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Dec
19

आणाईं जाणाई रै !

आणाईं जाणाई रै !

कथा -हरि लखेड़ा , बणचुरी , उदयपुर , गढवाल
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जब पता चल कि चैता बौ भी दिल्ली ऐ ग्या त मिलण कुण चल ग्यूं। चैता बौ क ड्वाला मी भी लै छे। दादा खेति बाड़ी करद छे। द्वींयूं कुण कालु अक्षर भैंस बराबर। गाँव मा सबसे बढिया पुंगडी ऊँकी परिवारम छे। वे टाइम पर बरखा भी समय पर हूंदी छे। लोग काम से जी भी नी चुरांद छे। खूब मेहनत करद छे। साल मा द्वी फ़सल परिवारकुण बहुत छे। बाखर, ढेबर का व्यापार मा नक़द रक़म मील जांदी छे। कभीकभी गाय बैल बेचीक भी आमदनी ह्वे जांदी छे। मेहनत जरूर छे पर मेहनत कख नी च। बग़ैर मेहनत क त थालीक खाणुक भी गिच तक नी जांदु।
पर दादा की एक ही लगन छे कि वूंकि तरैं लड़का – लड़की अँगूठा छाप नी रैन। एक लड़का और द्वी लड़की वास्त एक ही सपना कि सब पढ़ लिख जावन। गाँव मा स्कूल छैंछ्या। लडक्यूंन बारवीं तक पढ़ और शादी करवै द्यै। लड़का, जु सबसे छोटु छे, बारहवींक बाद, देहरादून पढणकुण भेज द्या। लड़का पढणमा होशियार छ्या। थोड़ा यना वना बीठीक क़र्ज़ लीण पड़ पर पढ़ाई पूरी कर। एक दिन दिल्ली मा अच्छी नौकरी भी मीलि ग्ये।
दादा न जब ब्वारी खोजणै की स्वाच त लडकान साफ बोल दै कि वै ताई बिना पुछ्यां कखि बात न करीन। क्या कन छे, हाथ मा हाथ धरीक बैठ गीन। एक द्वी बेर द्वी झण दिल्ली गे भी छे पर दिल नी लगु , वापस ऐ गीन। लड़का न बहुत ब्वाल कि गाँव की जमीन कैं ताई त्याड पन देकन दिल्ली ऐ जाव पर एक त क्वी लीण वालु ही नी छ्ये दुसर मकान पण तालु लगाण गाली सी लगदि छे। बेटा जब तक हाथ खुट चलणाई छन, गाँव ही ठीक च। लड़का न भी ज़ोर नी द्ये। हाँ अगली बेर जब घर आई त एक मोबाइल पकड़ै ग्ये। शुरू शुरू मा त दिन मा चार पाँच बगत बात करनाई रैन। एक दिन लड़का न बोल बार बार फ़ोन करनैकि जरूरत नी, डिस्टर्ब हूंद मी। क्वी ख़ास बात ह्वा तभी बात कर। मी फ़ोन कैरि ल्यूल। अब पाँच दस दिनम लड़का ही फ़ोन करदु।
एक दिन फ़ोन आई कि वैन अफकुण लड़की ढूँढ आलि। शादी कि तारीख़ भी पक्की ह्वे ग्ये। हफ़्ता भर बाद ही दिन छे। जल्दी जल्दी कपड़ा समेटीन और दिल्ली पौंचि गेन। ज्यादा कुछ कैरी नी सकद छे पर चैता बौ न अपणी बुलाक और गलूबंद आण वाल ब्वारी कुण दे द्या। लडकान यतूक ब्वाल क्या जरूरत च और वनि भी अब कु पैरुद ई सब। मन मारीक रै गीन बिचार।
लड़की शादी क दिन ही द्याख। पंजाबी परिवारैकि लाड़ली बेटी। खूब सजीं छे। एकदम जन अप्सरा हूंदन। एक किनार पर सोफ़ा मा बैठी रैन। बीच मा पंडित जीन बुलाई, कुछ मंत्र वंत्र पढीन और ह्वे ग्या व्यौ। शादी क कार्ड मेकुण भी ऐ छे पर शादी हूंण क बाद। सब बात बाद मा पता चलिन। शादी क बाद दूल्हा दुल्हन हनीमून पर बैंकाक चलि गीन और दादा और बौ वापस गाँव। ईं बात ताई दस साल ह्वे गीन।
बीच मा ख़बर मील कि दादा नी रै और बौ एकदम अकेला ह्वे ग्ये। आज जब पता चल कि बौ दिल्ली च त मिलणौक चलि ग्यूं। बौ न ब्वाल कि तीन महिना बिटीक दिल्ली च। इतवार क दिन छे, सोचि छे कि सब घर पर ही ह्वाल। जांण से पैली फ़ोन भी करी छे। भतिजा और ब्वारी पंद्रह बीस मिनट क बाद यन बोलीक चली गीन कि जरूरी काम से जाण जरूरी च और शाम तक आल। एक तीन महीना की बच्ची , बौ और मी और मेरी धर्म पत्नी। बौ न और पत्नी न मिलीक खांणुक बणाई, गप्प लगाइन, खांणुक खाई और वापस ऐ गवाँ।
आंद बगद बौ न ब्वाल आणाईं जाणाई रैन। हमन ब्वाल तुम भी ऐन। बौ ब्वाल कन कैक आण यीं बच्ची ताई छोडीक। यीं बच्ची क बान छौं एक, नेथर गाँव से बढिया कखी नी।

अब मी भी क्या बोलु। आप सब समझदार छन।
कोपीराईट @ हरि लखेडा,नई दिल्ली
जनवरी, २०१८.

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