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May
18

उत्तराखंड में धुम्रपान चिकित्सा

उत्तराखंड में धूम्रपान चिकित्सा व धूम्र दत्त रक्षा उपाय
Smoking Therapy in Uttarakhand

( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास ) -91

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Medical Tourism Development in Uttarakhand (Tourism History ) – 91

(Tourism and Hospitality Marketing Management in Garhwal, Kumaon and Haridwar series–194)
उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग -194

लेखक : भीष्म कुकरेती (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

उत्तराखंड समेत भारत में धूम्रपान का इतिहास 2000 वर्ष से भी प्राचीन है। धूम्रपान औषधि व व्यसन रूप में उत्तराखंड में अशोक काल से भी पहले प्रचलित था। बाढ़ साहित्य में उल्लेख है कि हरिद्वार व कोटद्वार भाभर में आये बौद्ध भिक्षु धूम्रपान हेतु पहाड़ी गाँवों में लालायित रहते थ.
अष्टांग हृदयम में बागवभट्ट ने धूमप्रापण चिकित्सा का उल्लेख किया है।
धूम्रपान के निम्न प्रकार हैं -
१- औषधि रूप धूम्रपान
२-व्यसन रूप में धूम्रपान
३- धार्मिक अनुष्ठानों धूम्रपान
४- शरीर रक्षा हेतु निर्माण
५- कीटाणु भगाने व रक्षा हेतु जीव हत्त्या हेतु धूम्र निर्माण
औषधि रूप में धूम्रपान
उत्तराखंड में सत्रहवीं अठारवीं सदी में तम्बाकू ने प्रवेश किया और अंग्रेजी शासन में तम्बाकू व अन्य व्यसनी धूम्रपान का उपयोग बढ़ा।
तम्बाकू धूम्रपान से पहले उत्तराखंड में व्यसन रूप में धूम्रपान का चलन ब्रिटिश शासन सर्वाधिक हुआ और स्वतंत्रता के पश्चात तो बहुत ही अधिक प्रचलन बढ़ा।

औषधि रूप में कई तरह के पौधों का उपयोग धूम्रपान हेतु होता रहता था व कई क्षेत्रों में आज भी है।
औषधि धूम्रपान मनोरोग , भ्रान्तिमान स्थिति , अति भौतिक दर्द , उत्तेजना विसर्जन व प्राप्ति , तनाव आदि में प्रयोग होता था जैसे भांग , अफीम , धतूरा व कई अन्य वनस्पतियां। वैद्य कई स्थानीय वनस्पतियों को जानते थे व वनस्पति के अंगों को पीसकर दुखियारे को धूम्रपान करवाते थे . चूँकि परम्परा थी कि गूढ़ विद्या सामन्य जन को नहीं बतलानी चाहिए तो हमारे पास उन बहुत सी वनस्पतियों का ज्ञान ही नहीं रह गया है जिन्हे वैद्य धूम्रपान चिकित्सा में प्रयोग करते थे। प्र्स्सन्न्ता है कि वनस्पति शास्त्री अब अन्वेषण में लगे हैं
भट्ट जैसे बीजों को जलाकर , भूनकर उसके धूम्र से कफ , सर्दी जुकाम आदि उपचार होता था।
बागभट्ट अष्टांग हृदयम के 21 वे अध्याय में धूम्रपान के निम्न रोगों में लाभ उल्लेख है -
अ -कफ
ब – डिस्पोनइया सुनवैकल्य या बोलने में कठिनाई
स – सूंघने, सुनने में कठिनाई
सी -, अश्रु दोष व् – हिचकी
ध -खुजली या एलर्जी
न – पेट , सरदर्द , अधकपाली , शूल पीड़ा , ठंड से दर्द , निद्रा , अनिद्रा , ऊर्जाहीनता , पीड़ा आदि आदि

