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Aug
31

Ashok Uniyal ‘Agya’: A Garhwali Poet

Ashok Uniyal ‘Agya’: A Garhwali Poet
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(गढ़वाल, उत्तराखंड,हिमालय से गढ़वाली कविता क्रमगत इतिहास भाग – 200)
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part -200)
By: Bhishma Kukreti
Ashok Uniyal published a few Garhwali poems.
Ashok Uniyal was born in 1971, in Amaldu, Dabralsyun of Pauri Garhwal. His poems are of varied subjects, nature and tones.
खैरि (करुण रसयुक्त कविता )

रचना — अशोक उनियाल ‘अज्ञ ‘

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देखि सुख न जिंदगी को , दिन बिताणु रौं इनीs
खैरि खाई , खैरि पाई , खैरि खाणू रौं इनीs ।

बाळापन कि हैंसी ख़ुशी , गैल्याण्यूं का दगड़ मा
छौंपा दौड़ लुका छिपी , दग्ड्यूं खुज्याणु रौं इनीs ।
गवेरूँ कि बंसुळी डांडि रौली , झूमि गेन गीतूं मा
यखुलि कटदु भेळू घास , मन खुद्याणु रौं इनीs ।

जंगळूम कांडा ढुंगा गारू , ढाल पड़िगे नांगा खुट
लचकदि हिटै ख़ड़ी उकाळि , उकससि भरणू रौं इनीs
ऐ मौळयार डाळि बूटि , पौन पंछी रंगमतै
चैतैs बयार घूर घुघती , ज्यू झुराणु रौं इनीs ।

डांडि फ़ूलिं हैँसि बुरांश , पाख्युं फ्यूंळि खीलिगे
प्वतळि भौंरा रंगतदन , मन बिळमाणु रौं इनीs
मीलि क्या दुन्याम ऐ कि , खैरी ख्यालूं मा डुब्यूं
मौळयार का टुक सर्कीन कुटमणा खुज्याणु रौं इनीs

बारा ऐनि ऋतू बौड़ी , जागि गे टक आस मा
माया जाळम अळजी , खैरि गेड़ खुलणु रौं इनीs
तन मनै की आस जागि , तब भाग मेरु रूठ गे
हाय विधाता त्यरा रिखड़ा , अंसधर्यू पुंजदु रौं इनीs ।

Copyright@ Bhishma Kukreti, 2017
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