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Nov
08

जसपुर (ढांगू ) सलाण में डळ्या नाथ पंथ का प्रमुख केंद्र रहा है !

जसपुर (ढांगू ) सलाण में डळ्या नाथ पंथ का प्रमुख केंद्र रहा है !

आलेख : आचार्य भीष्म कुकरेती

नाथ शब्द का वंश विशेष से संबंध न हो धर्म या रक्षा हेतु संरक्षक से अर्थ है। नाथ कएक अर्थ सर्वोच्च संरक्षक याने ईश्वर भी है। गुरु गोरखनाथ ने नाथ सम्प्रदाय को आगे बढ़ाया। भर्तहरि व गोपी चंद ने नाथ पंथ को विस्तार दिया।
नाथ सम्प्रदाय या नाथ पंथ ने उत्तराखंड में सातवीं सदी में प्रवेश कर लिया था। केडाखण्ड में नव उल्लेख हुआ है और केदारखंड में ही नंद ब्रह्म का भी उल्लेख हुआ है ।
नव नाथस्तु मे ख्याता नाद ब्रह्मरता सदा।
कुमाऊं के प्रथम चरण के चंद वंशीय राजा व गढ़वाल के पाल वंशी राजा नाथ पंथी गुरुओं से अति प्रभावित थे व उन गुरुओं की छत्रछाया में राज करते थे जैसे अखाड़े राजाओं को प्रभावित करते थे व आजकल साधू भाजपा को प्रभावित करते हैं व संरक्षण देते हैं। गढ़ नरेश अजयपाल )1500 ) तो नाथ पंथ के अग्रणी अनुयायी थे व नाथ पंथ साहित्य में में अजयपाल को बाबा अजयपाल भी कहा गया है। गढ़वाल में नाथ पंथ के शीर्ष ज्ञाता डा विष्णु दत्त कुकरेती अनुसार नाथ प्रभाव गढ़ नरेश प्रद्युम्न शाह ही नहीं सुदर्शन शाह पर भी था।
यथा राजा तथो प्रजा अनुसार गढ़वाल की प्रजा भी नाथ पंथ से अति प्रभावित थी और आज भी प्रवासी हो या वासी सभी गढ़वाली नाथ पंथ से प्रभावित हैं।
पहाड़ी उत्तराखंड में नाथ पंथ में दो प्रकार के कर्मकांड हैं
१- गैर डळ्या- ओळ्या गुरुओं द्वारा कर्मकांड जैसे सभी तरह के जागरी , औजी , पुछेर, झाड़ -ताड़ वाले तांत्रिक व मांत्रिकों द्वारा कर्मकांड व पूजा अर्चना
२- डळ्या- ओळ्या गुरुओं द्वारा पूजा व मंत्र आदि। डळ्या- ओळ्या मंदिरों में भी रहते हैं व आम शादी शुदा नागरिक या कृषक की तरह भी रहते हैं। मंदिरों में महंतों को गोस्वामी/गिरी नाम अधिक प्रचलन में है.
डळ्या- ओळ्या कृषक व परिवार वाले होते हैं।
वास्तव में डळ्या- ओळ्या गुरुओं का मुख्य कार्य मंत्र तंत्र द्वारा प्राकृतिक आपदा रुकवाने का था याने डिजास्टर मैनेजर्स। ओले , अति वर्षा अति सूखा रोकने का कार्य डळ्या- ओळ्यागुरुओं का था। शायद ओले से हो ओळ्या शब्द की उत्तपति हुयी व फिर डळ्या शब्द की उत्तपति हुयी होगी।
पौड़ी गढ़वाल के सलाण क्षेत्र में डळ्या- ओळ्या गाँव
सलाण याने ढांगू , डबरालस्यूं , उदयपुर , लंगूर , बदलपुर, अजमेर , पट्टी व भाभर। इस क्षेत्र में इस लेखक की जानकारी अनुसार निम्न डळ्या- ओळ्या गुरुओं के गाँव -हैं
१- रणेथ मल्ला ढांगू
२- गुदड़ , अमाड़ी ( डबराल स्यूं , जो पहले ढांगू का ही भाग था ) – रणेथ से ही गए
३- अमगांव ( वल्ला उदयपुर )
४- उनेरी (बिछला बदलपुर )
५- अदाळी (शीला पट्टी )
दक्षिण गढ़वाल में जसपुर मल्ला ढांगू में डळ्या- ओळ्या नाथ पंथ केंद्र होने के प्रमाण
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जसपुर का मल्ला ढांगू व डबरालस्यूं में विस्तार
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जसपुर ऋषिकेश , घट्टूगाड , (नीलकंठ के नीचे ) , गुमखाल कोटद्वार मोटर मार्ग पर ऋषिकेश सेलगभग 56 Km व कोटद्वार से भी इतनी ही दुरी पर बसा प्राचीन गाँव है।
जसपुर मल्ला ढांगू व डबरालस्यूं का प्राचीनतम बसे गाँवों में से एक है। मल्ला ढांगू में सन चौदहवीं सदी में डाबर , बड़ेथ व जसपुर बसने के संदर्भ रतूड़ी , ऐटकिंसन , डबराल की इतिहास पुस्तकों में मिलते हैं
जसपुर का मल्ला ढांगू पर पधानगिरि अधिपत्य

