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Oct
14

बच्चों द्वारा रामलीला पुनरावृति: कुमाऊं -गढ़वाल में लोक नाट्य मंचन उदाहरण

बच्चों द्वारा रामलीला पुनरावृति: कुमाऊं -गढ़वाल में लोक नाट्य मंचन उदाहरण

लोकनाट्य विश्लेषक – भीष्म कुकरेती

लोक नाटक मनुष्य सभ्यता का एक अंग है। जहां भी मनुष्य होंगे वहां लोक नाटक स्वयं जन्म ले लेते हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र कुमाऊं -गढ़वाल लोक नाटकीकरण से अछूते नहीं हैं। लोक नाटक मंचन की विशेषता बल लोक नाटक अनऔपचारिक होते हैं। रस विधान स्वयं उपज जाते हैं। औपचारिक मंच , मेक अप साजो सामा न की अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती। लोक नाटकों ही नहीं लोक कथ्यों में दर्शक को अधिक नहीं समझाना पड़ता क्योंकि वह स्वयं ही समझ जाता है बल क्या हो रहा है।
ब्रिटिश काल में सन 1850 के बाद पर्वतीय क्षेत्रों से पर्वतीय जन मैदानों में आने लगे थे , ढाकर या रोजगार हेतु। इसी दौरान उत्तर प्रदेश में या सेना में औपचारिक ढंग से रामलला मंचन प्रसिद्ध होने लगा था। उत्तर प्रदेश के मैदानी भागों से प्रभावित हो उत्तराखंड में भी रामलीला मंचन प्रारम्भ हुआ। कहा जाता है कुमाऊं में 1860 ईशवी के लगभग व गढ़वाल में 1900 ईशवी में शुरू हुयी। शिक्षा वृद्धि व मैदानों में रामलीला दर्शन से प्रभावित हो प्रवासी रामलीला मंचन को ग्रामीण क्षेत्र में भी ला गए।
धीरे धीरे रामलीला मंचन पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोक प्रिय होने लगे। एक आकलन के अनुसार मल्ला ढांगू (तहसील लैंसडाउन , पौड़ी गढ़वाल ) के बड़ेथ ग्राम में 1910 लगभग रामलीला शुरू हुयी। मल्ला ढांगू ग्वील में संभवतः 1920 ईश्वी में रामलीला शुरू हो चुकी थी। इसी तरह सूचना अनुसार बणचुरि (उदयपुर पट्टी , पौड़ी गढ़वाल ) में 1940 ईश्वी में शुरू हुयी। स्वतंत्रता पश्चात प्रवास वृद्धि व शिक्षा वृद्धि के अतिरिक्त समृद्धि से पर्वतीय क्षेत्रों में रामलीला मंचन संस्कृति अंग बन गया। चमोली व रुद्रप्रयाग जनपदों में तो रमवाळी लोकनाटक ने जन्म ले लिया। अब तो रामलीलाएं इतिहास विषय हो गयीं हैं अतः भूतकाल का अवकलोकन ही अब लेखकीय विषय हो गए हैं
जिन जिन गाँवों में रामलीला मंचन होता था उन गाँवों के निकटवर्ती गाँवों में बच्चे भी अनौपचारिक रूप से रामलीला मंचन करने लगते थे। जिन बच्चों ने रामलीला देखी होती थी वे अन्य बच्चों के साथ किसी दृश्य की नकल कर लोक नाट्य वृति अपनाते थे। नवरात्रि से दीपावली तक बच्चों की अनपौचारिक रामलीला नाट्य मंचन चलता रहता था।
अधिकतर बच्चे उन्ही दृश्यों की पुनरावृति करते थे जिसमे आनंद अधिक आता था। अधिकतर राम लक्ष्मण -मारीच सुबाहु युद्ध दृश्य , सीता स्वयंबर में छवि राजा की नकल , परुशराम -लक्ष्मण संवाद , शूर्पणखा – लक्ष्मण संवाद , लंका में रावण -सीता संवाद की अधिक पुनरावृति होती थी। भरत बुलाने हेतु संदेशवाहक का जाना व संदेशवाहक के भरत संवाद भी नकल होतीं थीं। ये सभी संवाद रामलीला दृश्यों से उठाये गए होते थे और प्रसिद्ध दृश्य होते थे जिन्हे लोक अधिक पसंद करते थे। वास्तव में ये दृश्य जन जन के मन में घर किये होते थे।
जहां तक मंच व मंच स्थल का प्रश्न है कोई भी औपचारिक मंच नहीं होता था . अन्य सामन्य लोकनाटकों के सामान ही बच्चों द्वारा रामलीला पुनरावृति नाटक जहां खेला जाय वही मंच हो जाता था। मेरे अनुभव अनुसार अपना चौक , पधान जीक चौक , या कोई हौर चौक , पंद्यर /पनघट , गोरमा (गौचर ), सन्नी /छन्नी / गौशाला में , ग्वाठम , रस्ता चलदो कहीं पर भी मंच बन जाता था। मंच हेतु किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। न पर्दा , न छाँव बस कलाकारों के अभिनय से ही मंच बन जाता था।
मेक अप व अन्य साजो सामन – बच्चों द्वारा अभिनीत रामलीला पुनरावृति नाटकों में मेक अप व अन्य साजो सामान की बहुत कम आवश्यकता पड़ती थी क्योंकि दर्शक या अभिनेता पहले ही समझ जाते थे बल दृश्य क्या है और कौन किस पात्र का अभिनय कर रहा है यथा कोई बालक कह लेता था – ये ठैर मि मेघनाद क पाठ खिल्दु , जब तक उस बालक को परमिसन मिलती वह बालक मेघनाद की चौपाई बोल उठा था -
जिस जमीं पे पैर रखूं भूचाल वहीँ आते हैं
जमीं तो जमीं आसमा भी थर्रा जाता है
फिर तब तक कोई बालक उठ खड़ा हो जाएगा- अरे मि तैं रावण क पाठ खिन्न द्यावो वह चौपाई बोलने लग जाता था -
ये सीते तू सुंदर मुखी चपल नयन चित चोर। चपल नयन चित चोर हाँ हाँ चपल नयन चित चोर , . एक बार देख ले मोहि ओर।
फिर दर्शकों में से भी मांग उठती थी बल – ये स्यु गुबरा छवि राजा क पाठ अच्छू करदो। कौर रे गुबरा छवि राजाक पाठ।
बस गुबरा चौपाई गाने लगता -

