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May
26

श्री गोदेश्वर सिद्ध पीठ मंदिर को राष्ट्रीय स्तर का पर्यटक क्षेत्र बनाने की परिकल्पना

श्री गोदेश्वर सिद्ध पीठ मंदिर को राष्ट्रीय स्तर का पर्यटक क्षेत्र बनाने की परिकल्पना

Making Godeshwar a national Tourist Place

(Tourism and Hospitality Marketing Management in Garhwal, Kumaon and Haridwar series–203
उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 203

लेखक : भीष्म कुकरेती (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

( यह लेख मेरे कुल पुरोहित ठंठोली के सभी कण्डवालों को समर्पित )

अभी अभी कुछ दिन पहले मैं गाँव गया था तो जिसे देखो वही हमारे क्षेत्र में विकास का रोना रोते ही मिला। सही भी है जहां अब गाँव खाली हो गए हों , बंदरों व सुंगरों से निजात पाना संभव न हो वहां विकास के लिए ह्यळी ही गाडी जायेगी। मुझे विकास ह्यळी अच्छी लगती है क्योंकि चेतना का नाम ह्यळी है। पर जब पूछा जाता है कि विकास क्या होना चाहिए तो सभी सामने के गाँवों की ओर देखने लगते हैं। शयद विकास कोई सरकारी सब्सिडी होगी जो सामने के गाँव को मिलती है और मेरे गाँव को नहीं। एक तरफ हमारे क्षेत्र के लोग माळा -बिजनी शिवपुरी के विकास का गाना गाते हैं दूसरी ओर अपसंस्कृति का भी अलाप जोर जोर से करते नजर आते हैं। मुंबई में भी मुंबई वालों को विकास के बारे में नहीं पता कि अब मुंबई हेतु विकास मार्ग क्या है। विकास चक्षुहीनो हेतु हाथी वर्णन हो गया है।
मेरे अनुसार विकास अगले दस वर्षों हेतु उत्पादनशीलता वृद्धि हेतु काय होते हैं। यदि बिजली सड़क पानी से उत्पादनशीलता में वृद्धि न हो तो उसे विकास कतई नहीं कहा जाना चाहिए। यह तो बस सुविधा आबंटन मात्र है।

मूल मुद्दा मल्ला ढांगू विकास

मल्ला ढांगू ऋषिकेश कोटद्वार मोटर मार्ग पर गैंडखाळ से परसुली वाला क्षेत्र है और ब्रिटिश काल में भी उपेक्षित क्षेत्र था तो उत्तर प्रदेश सरकार काल में भी उपेक्षा शिकार था तो उत्तराकंड सरकार भी पीछे नहीं। सभी जन मल्ला ढांगू का विकास चाहते हैं किन्तु क्या विकास हो के मामले में सर्वथा अनभिज्ञ हैं।
मुंबई आने के बाद से व्यापार से जुड़ने के बाद अनुभव से पता चला कि पर्यटन ही एक ऐसा उद्यम लगता है जो उत्तराखंड का काया पलट कर सकता है। शिवपुरी के निकट तल्ला ढांगू का विकास (अप संस्कृति नाम पड़ गया है ) इसका जीता जागता उदाहरण है। मल्ला ढांगू में भी यदि विकास चाहिए तो पर्यटन ही एक ऐसा उद्यम है जो मल्ला ढांगू का काया पलट कर सकता है। एक उदहारण अभी हमारे गाँव जसपुर में मई में सामूहिक नागराजा पूजन था जिसमे जसपुर वालों ने कुल मिलाकर कम से कम पांच से सात लाख व्यय किया होगा याने धार्मिक पर्यटन में पांच से सात लाख का टर्न ओवर। तीन लाख के लगभग तो मल्ला ढांगू में व्यय हुआ ही होगा, डेढ़ लाख तो पूजा में ही व्यय हुआ। इसी तरह पुजारियों , जगरियों, ढोल वादकों की दक्षिणायें , सर्यूळों , टैक्सी चालकों की भी अच्छी खासी कमाई हुयी, जसपुर , सिलोगी , जाखणी धार व गूमखाळ के दुकानदारों की आय अलग से हुयी।

शुरुवात कहाँ से करें ?