यह लेखक जब लिखता है बल जसपुर का अधिपत्य (थोकदारी नहीं पधान गिरी ) मल्ला ढांगू में गोरख्याणी तक रहा है तो कई विचारकों को बुरा लगता है। यह लेखक सारे मल्ला ढांगू में ब्रिटिश राज प्रारम्भ होने तक जसपुर का विस्तार रहा है पर निम्न तर्क देता है -
गोरखा काल के रिकॉर्ड जो ढांगू (डबरालस्यूं सहित ) थोकदार विष्णु सिंह गोर्ला रावत के दस्तावेजों में गोरखा काल के ढांगू के गाँवों की लिस्ट
ग्वील पधान की पधानगिरि के गाँव क्षेत्र , ग्वील गाँव की बसाहत 1825 के बाद ही है।
कौंदा (बिछल ढांगू ) पर मल्ला ढांगू की सीमा निकट, मळ्ळ दाबड़ , खमण , कठूड़, गटकोट गाँव मल्ला ढांगू (प्राचीन डबरालस्यूं सहित ) के परिधि वाले गाँव हैं जहां कुकरेती बसे हैं।
जसपुर के बहुगुणाओं की ब्राह्मण वृति क्षेत्र
ठंठोली के कंडवालओं की ब्राह्मण विर्ती जो उदयपुर पट्टी के मगध -चुपड़ा तक थी व मगध मल्ला ढांगू का सीमावर्ती गाँव हैं।
जसपुर के स्व डुंकर सिंह की जागरी क्षेत्र की परिधि भी मगध -चुपड़ा (उदयपुर पट्टी ) तक थी
जसपुर के एक कुकरेती का डळ्या धर्म अपनाना
सर्व प्रचलित लोक कथ्य है कि किन्ही कारणों से जसपुर के एक कुकरेती ने डळ्या पंथ अपना लिया था व उन कुकरेती को रणेथ गाँव दिया गया था। कालांतर में रणेथ में जसपुर के ही डळ्या नहीं थे किन्तु रणेथ बसने के बाद किसी अन्य गाँव से एक परिवार और बसा था। जसपुर डळ्या- ओळ्या बिना केंद्र हो कोई इस तरह डळ्या नहीं बन सकता है।
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जसपुर , ग्वील में आधुनिक काल में तांत्रिक , मांत्रिक ,जागरी न होना
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लोक कथ्य है बल इस लेखक की कुल शाखा में गुदड़ जी व मणि राम जी (ग्वील शाखा व जसपुर गंगा दत्त के पौत्र गोबिंद राम कुकरेती शाखा के छोटे भुला ) बड़े तांत्रिक , पूछेर हुए थे किन्तु एक भाई के डळ्या पंथ अपनाने से अन्य भाइयों ने भी तंत्र मंत्र जैसे कर्मकांड छोड़ दिए। इस लेखक को कोई जानकारी नहीं कि इक्कीसवीं सदी में जसपुर गवील में कोई तांत्रिक -मांत्रिक हुआ हो (गुड़ व गौंत मंत्रणे को छोड़कर )

जसपुर में डळ्यों मठ
जसपुर गाँव में डळ्यों मठ है जिसमे रणेथ के डळ्याों को समाधि दी जाती थी व गुदड़ /अमड़ी के कोई प्रमुख को भी समाधि दी जाती थी।

जसपुर में नाथ स्थान
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जसपुर में एक सारी का नाम नाथ है। नाथ अब गधेरे /गाड के पास वाली घाटी में है। दो दशक तक पणचर क्षेत्र रहा है। आश्चर्य यह है कि किसी भी कुकरेती परिवार का नाथ स्थल में कोई खेत नहीं है जब कि फर्टिलिटी के हिसाब से मूल कुकरेतियों के खेत होने चाहिए थे मेरा अनुमान है कि नाथ स्थल में या तो कोई डळ्या गुरु मठ था या कुकरेती परिवारों ने नाथ गुरुओं को भूमि दान दी हो। दान भूमि को वापस नहीं लिया जाता है।
जसपुर गाँव के बिलकुल किनारे कुछ उड्यारी भी हैं। शायद यहां पहले डळ्या- ओळ्या डेरा जमाते होंगे।