सबी राजौं में छवि है मेरी न्यारी
पांच बुलाये पन्दरा आये। ..

कभी कभी कोई चौपाई गाता था और हौर दूसरा पात्र का अभिनय करता था।
इस तरह पात्र की सूचना जब मिल जाती थी तो मेक अप आदि की आवश्यकता नही रह जाती थी।निदेशन स्वजनित या सामूहिक या दर्शक सूचित होता था

किन्तु फिर भी मेक अप व साजो सामान अन्पौचारिक रामलीला नाटक मंचन में प्रयोग होते ही थे जैसे रामबांस से बनाई गयी तलवारें , पुट्ठे , कागज ही नहीं बांस के फटकणे /पत्ते से बने मुकुट , बांस या भीमल से बने धनुष , छिल्ल आदि के बने तीर , स्योळु से बने दाढ़ियां , बहुत बार तो हमने रामबांस के रेशों को म्वास /कोयले में भिगाकर काली दाढ़ी भी बनाई थीं। राक्षस अभिनय या काली मूछ हेतु म्वास प्रयोग सामन्य सी बात थी। शूर्पणखा या ताड़का (मैं तड़ तड़ करती हूँ ) पाठ खेलते वक्त स्थान अनुसार अभिनेता पेटीकोट पहन लेते थे।
कभी कभी अकेला बालक भी अभिनय करते देखे गए थे। ऐसे में बालक स्वयं अभिनेता , स्वयं निदेशक व स्वयं ही दर्शक होता था।
बालिकाएं भी अनौपचारिक रामलीला लोक नाटक खेलती थीं। बालिकाएं भी अपनी मंडली में रामलीला पुनरावृति खेल खेलती थीं। कम ही किन्तु स्त्रियां भी घास लकड़ी काटे वक्त अपने आनंद हेतु रामलीला खेलतीं थीं पर बहुत कम।
जहां तक दर्शकों का प्रश्न है गाँव वाले भी दर्शक होते थे अन्यथा मंडली ही दर्शक होते थे। आपस में वह वाही भी मिलतीं थीं। इस लेखक द्वारा ‘ वन्स मोर वन्स मोर या दूबर खेल’ भी इन लोक नाटकों में देखा गया है।
जैसे कि हर लोक नाटक में होता है बालक- बालिकाओं व कम ही सही स्त्रियों द्वारा रामलीला पुनरावृति नाटक मंचन भी स्व आनंद , जन आनंद व स्व अभिव्यक्ति हेतु खेले खेले जाते थे . रस बाहव वही उतपन्न होते थे जो प्रायः रामलीला मंचन में उतपन थे।

सर्वाधिकार @भीष्म कुकरेती, 2018

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