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Nov
09

गढवाल में बौद्ध धर्म के चिन्ह

गंगा सलाण गढ़वाल में बौद्ध धर्म के प्राचीन चिन्ह

आलेख : आचार्य भीष्म कुकरेती
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उत्तराखंड का पाटलिपुत्र से गहरा संबंध रहा है कहते हैं नंद कुल प्रथम पुरुष गोविषाण काशीपुर -जसपुर क्षेत्र का भड़ खस सिपाही था। मौर्यों का राज भी उत्तराखंड पर रहा है। अशोक अभिलेख कालसी जौनसार बाबर में हैं ही। इतिहासकार डबराल लिखते हैं कि सम्राट अशोक हेतु प्रतिदिन उत्तराखंड से टिमरु व अन्य औषधि पाटलिपुत्र पंहुचायी जाती थीं। बिजनौर में मयूरध्वज किला व गोविषाण (उधम सिंह नगर ) में बौद्ध शाशक के अवशेष आज भी मिलते हैं। गढ़वाल भाबर में पांडुकेश्वर में बौद्ध धर्मी संस्कृति के अवशेषों पर इतिहास में चर्चा होती ही है। हरिद्वार की पहाड़ियों मे कई बौद्ध संतों के मठ रहे हैं/ इन मठों से बौद्ध भिक्षुक व प्रचारक दक्षिण उत्तराखंड में भ्रमण करते ही रहते थे। चूँकि बौद्ध धर्मी भिक्षुक बौद्ध धर्म प्रचार में पाली भाषा का इस्तेमाल आज भी अधिक करते हैं तो पाली का प्रभाव उन स्थानों में पड़ना अवश्यम्भावी था जहां बौद्ध धर्म पनपा। ऐसे में कई स्थल पाली भाषा शब्द से नामांकित हुए होंगे। यद्यपि उत्तराखंड में बौद्ध धर्म उस तरह प्रसारित न हो सका जिस तरह अन्य स्थलों में प्रसारित हुआ फिर भी उत्तराखंड के कई शाशक बौद्ध धर्मी हुए हैं व उन्होंने कई बौद्ध मठों व स्तूप निर्माण हेतु धन य संसाधन दिए थे। हाँ सातवीं सदी या गुप्त काल के धर्म उत्तराखंड में भी मृतप्रायः ही हो गया था। यही कारण है कि दक्षिण गढ़वाल में बौद्ध धर्म के कई चिन्ह मिलते हैं अब कम मिलते हैं जहां हरिद्वार व बिजनौर से बौद्ध भिक्षुकों का आना सुगम था ।
गढ़वाली भाषा में पाली भाषा शब्द
गढ़वाली में गर्रो , खुद , छक्का , दुलभ , बामण , आछरि , सौ सुब्बा , अगरु , व पितक (पिटक ) पाली शब्द हैं। शायद लम्बा व चम्बा शब्द भी पाली के ही हैं।
कई नाम गौती , गोती , बुद्धू तो गौतम बुद्ध से प्रभावित नाम ही लगते हैं।
पाली साहित्य में पन्हा पेज तो प्रसिद्ध ही है गढ़वाली में कागज का ‘पन्ना ‘ शब्द शयेद पाली से प्रेरित शब्द ही हो।

गंगा सलाण में बौद्ध धर्मी स्थल

पौड़ी गढ़वाल में लैंसडौन तहसील अंतर्गत लंगूर , अजमेर , ढांगू , डबराल स्यूं , उदयपुर में कुछ स्थल बौद्ध धर्म के चिन्ह माने जा सकते हैं।
पाली – डा पितांबर बड़थ्वाल की जन्मस्थली पाली (लैंसडौन ब्लॉक ) भी बौद्ध धर्मी व्यक्तिवाचक नाम है।
मस्ट पाली (डबराल स्यूं )- द्वारीखाल ब्लॉक में चैलू सैण के निकट दो गाँवों के नाम मस्ट (मस्त याने अति आनंद युक्त ) व पाली बौद्ध धर्म प्रभाव के प्रतीक हैं।
पाली (द्वारीखाल ब्लॉक , मल्ला ढांगू )- पाली गाँव नाम भी बौद्ध धर्म प्रतीक ही है।
मगध , चुपड़ा (उदयपुर ) – यमकेश्वर ब्लॉक में कटघर के हिंवल तट का मगध तो बौद्ध धर्म की बरबस याद दिला ही देता है .
ख्याड़ा मगध (उदयपुर पट्टी ) भी बौद्ध धर्म संबंधित नाम है।
कुछ नाम जो खस व बौद्ध धर्म प्रतीक हैं
गढ़वाल में खस धर्म या संस्कृति पहले आयी तो कई स्थल नाम खस होना लाजमी हैं किन्तु बौद्ध धर्म में भी बहु प्रचलित रहे हैं -
नगळी (मल्ला ढांगू ) जसपुर मेथा सीमा पर एक स्थल नाम है।
गणिका (मल्ला ढांगू ) – जसपुर छाल में खरिक (बिछला ढांगू ) की जमीन व खेत
गणक्या – उदयपुर पट्टी का एक गाँव
चम्बा (जसपुर मल्ला ढांगू ) यदि सम्बा व चम्बा पाली शब्द हैं तो यह स्थल भी बौद्ध धर्म प्रभाव का द्योतक है।

यद्यपि ग्वील (मल्ला ढांगू ) के बुधरौळ समाधि स्थल बौद्ध धर्मी नहीं मानी जाती है किंतु बुद्धरौळ शब्द तो सिद्ध करता ही है बल कभी न कभी गढ़वाल में बौद्ध धर्म का अधिपत्य था ही।
चूँकि बौद्ध धर्म का प्रभाव बिलकुल समाप्त हो गया है तो इतिहासकारों ने पाली में व्यक्तिवाचक संज्ञाओं व गढ़वाल स्थल नामों की कभी विवेचना की ही नहीं। यह लेख एक लघु प्रयास है ।

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