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Feb
18

हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर की पर्वतीय पौरव काल की स्थानीय भाषा :खस भाषा के अंश

हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर की पर्वतीय पौरव काल की स्थानीय भाषा :खस भाषा के अंश
Local Languages of Haridar, Saharanpur Bijnor in Parvatakar Paurava Kingdom

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का ‘अंध युग’ अर्थात तिमर युग इतिहास (647-725 AD )- 19

Paurava dynasty in Dark/ Early Middle Age of History of Haridwar, Bijnor , Saharanpur (647-725 AD ) – 19

Ancient History of Haridwar, History Bijnor, Saharanpur History Part – 296

हरिद्वार इतिहास , बिजनौर इतिहास , सहारनपुर इतिहास -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग – 296

इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
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पिछले अध्याय में डबराल द्वारा पौरव वंशी शासनो की पढ़कर कुछ गांवों के नाम दिए जिन्हे पौरव काल में शासनों में संस्कृत में परिवर्तित किया गया था (1 ) । यह ऐसा ही है जैसे अंग्रेजी शासन में अंग्रेजी में शासन आदेश अंग्रेजी में ही आते थे व कई स्थलों के नाम परिवर्तित हुए जैसे गढ़वाल के गाँव ग्वील को Goil कर दिया गया , बरसुड़ी को Barsuri या महाराष्ट्र के धुळे को Dhule नाम डबराल ने जिन संस्कृत रुपया ग्रामों का गढ़वाली नाम ववरण दिये वे वास्तव में खस भाषा के सूत्र thread लगते हैं यथा बाट , गाड , खोळी , सारी खारी आदि आदि । आज भी ये नाम कुमाऊं -गढ़वाल में विद्यमान हैं। चूँकि विद्वानों के पास रिकॉर्ड में प्राकृत या अपभृंश नाम ही है तो इतिहासकार भी सरलीकृत वृति या सरलीकरण हेतु भाषा संदर्भ में प्राकृत , अपभ्रंश या देश भाषा नाम दे देते हैं जैसे डबराल ने भी लिखा (1 )। दूण , खारी सारी शब्द भी संकेत करते हैं कि तब गढ़वाल कुमाऊं व लग्गे बग्गे मैदानी भागों में खस या खस निर्मित भाषा बोली जाती थी।
यह मानने में अधिक दिक्क्त नहीं होनी चाहिए कि पौरव वंशियों के महाधिराज विरुद से सिद्ध होता है कि पूर्व वंशी राज मैदानों (हरिद्वार, सहारनपुर व बिजनौर तक या कुछ भाग तो था ) . अतः यह भी माना जा सकता है कि हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर में खस भाषा बोली जाती थी जिसे डबराल ने देशज भाषा उल्लेख किया जिसे विद्वान व इतिहासकार सरलीकरण मानसिकता के तहत प्राकृत , अपभ्रंश नाम दे दे दते हैं।
डबराल ने आगे लिखा कि यही देशज भाषा बाद में उत्तराखंड की वर्तमान बोलियां बनीं।

हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर की प्राचीन बोलियां ?

चूँकि मध्य युग व ततपश्चात मुस्लिम आक्रांताओं व मुगल राज आ जाने से इस क्षेत्र में कोई सजातीय समाज न रहा जैसे गढ़वाल या कुमाऊं में तो कोई सजातीय भाषा भी न बच सकी। इस कारण सहारनपुर , बिजनौर , हरिद्वार की प्राचीन बोलियों पर भी किसी विद्वान् का ध्यान भी नहीं गया।
खस भाषा या शौरसेनी भाषा ?
इतना तो तय है कि पहाड़ों में खस भाषा बोली जाती थी और चूँकि सहारनपुर , हरिद्वार व बिजनौर तब तक उत्तराखंड के अभिन्न अंग थे तो यह माना जा सकता है कि सहरानपुर , बिजनौर व हरिद्वार में भी खस भाषा या बोली (स्थानीय बदलाव अवश्यम्भावी है ) बोली जाती रही होगी।
विद्वान मानते हैं कि शौरसेनी हिंदी (हिंदी जो पश्चमी उत्तर प्रदेश , हरियाणा , हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर में बोली जाती है ) की जननी है और इस शौरसेनी का जन्म लगभग 2वीं -3 वीं सदी का माना जाता है (2 )
पौरव काल 645 -725 का है याने इतने काल में तब तो कोई भाषा इतना प्रभाव नहीं डाल सकती थी कि सम्पूर्ण समाज शौरसेनी प्रभावित हिंदी बोलने लग जाय न ही कोई आर्थिक औचित्य था । इन विवेचना से कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण बिजनौर , हरिद्वार , सहरानपुर न सही कुछ भागों में में खस भाषा या खस प्रभावित बोली अवश्य बोली जाती रही होगी। हो सकता है शौरसेनी प्रभावित हिंदी या स्थानीय भाषा व खस मिश्रित भाषा भी बोली जाती रही होगी।

सन्दर्भ :

1- Dabral, Shiv Prasad, (1960), Uttarakhand ka Itihas Bhag- 3, Veer Gatha Press, Garhwal, India page 420

2 – वुलनेर , अल्फ्रेड (2016 ) इंट्रोडक्शन टु प्राकृत रीप्रिंट मोतीलाल बनारसी दास दिल्ली

Copyright@ Bhishma Kukreti , 2019

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