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May
17

उत्तराखंड में उपवास चिकित्सा

उत्तराखंड में पारम्परिक उपवास /व्रत चिकित्सा

Fasting Therapy in Uttarakhand (History aspects)

( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास ) -90

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Medical Tourism Development in Uttarakhand (Tourism History ) – 90

(Tourism and Hospitality Marketing Management in Garhwal, Kumaon and Haridwar series–193)
उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग -193

लेखक : भीष्म कुकरेती (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञCopyright @ Bhishma Kukreti 17 /4 //2018
व्रत का अर्थ है कसम या सौं। किसी वस्तु के उपभोग त्याग को व्रत/उपवास कहते हैं। उपवास चिकित्सा वास्तव में उत्तराखंड या भारत में सैकड़ों साल से प्रचलित है। उपवास की सलाह आयुर्वेद व अस्टांग में भी मिलता है उपवास कई प्रकार का होता है। मुख्य उपवास /व्रत भोजन व वाणी व्रत व संसर्ग व्रत होते हैं। उपवास रखने का प्रचलन लगभग सभी धर्मों में प्रचलित है। यहां नास्तिक भी उपवास चिकित्सा का अनुमोदन करते हैं।
लंगड़ी लेना
पेट चलने /पेचिस/कब्ज , भूख न लगने आदि स्थिति में वैद लंगड़ी लेने या उपवास रखने की सलाह देते थे।

विशेष भोजन का उपवास

कई बार चिकित्सक या ज्योतिषी जजमान या बीमार को किसी विशेष भोजन त्याग की सलाह देते हैं जैसे अणभुटा या तेल विहीन, नमक रहित , मिर्च रहित, दूध रहित आदि भोजन त्यागने की सलाह देते हैं और मरीज अल्प समय या लम्बे समय तक विशेष भोजन अवयव नहीं खाता है। कई रोगों में दही उपभोग वर्जित है।
निर्जला व्रत
अधिकतर उपवास में लोग ठोस भोजन की तिलांजलि देकर जल , चाय , दूध , द्रव युक्र भोजन , चीनी गुड़ व कंद मूल , व्रत भोज्य पदार्थ भक्षण कर लेते हैं किन्तु बहुत से अवसरों पर चिकित्सक व ज्योतिषी निर्जला व बिलकुल पूर्ण व्रत /उपवास की भी सलाह देते हैं। बहुत से लोग विश्वास तहत अथवा किसी भोज्य पदार्थ या धूम्रपान को किसी धार्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत उपभोग छोड़ देते हैं जैसे बद्रीनाथ यात्रा के बाद किसी भोज्य या पेय /धूम्रपान उपभोग छोड़ देते हैं या माता मृत्यु में दूध सवन छोड़ना , पितृ शोक में नमक सेवन छोड़ना आदि। किसी विशेष वस्तु प्राप्ति हेतु भी कई लोग कोई भोज्य पदार्थ उपभोग बंद कर देते हैं।
शर्करा बीमार/ रक्त चाप/ स्वास रोग रोगी को कई भोज्य पदार्थ छोड़ने की सलाह चिकित्स्क देते हैं

पत्नी संसर्ग उपवास
कई बार पत्नी संसर्ग से दूर रहने का भी प्रचलन था और आज भी है। महाभारत में पाण्डु को पत्नी संसर्ग की सलाह दी गयी थी।
मौन व्रत
कई बार धार्मिक या शरीर चिकित्स्क मौन व्रत की भी सलाह देते हैं। मैं बचपन से ही बहुत बोलता था। मेरे ताऊ जी मुझे मौन रहने को वाध्य करते थे। योग में तो मौन व्रत ही नहीं अंगों द्वारा संवाद न करने की सलाह है।

अल्प उपवास
अल्प उपवास एक दिन या दो दिन का रखा जाता है। ऐसे उपवास कुछ अंतराल में रखे जाते हैं जैसे पूर्णमासी व्रत या सप्ताह में एक बार। बेटी की शादी में माता पिता द्वारा उपवास रखना इसी वर्ग में आता है।

दीर्घ उपवास
जैन , मुस्लिम धर्मी लम्बे उपवास रखते हैं। बहुत बार कई उत्तराखंडी अपने विशेष कार्य सिद्धि हेतु लम्बे उपवास भी रखते हैं
विशेष कार्य त्याग

विशेष स्थिति में रोगी को कोई विशेष कार्य त्याग की भी सलाह दी जाती है। कमर दर्द में बोझ न उठाना इसी वर्ग का उपवास है।
किसी दअन्य के घर भोजन न करना
बहुत बार धार्मिक अनुष्ठान या विश्वास तहत बहुत से लोग अन्य घरों में भोजन नहीं करते हैं या स्वयं भोजन पकाकर ही भोजन उपभोग करते हैं।
मृत्यु हेतु उपवास
बहुत से वृद्ध मृत्यु हेतु लम्बा उपवास रखते थे। यह पद्धति जैन धर्मियों से ली गयी पद्धति है।

पर्यटकों हेतु उपवास चिकित्सा
समय , स्थान व व्यक्ति अनुसार पर्यटकों हेतु उपवास चिकित्सा उपलब्ध थी।

Copyright @ Bhishma Kukreti 17 /4 //2018
संदर्भ :
1 -भीष्म कुकरेती, 2006 -2007 , उत्तरांचल में पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150 अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 – भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी

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