या परकार (ब्यंजन) पकै द्येनि। घिंड्डा-घिंडुड़िन् तैंण तोड़ि (मुहा० इतना खा देना कि जो नाड़ा तक टूट जाय) खै द्या। बग्वळ्या दिन औंस छै। चुकSपटै रात पुड़ीं छै। बग्वळ्यू बाग अयूं छौ। वु देळिम् बैठी घुन्नु छौ।
वूंकु छ्वट्टू सि घोल छौ। द्वार-मोर ख्वळा छा।ढकेंण-डिसांण बि नि छौ। घिंडुड़िन् बोलि– “बाग अयूं च, चला तुमड़ा पेट लुकि जौलौ।”
घिंड्डा अर घिंडुड़ि तुमड़ा पेट लुकि ग्येनि। वूंकु कचर-पचर खयूं छौ। घड़ेकम् घिंडुड़ि थैं पदांण लगि। वीन बोलि– “मे थैं पदांण लगीं च।”
घिंड्डन् बोलि– ठुस्स पाद, बाग देळिमी च।” घिंडुड़िन ठुस्स पादि। तब घिंड्डा थैं बि लगि पदांण। वेनि बि बोलि– “घिंडुड़ी! मे थैं पदांण लगीं च।”
“ठुस्स पादि।” घिंडुड़िन सुरक बोलि।
घिंड्डन् भम्म पादि द्या। तुमुड़ा छटग-बटग लगि ग्येनि। इन चितSया जन ब्वलेंद बागन् घमंकणि मारि हो। बागन् बींगि कि इक्ख क्वी वे स्ये बि बड़ु बाग बैठ्यूं च। वु डौरि ग्या। वु सुरक वुखुम् बटि भाजि ग्या। घिंड्डा-घिंडुड़ि सुरक स्ये ग्येनि।

Thanking You .
Jaspur Ka Kukreti

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