ग्वील में बुधरौळ व समाधि
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ग्वील जसपुर का अहम हिस्सा था जो ब्रिटिश राज आने बाद गाँव में परिवर्तित हो गया और पधान ग्वील में बस गए।
ग्वील के वेद प्रकाश कुकरेती ने सूचना दी है कि ग्वील में एक समाधी है जिसे बुद्धरौळ कहते है जिसका अर्थ आनंद मस्ती होता है।
दक्षिण गढ़वाल में पांचवी सदी तक बौद्ध प्रभाव रहा है किन्तु ततपशचात नहीं। एक अनुमान से यह समाधि किसी डळ्या गुरु की भी हो सकती है। किन्तु स्पस्ट नहीं कहा जा सकता है।
जसपुर में डळ्या- ओळ्याओं को गुरु पद प्राप्त था
जसपुर में डळ्या- ओळ्याओं को गुरु पद प्राप्त है व उन्हें बड़े सम्मान से देखा जाता है। हर बच्चे को पांच वर्ष से पहले ही डळ्या- ओळ्या गुरु की झोली में डालने की प्रथा रही है। डळ्या- ओळ्या मठ स्थल जो बच्चों के खड्यारण स्थल सिल्लडी गदन के पास ही है किन्तु यहां भूत पिचास का कोई डर ही नहीं होता है।

गुदड़ अमाड़ी गाँव में डळ्या
गुदड़ अमाड़ी में डळ्या- ओळ्या गुरु बसते हैं। वर्तमान काल में ये दोनों गाँव डबराल स्यूं पट्टी में हैं किन्तु एक समय मल्ला ढांगू के अंतर्गत थे। गुदड़ -अमाड़ी वास्तव में खमण गाँव के ही हिस्से थे। चक्रधर कुकरेती द्वारा संकलित ग्वील -जसपुर कुकरेती वंशावली में संकलित वृषी जी का खमण लोक कथा व ग्वील के ही कीर्ति प्रसाद कुकरेती द्वारा इस लेखक को सुनाई गयी लोक कथा अनुसार अनुमान लगाया जा सकता है बल ग्वील के मूल पुरुष याने जसपुर वाले कुकरेतियों के बड़े दादा जी को डबरालों ने खमण दान दिया था। इससे अनुमान लगता है कि खमण जसपुर व बाद में ग्वील का हिस्सा था। अनुमान लगाना सरल है कि रणेथ में बसने वाले की भी भूमि यहां रही होगी या ग्वील की भूमि होने के नाते रणेथ के डळ्या- ओळ्या गुरु जी यह बस गए।

मित्रग्राम क्या मठगाँव था ?
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जखमोलाओं के मित्रग्राम मल्ला ढांगू का महत्वपूर्ण गाँव है। गोरखा रिकॉर्ड में मित्रग्राम का नाम नहीं है। कहते हैं बल जखमोला गटकोट से आकर मित्रग्राम बसे थे। मित्रग्राम की सीमा प्राचीन जसपुर या नव ग्वील (बाड़यों ) , ठंठोली , बन्नी , खैंडुड़ी व गटकोट , गड़बड़ेथ (उदयपुर ) से मिलीं हैं। रणेथ की सीमा भी मित्रग्राम से मिलती है। मित्राग्राम नाम कैसे निर्मित हुआ पर लोक कथ्य व वासवा नंद बहुगुणा की डायरी का सहारा लेना पड़ेगा। मित्रग्राम से बाहर अन्य गाँवों के लोक कथ्य में मतण गाँव अधिक प्रसिद्ध है। श्रीनगर में गोरखा प्रशासक प्रेमी संस्कृत विद्वान् वासवा नंद बहुगुणा को ब्रिटिश राज में भागना पड़ा। वासवा नंद बहुगुणा संबत 1905 श्रावण गते रविवार को ग्वील -बड़ेथ में रुके थे। याने सन 1848 में वासवा नंद बहुगुणा ग्वील बड़ेथ में थे। इसके बाद वासवा नंद बहुगुणा सौड़ , मतरगांव , गटकोट , दिखेत के रास्ते लंगूर पट्टी के रास्ते रणजीत सिंह के राज्य में पंहुचे। डा शिव प्रसाद डबराल अनुसार वासवा नंद बहगुणा की डायरी में मतर गांव लिखा है। मतण से मतर होना स्वाभविक लगता है। वास्तव में मतण का प्राचीन अर्थ मतंग याने अपनी धुनि या ध्यान में रहने वाला था। दूसरा मठ से मठण व मठण से मतण व मतण से मतर व मतर गाँव से मित्रग्राम परिवर्तित होना अधिक सटीक लगता है। गोवा का मडगांव भी मठ गांव से परिवर्तित हुआ नाम है। मठण से मतण परिवर्तन सिद्धांत को सही माना जाय तो सिद्ध होता है कि मित्रग्राम में डळ्या- ओळ्या मठ था। और जसपुर के नाथ स्थल पर केवल जखमोलाओं का कब्जा होना भी कुछ ना कुछ संकेत तो देता ही है कि मतर गाँव मठ गाँव था। जसपुर के जखमोला मित्रग्राम से आये बसे परिवार हैं।
उपरोक्त तथ्य सिद्ध करते हैं बल कभी जसपुर -ग्वील सह डळ्या- ओळ्यापंथ का केंद्र रहा है।

Copyright@ Acharya Bhishma Kukreti , 2018 ,bjkukreti@gmail.com

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