धूम्रपान यंत्र
मिटटी या धातु की बनी चिलम

धूम्रपान बत्ती
अष्टांग हृदयम में धूम्रपान बत्ती निर्माण की कला वर्णन मिलता है। यही विधियां उत्तराखंड में धूम्रपान औषधि में उपयोग होती आती हैं (श्री स्व किसन दत्त कंडवाल वैद्यराज , ग्राम ठंठोली, मल्ला ढांगू , पौड़ी गढ़वाल के भतीजे से प्राप्त जानकारी अनुसार अष्टांग आधारित वैदकी ठंठोली में प्रचलित थी )

अंगार
धूम्रपान हेतु किन किन अंगारों का उपयोग होना चाहिए का वर्णन अष्टांग में है।

अस्टांग में तीन प्रकार -मृदु , मध्य , तीक्ष्ण आदि के प्रकार , कब धूम्रपान वर्जित है , धूम्रपान विधि आदि का सम्पूर्ण उल्लेख है।
उपरोक्त सभी धूम्रपान औषधि उपयोग उत्तराखंड में चिकत्सा रूप में उपयोग होते थे व वर्तमान में भी होते हैं।

मृदु धूम्रपान हेतु वनस्पति व जंतु औषधि
अगरुरु , गुगलु , मुस्ता , स्थानेय , नालदा , शैलेय , उशिरा , वाल्का , वरंगा , काउंटी , ध्यामका , कुमकुम ,माशा , विल्वमज्जा , कुंदूका , पल्लव , इलावलुका आदि।
इसके अतिरिक्त तिल का तेल व की जीवों के चर्बी या हड्डी मज्जा से बने तेल व घी भी धूम्रपान औषधि निर्माण द्रवणी (मिश्रति करण ) हेतु उपयोग होते थे।

मध्य धूम्रपान वनस्पति औषधि
जटामासी , नीली कमल ककड़ी भाग, शालकी , पृथ्वीका , उदंबरा ,अश्वथा , प्लाक्ष , यस्थिमधु, न्याग्रोधा , पद्मका आदि ।

तीक्ष्ण धूम्रपान वनस्पति औषधि
ज्योतिष्मती , हल्दी , दशमूल , लक्ष , श्वेता , त्रिफला आदि
(श्री स्व किसन दत्त कंडवाल वैद्यराज , ग्राम ठंठोली, मल्ला ढांगू , पौड़ी गढ़वाल के भतीजे से प्राप्त जानकारी )

२- धार्मिक अनुष्ठानों में धूम्रपान
धार्मिक अनुष्ठानों जैसे होम , यज्ञ , आहुति , व घडेळा आदि में धुपण देना आदि धार्मिक धूम्रपान के उदाहरण हैं।

३- शरीर व कृषि रक्षा हेतु धूम्र उपयोग
कीटों व अन्य सूक्ष्म सूक्ष्म जीवों व मच्छरों को भगाने हेतु उपले व गंधेला / कड़ी पत्ता आदि जलाया जाता है। टिड्डी आदि कीड़ों को भगाने हेतु भी धूम्र निर्माण किया जाता था। मधु मक्खी/चिमल्ठ भगाने हेतु भी धूम्र निर्माण किया जाता है।

४- जीव हत्त्या हेतु धूम्र निर्माण

बाघ , शाही , सियार , रीछ आदि मारने हेतु इन जानवरों के बिलों /घरों में धूम्र निर्माण कर इन्हे बिल /घरों से बाहर लाया जाता था व मारा जाता था। बहुत बार बंदरों , बाघों के आतंक कम करने हेतु बणांक लगाने की पुरानी परम्परा भी थी।
नशे हेतु धूम्रपान

भांग , धतूरा , तम्बाकू का उपयोग बहुप्रचलित है।

वैसे धूम्र ने मनुष्य को नुक्सान अधिक पंहुचाया है लाभ कम दिया है जैसे रसोई में धुंवें ने कितनी जाने लीं हैं पता नहीं और अब दिल्ली जैसे श्हरों में धुंवे व प्रदूषित वायु हानि . पंहुचती है

Copyright @ Bhishma Kukreti /184 //2018
संदर्भ

1 -भीष्म कुकरेती, 2006 -2007 , उत्तरांचल में पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150 अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 – भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 – शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास part -6
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