प्रश्न उठता है कि मल्ला ढांगू में पर्यटन उद्यम विकास की शुरुवात कहाँ से की जाय ? पर्यटन कोई फैक्ट्री तो है नहीं कि फैक्ट्री लगाई और माल बनना शुरू। पर्यटन हेतु एक स्थल आवश्यक है। मेरी दृष्टि में मल्ला ढांगू में गोदेश्वर सिद्ध पीठ मंदिर ही एक ऐसा स्थल है जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पर्यटक क्षेत्र के रूप में विकसित कर इस क्षेत्र में पैसे की बरसात करवाई जा सकती है छन छन।

श्री गोदेश्वर सिद्ध पीठ शिव मंदिर भूगोल
स्व भैरव दत्त कण्डवाल भेषज जी व स्व सत्य प्रसाद बहगुणा गुरु जी अनुसार गोदेश्वर मंदिर एक प्राचीन सिद्ध पीठ है। श्री अतुल कंडवाल अनुसार सिद्ध पीठ मंदिर सत्रहवीं सदी से भी कहीं पुराना मंदिर है। भीष्म कुकरेती अनुसार गोदेश्वर मंदिर कभी धार में नहीं अपितु एक गदन के किनारे था, यहां तब क्षेत्र वालों का श्मशान था। और गोरखा काल से पहले या बहुत पहले जसपुर व गोदेश्वर मध्य भयंकर भूस्खलन आया और गोदेश्वर मंदिर क्षेत्र धार में परिवर्तित हो गया।
गोदेश्वर शिव मंदिर कंडार वृक्षों के मध्य ठंठोली ग्राम के बेलदार -थळधार क्षेत्र में ऋषिकेश -कोटद्वार मोटर मार्ग में जाखणी बस स्थल से दक्षिण में दो किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। बेलदार व थळधार दोनों शिव भूमि की ओर इंगित करते हैं थलधार मतलब (देव) +स्थल+ धार । गोदेश्वर के निकट कठूड़ गाँव के देवी व शिव मंदिर हैं व निकटवर्ती स्थानों के नाम भी खस देवों के नाम हैं जैसे जाखणी (यक्षणी ), गणिका , नगेळा , पुर्यत , भटिंड ,माड़ीधार , गुडगुड्यार , इकर आदि व नाथ। कठूड़ से लेकर सभी उपरोक्त नाम खस संस्कृति (2000 वर्ष पहले ) के द्योतक हैं और कहीं न कहीं देव स्थल नाम हैं जो इस क्षेत्र को देव क्षेत्र बतलाते हैं। महाभारत में धौम्य ऋषि प्रकरण में वर्णन है कि कनखल से दो पर्वत श्रेणियां हिमालय की ओर निकलती हैं एक भृगु श्रृंग श्रेणी उदयपुर पट्टी , नीलकंदठ श्रेणी व दूसरा पुरु श्रृंग श्रेणी। यदि हम विश्लेषण करें तो पाएंगे कि पुरु श्रृंग श्रेणी ही जसपुर का पुर्यत पर्वत श्रेणी है (कोटद्वार ऋषिकेश मोटर मार्ग पर ) । सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं बल धार्मिक मामले में गोदेश्वर सिद्ध पीठ प्राचीनतम धार्मिक क्षेत्र है । दक्षिण गढ़वाल में होने से व रोहिल्ला आक्रमणों छापा मारी से इस प्राचीन क्षेत्र को वह प्रसिद्धि न मिल सकी जिसका यह क्षेत्र अधिकारी था।
गोदेश्वर में शिव लिंग के ऊपर छत नहीं है खुले में है व शिव मंदिर की मान्यता है कि यहां निस्संतान दम्पतियों को संतान प्राप्ति होती है। अतुल कंडवाल ने कई वृत्तांत गोदेश्वर द्वारा संतान प्राप्ति के दिए हैं और पौराणिक उद्धहरणों से सिद्ध किया है बल गोदेश्वर नाम के पीछे भी सूनी गोद भरने से अर्थ है।

कैसे गोदेश्वर को राष्ट्रीय पर्यटक क्षेत्र बनाया जाय ?

