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Apr
29

उत्तराखंड में तापोपचार

उत्तराखंड में शुष्क तापोपचार (हीट थिरैपी )
Heat or Thermo -therapy in Uttarakhand
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास ) -88

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Medical Tourism Development in Uttarakhand (Tourism History ) -88

(Tourism and Hospitality Marketing Management in Garhwal, Kumaon and Haridwar series–191)
उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग -191

लेखक : भीष्म कुकरेती (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

मनुष्य अवतरण के साथ ही मनुष्य तापोपचार करता आया है। तापोपचार अर्थात तापमान घटाने -बढ़ाने से उपचार। तापोपचार में तापमान को बढ़ाया भी जाता है और कम भी किया जाता है। बर्फ से उपचार भी तापोपचार ही है। सूर्य के ताप से भी उपचार होता ही था।
तापोपचार में सूर्य या अग्नि या अब बिजली की आवश्यकता होती है। इस अध्याय में अग्नि माध्यम से शुष्क तापोपचार पर विचार किया जाएगा कि भूतकाल में उत्तराखंड में किस तरह तापोपचार से दुःख हरण किया जाता जाता था।
मकान निर्माण
पहाड़ों के मिटटी पत्थर मकान वास्तव में इंसुलेटर का काम करते हैं जो शीत ऋतु में ठंड को अंदर नहीं जाने देते व गर्मी में ताप नहीं बढ़ने देते।
ऋतु अनुसार कपड़े भी तापमान स्थिर रखने का कार्य करते हैं।
पुराने जमाने में पराळ में सोना वास्तव में तापमान स्थिरीकरण माध्यम था बाद में कंबल रजाई का प्रचलन बढ़ गया तो गद्दे , रजाई उपयोग में आने लगे।
त्वरित तापोपचार या आग तापना
उत्तराखंड में शीत ऋतू या उच्च शृखंलाओं में ग्रीष्म में भी जब मनुष्य बाहर से शीत से परेशान होता था तो घर आकर आग तापता था। आग तापने की संस्कृति अग्नि प्रयोग से ही शुरू हो गयी थी। सुबह सुबह कभी कभी पाले से जमी बर्फ पर चलने से पैर सुन्न हो जाते थे तो त्वरित आराम हेतु आग तापन ही सही समाधान होता है।
कमरे में अंगेठी
शीत ऋतु में पहाड़ों में शीत से बचने हेतु अंगेठी जलायी जाती थीं और अग्नि तापमान बढ़ाती थी। बहुत से गाँवों में गौशालाओं में भी तापमान वृद्धि हेतु अंगेठी ज्वलन प्रयोग करते थे।
छोटी बाछी -चिनखों को गौशाला में न रखकर घर में रखना वास्तव में उन्हें हानिकारक कम तापमान से बचने का तरीका है।
शीत ऋतू या बरफवारी समय जब अतिथि आता /आते था/थे तो अतिथि सत्कार पान पराग से नहीं अपितु अंगेठी की आग से होता था। पंडो नृत्य में आलाव जलाकर नृत्य करने के पीछे शीत निरोध तकनीक ही थ।

बच्चों की ताप सिकाई

पहाड़ों में बच्चो की ताप सिकाई कार्य प्रतिदिन होता ही था। शीत ऋतु में तो सोने से पहले भी ताप सिकाई की जाती थी।
बच्चों का डैणे जाने पर आग दिखाई
कभी कभी ठंड से अन्य कारणों से बच्चे का शरीर अकड़ जाता था या नीला पड़ने लगता था तो बच्चे को तपाया जाता था। यदि बच्चा अति शीत समस्या से ग्रसित होता था तो आंच मिलने से ठीक हो जाता था।

पेट दर्द में ताप सिकाई
ठंड या अन्य कारणों से पेट फूल जाय या पेट दर्द शुरू हो जाय तो सबसे पहले पेट की ताप सिकाई प्रथम उपचार होता था। बच्चों के पेट दर्द या अखळ लगने व पेचिस लगने में आग-ताप सिकाई अनिवार्य उपचार माना जाता था।
अपच या कब्ज में भी आग सिकाई उपचार किया जाता था। यदि अपच ठंड से हो तो पाचन शक्ति में वृद्धि से अपच दूर हो जाता था या गैस निकलने से भी शांति मिलती होगी।
पेट फूलने पर (उगाण ) में तो ताप सेकं अनिवार्य ही माना था। मरोड़ उठने पर भी ताप सिकाई ही प्राथमिक उपचार होता था।

शरीर अंग सुन्न में ताप सिकाई

शरीरांग के सुन्न पड़ने पर प्राथमिक उपचार ताप सिकाई था। ताप सिकाई सीधे अग्नि निकट अंग ले जाने या कपड़े को या अन्य गरम माध्यम को शरीरांग पर लगाने से होती थी।
निचले कमर दर्द

कमर दर्द में ताप सिकाई
संसार में मनुष्य अपने जीवन में कभी न कभी निचले कमर दर्द की समस्या से जूझता ही है। ऐसे में ताप सिकाई आज भी कामयाब समाधान माना जाता है। जाड़ों में बहुतों को कमर दर्द की शिकायत बढ़ जाती है तो ताप शिकाई उत्तम समाधान माना जाता है।

हड्डी दर्द में ताप सिकाई

हड्डी दर्द , हड्डी खिसकने या जोड़ों के दर्द में ताप सिकाई कामयाब उपचार माना जाता था और डाक्टर भी राय देते हैं।

मोच /लछम्वड़ में ताप सिकाई
मोच आने पर भी ताप सिकाई प्रथमोपचार था। मांश पेशियों में जकड़न पर भी ताप सिकाई उपचार सामान्य था।

फोड़े पकाने में ताप सिकाई
बहुत से एमी फोड़े पकने के लिए गरम ल्वाड़ से सिकाई की जाती थी या पकाया इल्वड़ रखा जाता था।

डाम / ताळ लगाना
डाम धरना या ताळ लगाना कुछ नहीं विशेष तापोपचार ही है। डाम धरने में कबासुल को शरीर के ऊपर जलाया जाता है तो ताळ लगाने में नोकदार लोहे की टेढ़ी छड़ी को लाल ग्राम कर शरीर के ऊपर धीरे धीरे ठोका जाता है।
ताप सिकाई माध्यम
ताप सिकाई में सीधा अग्नि सम्पर्क , हाथ , कपड़ा , गोल पत्थर व लोहे की बारीक छड़ी आदि माध्यम होते थे। कभी कभी गरम कीचड़ , गरम फल भी ताप सिकाई माध्यम रूप में उपयोग किये जाते थे।

उपरोक्त उपचार आज भी विद्यमान हैं और अब बिजली उपकरणों से तापोपचार किया जाता है।
पर्यटकों को तापोपचार

प्राचीन उत्तराखंड में चट्टियों में आग सुलभ थी ही और उपरोक्त उपचार सरलतम उपचार हैं तो अवश्य ही पर्यटक उपरोक्त शुष्क तापोपचार से अपना दुःख हरण करते थे ।

Copyright @ Bhishma Kukreti 29 /4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006 -2007 , उत्तरांचल में पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150 अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 – भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 – शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास part -6
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