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Jan
12

ढुंगुळ संस्कृति याने साजो चुल्ल

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ढुंगुळ संस्कृति याने साजो चुल्ल
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सौज सौज मा संस्कृति विरतान्त ::: भीष्म कुकरेती

मीन उत्तराखंडौ इतिहासौ बारम भौत सी किताब बाँचिन , जॉर्नल पौढ़िन त पायी बल भोज्य पदार्थुं पर साहित्य च पण कन बणद छौ , केपर बणद छौ पर मि तैं कुछ नि मील। इतियासकारुं बिंडी गळति नी। जब ज्योति राय बहुगुणा या मौलारमन भोजन बणाणो पद्धति पर कुछ नि लेखि , अंग्रेजुंन कुछ नि बताई त आजौ इतियासकार कखन ल्याखल। श्रीनगर म प्राकृतिक अर राजनैतिक आपदा से कुछ बि रिकॉर्ड नि बचिन।
ठीक च इतियासुं पोथ्युं म कुछ नि मिलणु च पर हमर समाजन कुछ त लौस रखीं इ च। ढुंगुळ बणानो संस्कृति अर बसिंगु उस्याणो संस्कृति हम तै सन 1815 से पैल लिजाणम सक्षम उदारण छन। जी हाँ साजो ढुंगुळ बणानो संस्कृति अर बसिंगु उस्याणो संस्कृति निर्देशित करदि बल हमर भोजन पद्धति अंधा युग मा क्या छे।
गरीबी या कमजोरी सहकारिता या साजी संस्कृति निर्मित करदी अर गरीबी या कमजोरी ही साजी संस्कृति अक्षुण रखदी। जब मनिख कमजोर हूंद त वु दुन्या भर पर निर्भर रौण चांदो अर जनि वैमा पैसा आयी ना वु व्यक्तिगत याट का मालिक बण जांद। मुकेश अम्बानी मुंबई सरीखा जगा म अकेला रौणौ कुण बहुमंजिली बिल्डिंग बणांद। मि राष्ट्र चोर मल्लया की बि बात करणु छौं। अंग्रेजुं आणौ बाद ही गढ़वाळ मा समृद्धि ऐ अर हम साजा संस्कृति से व्यक्तिवादी संस्कृति तरफ ढळकां।
जब 1815 से पैल एक गौं मा अधिक से अधिक 8 या 10 मवस रौंद था अर धातु खरीदण त दूर दिखण बि कठण छौ , जब ल्वार -टमटौं से काम लीण अति कट्ठण छौ तो लखड़ कटणौ दाथी – कुलाड़ी अलभ्य हूंद था , लखड़ जमा करण बि सरल बात नि छै। तवा हरेक घौरम मिलण वास्तव मा सुपिन हूंद छौ त साजो ढुंगुळ संस्कृति ही रै होली। सबि मौ संध्या काल से पैलि कट्ठा ह्वेका निश्चित जगा मा गुपळ या छुट लखड़ जळांद रै होला , अर अपण -अपण क्वादु , जौ , ओगळौ उल्युं आटो लखड़ौ या पत्थरौ पयळम लेक आंद रै होला या उखमि लाबुं मा आटु उल्दा रै होला। फिर हरेक अपण अपण चपड़ पत्थर मा मोटि ढिंढी धरदा रै होला अर ढुंगुळ पकांदा होला। भुज्जी बि उखमि बणदि होली। अगर आप सन साठ से पैल गाँवों तैं याद करिल्या त दिखिल्या बल गढ़वाली गाँवों मा स्याम दैं सूखी भुज्जी को ही रिवाज थौ। या पुरातन संस्कृति की एक लौस च। याने 1815 से पैल रात की भुज्जी भड़यीं भुज्जी को ही प्रचलन रै होलु। भुज्जी भी तकरीबन जंगळ की ही भुज्जी रै होली। मैणु मसला जंगळ से प्राप्त हूंद थौ। हफ्ता मा द्वी दिन तो शिकार खाये ही जांदी होली।
ल्वार शिल्पकार बि अवश्य ही दगड़म भोजन करदा रै होला। या अलग यु एक प्रश्न च जांक जबाब खुज्याण पोड़ल । म्यार अंक्यांण बुल्दु बल चूँकि आठ मौ मध्य एक शिल्पकार हो त शिल्पकार तैं अलग नि समजे सक्यांद रै होलु।

इकम दिमाग लगाणो जरूरत नी बल तब बि जनानी ढुंगळ पकाणम व्यस्त रौंदा होला अर मर्द गप्पबाजी म व्यस्त रौंदा होला। एकाद डौंरु बि घुर्कांद होलु। ह्वे सकद च तब बि अशोक महानौ काल समळदा होला कि तब हम समृद्ध छा अर गढ़वाल से रोम माल निर्यात हूंद छौ। मनिख भूतकाल कु रूण नि छुटदु त मि तैं पूरो भरवस च बल हमर बूड -खूड बि पुरातन समृद्धि की याद करदा रै होला अर भविष्य की छ्वीं कबि नि करदा होला। असल मा भविष्य डरावना जि हूंद।

12/1 / 2018, Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India ,
—– आप छन सम्पन गढ़वाली —-
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