मेरा मानना है कि गोदेश्वर जैसे क्षेत्र जो ऋषिकेश से दो ढाई घंटे की यात्रा के अंतराल पर हो उसे सरकार नहीं अपितु समाज ही विकसित कर सकता है। पर्यटन विकास में सरकार नीति निर्धारित करती है बाकी कार्य समाज करता है। मल्ला ढांगू समाज ही गोदेश्वर सिद्ध पीठ को राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कर सकता है।

मेरा गाँव मेरी सड़क तहत मोटर मार्ग
जाखणी से गोदेश्वर मंदिर तक मोटर मार्ग आज एक आवश्यकता है और मेरा गाँव मेरी सड़क योजना तहत यह कार्य हो सकता है। जब मित्र ग्राम व ग्वील में इस सिद्धांत से मार्ग बन सकते हैं तो जाखणी -गोदेश्वर में भी यह संभव है।

आंतरिक पर्यटन से बाह्य पर्यटन की ओर याने मल्ला ढांगू के युवाओं में प्रचार

मैं अभी जब गाँव में था तो मेरी वय के तीन चार जनों ने गोदेश्वर मंदिर जाने की इच्छा जाहिर की। मेरे बत्तीस वर्षीय पुत्र व भतीजे ने मेरे से प्रश्न किया कि गोदेश्वर मंदिर है क्या ? मैंने घर से ही दिखाया कि सामने पश्चिम में गोदेश्वर मंदिर दिख रहा है। मेरे लिए व मेरी पत्नी के लिए दो क्या एक किलोमीटर यात्रा भी कठिन है तो गोदेश्वर यात्रा रह गयी किन्तु कार सर्विस होने से कई मील दूर डांडा नागराजा यात्रा उन्होंने की। ढांगू के युवा दम्पंतियों के मध्य गोदेश्वर सिद्ध पीठ का माहात्म्य प्रचारित होना ही चाहिए . सर्व प्रथम गोदेश्वर को प्रवासी ढांगू युवाओं में प्रचार अति आवश्यक है। सर्व प्रथम गोदेश्वर सिद्ध पीठ का प्रचार ढांगू के युवाओं में आवश्यक है।
श्री विवेका नंद बहुगुणा जी से सीख लेनी चाहिए
मल्ला ढांगू में बहुगुणा , कंडवाल , कुकरेती व बिंजोला जाति के पंडित हैं जिनका प्रभाव अभी भी प्रवासियों पर है। ये पंडित जी यदि कह दें तो जजमान साड़ी रात एक टांग पर खड़ा रह जाएगा। यदि सभी पंडित अपने जजमानों को गोदेश्वर मंदिर में पूजा हेतु प्रेरित करें तो गोदेश्वर मंदिर में आंतरिक पर्यटन विकसित होगा।
एक उदाहरण देने से सिद्ध हो जाएगा कि कैसे आंतरिक पर्यटन विकसित होता है। जसपुर के श्री विवेका नंद बहुगुणा जी के ग्वील के यजमान श्री अनिल कुकरेती (मध्य प्रदेश निवासी ) की सुपुत्री आकांक्षा का विवाह भटियाणा (चमोली ) के श्री राकेश जोशी के साथ मुंबई में हुआ। श्री विवेका नंद बहुगुणा जी ने इन दोनों नव दम्पंतियों को प्रेरित किया कि गोदेश्वर सिद्ध पीठ पूजा आवश्यक है और दोनों नव दम्पति मुंबई से गोदेश्वर पूजा हेतु पंहुचे। हाँ बाकी प्रबंध श्री विवेका नंद बहुगुणा जी ने किया हुआ था। यदि बहुगुणा , कंडवाल , कठूड़ के कुकरेती व बिंजोला पंडित इस दिशा में कार्य करें तो गोदेश्वर मंदिर में पर्यटन विकसित होगा।
शिव रात्रि पर मल्ला ढांगू के प्रवासियों का आने हेतु प्रेरणा
दिल्ली देहरादून आदि निकटवर्ती शहरों में रहने वाले प्रवासियों को शिव रात्रि अनुष्ठान सम्मलित होने हेतु प्रेरित किया जाना चाहिए जैसे थलनदी आदि में गेंद मेले हेतु प्रवसियों को प्रेरित किया जाता है।

