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May
23

ये राउल गांदी को अकल कब आयेंगी ?

ये राउल गांदी को अकल कब आयेंगी ?
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आलेख : भीष्म कुकरेती
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कुछ दिनों से अस्वस्थ होने व घर स्थानांतर के कारण मेरा घूमना ही कम नहीं हुआ अपितु जोगेश्वरी के चिरपरिचित रिक्शेवालों , चर्मकार , भाजी फल बिक्रेता, दूध विक्रेता , सिगरेट बिक्रेता, छूटकर दुकानदारों , इडली बड़ा साम्भर बेचने वालोंक के ग्राहक से नाता टूट गया। इस समाज से मुझे समाज में चलने वाली विचारधारा व विचार का जायजा लेना सरल था। कांदिवली स्थानांतर होने से अब मुझे नए सिरे से अपने को इस समाज से परिचय करना है। किन्तु मैंने तोड़ निकल लिया है। रिक्शा तो दर रोज लेना ही पड़ता है तो रिक्शेवालों के मन में क्या चल रहा है का ज्ञान मिल ही जाता है। हाँ गढ़वाल दर्शन के वासिंदे जो इनपुट देते थे वह इनपुट अब नहीं मिल पाटा क्योंकि सोसाइटी नई है और अधिसंख्य फॉर्मल या औपचारिक हैं।
मैं सुबह सुबह 6 बजे सिगरेट पीने निकल जाता हूँ जहां चाय पीने और बीड़ी सिगरेट पीने रिक्शे वाले खड़े होते हैं। इस चाय सिगरेट की दूकान के पास खड़ा हो कई इनसाइट मिल जाती है।
सुबह भी सिगरेट चाय दूकान पर चार पांच रिक्शवाले चुनाव प्रणाम पर चर्चा ठिठोली कर रहे थे। मैं खड़ा निर्लिप्त सुन रहा था।
एक बोलै – ये राउल गांदी को कब अकल आयेंगी ?
दूसरा बोलै – अबे उसे अकल की जरूरत क्या है ? कौन से उसने रिक्शा चलाना ऐ ?
पहला – अबे हार रआ ऐ तो हार मान ले क्यों इतना बड़ा लफड़ा कर रआ ऐ। बोलते ऐं कि कमिश्नर और कोर्ट जा रआ ऐ।
तीसरा – ये प्रियंका बी एड़ी लगती ऐ कुछ नयी कर सकती लगता ऐ।
चर्चा बिंदु था कि कॉंग्रेस चुनाव फल आने से पहले इतना रोदन व हाय तोबा क्यों मचा रही है। वास्तव में सभी विरोधी पार्टियों की सामूहिक सकड़ पकड़ से सभी दल एवं विरोध कोर्ट गए व चुनाव आयुक्त पंहुचे , किन्तु नाम बदनाम हुआ राहुल गांधी का। खावन प्यावन औरूं का मार खावन गौरूं का।
सन 2014 से कॉंग्रेस के थिंक टैंक में सन्निपात फैला है जो जनता की नब्ज पहचानने में सर्वथा असफल रही है।
जब डिमॉनीटाइजेसन से जनता भयंकर रूप से मोदीमय हो गयी तो राहुल गांधी व चेले अनावश्यक रूप से आलोचना कर अपने को बेवकूफ साबित कर रहे थे। इसी तरह सर्जिकल स्ट्राइक की आलोचना , स्ट्राइक की आलोचना करना , अपने को याने कांग्रेस को पाकिस्तान सेना के निकट दिखलाने की भयंकर गलती करना राजनैतिक पंडितो को कभी समझ में नहीं आया / बहुत से वक्त कोई टिप्पणी न करना या राजनैतिक प्रतिक्रिया न देना ही राजनैतिक परिपक्वता मानी जाती है और बेवकूफ अंधे सांप जैसा किसी पर भी काटने झपटना कोई राजनैतिक बुद्धिमता तो न मांई जाएगी। जिस दिन मोदी की केदारनाथ यात्रा का प्रचार हो रहा था और कॉनर्स व विरोधी मोदी को नाटकबाज धर्मभ्रष्ट की संज्ञा दे रहे थे तो दूसरी सुबह मुझे रिक्शेवाले , मच्छी बेचने वाले हॉकर्स आदि मोदी की प्रशंसा करते दिखे – देखो 17 घंटे अकेला गुफा में ये बाप रे बाप , जय हो शिव शम्भु।
विपक्ष को आलोचना का पूरा अधिकार है किन्तु ऐसी आलोचना भी क्या काम की जो आलोचना अपने को ही भस्म कर दे ? सेल्फ गोल कोई रणनीति नहीं होती है। महाभारत में एक अध्याय है जब कौरवों ने नारायण शस्त्र का प्रयोग किया और उसमे सबको भष्म होना ही था। रणनीतिकार कृष्ण ने सबको आगाह किया कि सर नीचे करो और नारायण पूजा करो जब तक शस्त्र की आग ताप कम न हो जाय। सन 2002 से मोदी नामक नारायण शस्त्र कार्यरत है अतः सीधी आलोचना के स्थान पर मोदी के मंत्रियों की आलोचना श्रेयकर होती पर मेरी कौन सुनेगा क्योंकि जो बच्चा जन सकता था वह तो जोगी बन गया है।

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