अन्य ग्रामीण सामहिक पूजाओं के समय गोदेश्वर सिद्ध पीठ में धार्मिक अनुष्ठान

गोदेश्वर सिद्ध पीठ क्षेत्र में अधिकतर गावो में कुछ अंतराल पर सामूहिक पूजाएं होती हैं जैसे – जसपुर में नागराजा पूजा , मित्रग्राम में इस वर्ष से सामूहिक भागवद , ग्वील में भ्रातृ सम्मलेन या रामलीला व कठूड़ में देवी पूजा प्रायोजन । मेरी राय में उसी समय श्री अतुल कंडवाल जी सरीखे जन को गोदेश्वर सिद्ध पीठ में कोई भंडारा या अनुष्ठान उरयाणा चाहिए जिससे उस गाँव के युवा भी शरीक हों और गोदेश्वर सिद्ध पीठ से परिचित हो सकें।
संतोषी माँ की तर्ज पर गोदेश्वर सिद्धपीठ का प्रचार
धार्मिक स्थल विश्वास के बल पर ही प्रचारित होते हैं। गोदेश्वर सिद्धपीठ मंदिर का प्रचार कुछ कुछ संतोषी माता या सत्य नारायण जैसे प्रचारित होना आवश्यक है। संतान प्राप्ति तो श्री गोदेश्वर सिद्धपीठ का मूल विश्वास है।
गोदेश्वर सिद्धपीठ की प्रार्थना लिखी जानी चाहिए
ठंठोली के श्री अतुल कंडवाल ने सूचना दी है कि गोदेश्वर सिद्ध पीठ पर पुस्तक भी प्रकाशित है। मेरी राय में गोदेश्वर सिद्ध पीठ की कथा सत्य नारायण तर्ज पर लिखी जानी चाहिए व उसकी विशेष प्रार्थना लिखी जानी चाहिए व यूट्यूब पर प्रार्थना प्रचारित होनी चाहिए।
जाखणी , सिलोगी में आधार भूत सुविधाएं
श्री गोदेश्वर सिद्ध पीठ को पर्यटक स्थल बनाने हेतु जाखणी धार व सिलोगी बजार में आधार भूत सुविधाएं आवश्यक हैं। जाखणी धार अब क्षेत्रीय पंचायत केंद्र भी हो गया है तो सरकार ने भी यहां कई सुविधाएं देनी ही हैं।
भविष्य का धार्मिक पर्यटन सर्किट
भविष्य में एक बहुत ही कारगर धार्मिक सर्किट के अवसर हैं। कठूड़ के देवी मंदिर , शिव मंदिर , भैरव मंदिर , श्री गोदेश्वर सिद्ध पीठ , जसपुर नागराज (शिल्प , कला व साहित्य वृद्धि कारक देवता ) , बड़ेथ देवी मंदिर कड़ती का सिलसू मंदिर , कैडूळ का सती सावित्री मंदिर व लंगूर गढ़ का भैरों मंदिर एक सर्किट बनते हैं और यह सर्किट ऋषिकेश व कोटद्वारा से सामान दूरी पर हैं। या नीलकंठ सर्किट से गोदेश्वर सिद्ध पीठ जोड़ा जाय।

आंतरिक पर्यटन विकसित होने के बाद बाह्य पर्यटन पर जोर
जब भी कोई पर्यटक क्षेत्र आंतरिक पर्यटन क्षेत्र रूप में प्रसिद्ध हो जाता है तो स्वमेव ही बाह्य पर्यटन विकसित हो उठता है। शिरडी के साईं बाबा मंदिर पहले पहल नासिक , अहमदनगर में प्रसिद्ध हुआ फिर महराष्ट्र में प्रसिद्ध हुआ और अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हो गया है।
श्री गोदेश्वर सिद्ध पीठ का सोशल मीडिया में संतान प्राप्ति सिद्ध पीठ रूप में भी प्रचारण आवश्यक है।
एक बार सिद्ध पीठ गोडेश्वर प्रसिद्ध हो जाय तो मल्ला ढांगू में स्वयमेव कई पर्यटन प्रोडक्ट विकसित हो जाएंगे जैसे नीलकंठ मंदिर के आस पास।
ग्राम प्रधानों व पंचायत मंत्रियों को भी इस कार्य में सम्मलित किया जाना चाहिए।
कुम्भ मेले से यात्रियों को गोदेश्वर सिद्ध पीठ लाना
सही समय कुम्भ मेला है कि हरिद्वार में आये यात्रियों को गोदेश्वर आने के लिए प्रेरित किया जाय। प्रचार प्रसारण हेतु फंडिंग हेतु किसी धनी भक्त की सहायता आवश्यक है .

Copyright @ Bhishma Kukreti /265 //2018
संदर्भ

1 -भीष्म कुकरेती, 2006 -2007 , उत्तरांचल में पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150 अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 – भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 – शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास part -6
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