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Jun
04

व्यवसायिक बकरी पालन

व्यवसायिक बकरी पालन

व्यवसायिक बकरी पालन का पर्यटन हेतु महत्व -1
Commercial Goat Farming as Tourism Tool -1
भोजन पर्यटन विकास -11
Food /Culinary Tourism Development 14
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना – 397

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -397

आलेख – विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

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बकरी पालन भूमिका व लाभ तुलना

राष्ट्रीय ही नहीं उत्तराखंड में बकरी पालन अर्थव्यवस्था हेतु एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। भारत में 70 प्रतिशत भूमिहीन कृषि मजदूर व छोटे किसान बकरी पालन में संलग्न हैं। छोटे किसानों व अन्य हेतु बकरी पालन के कई लाभ मिलते रहे हैं। भारत में आज भी कई जंतु सामजिक छवि जुडी हैं जैसे सुअर पालन , मुर्गी पालन सवर्णों में आज भी ताज्य है। किन्तु बकरी पालन में कोई सामजिक बंधन जैसे धर्म , जाति , उप जाति , महिला या पुरुष नहीं जुड़े हैं। बकरी से औषधीय दूध , दही , मक्खन, गोबर के अतिरिक्त मांस तो मिलता ही है बकरी की खाल कई व्यवसायों में प्रयोग होती है।

अन्य जीवों की तुलना में बकरी पालन के कुछ लाभ

१- गरीब जो गाय भैंस नहीं पाल सकते उनके लिए बकरी पालन अधिक सरल है। कम क्रय लागत , कम मेंटेनेंस व्यय व बिक्रय लाभ अधिक भी है

२- बकरी पालन में कम जगह की आवश्यकता होती है।

३- बकरी मरखुड्या /मरखने व इकहत्या (एक ही हाथ से दुहा जाय ) नहीं होते हैं। अतः पालने , दूध दुहने में समस्या नहीं के बराबर है।

४- बकरी पालन हेतु कृषि खेत या भीमल , गूलर , खड़िक जैसे पादपों की आवश्यकता नहीं पड़ती

५- घास हेतु जल की आवश्यकता नहीं पड़ती या बकरी स्नान , पानी पिलाने हेतु निकट जल स्रोत्र आवश्यक नहीं है तथापि बंजर क्षेत्र , पहाड़ी क्षेत्र में भी बकरी पाली जा सकती है

६- बकरी को चराने के लिए निकट ही गौचर /चराई क्षेत्र आवश्यक नहीं है किसी भी वन में चारयि हो सकती है। बकरियां एक दिन में अधिक चल सकते है

७- बकरी चराने हेतु केवल बाघ , सियारों के अतिरिक्त कोई बड़ी सावधानी नहीं बरतनी पड़ती है जैसे बकरी का भेळ में गिरने /लमडने का भय कम होता है तो मजदूरी पर चरवाहे रखे जा सकते हैं जो दूध भी दुह सकते हैं व देखरेख भी कर सकते हैं ।

८- बकरी बेचना सदा ही सरल रहा है और सदा ही बाजार उपलब्ध रहा है आज भी बकरी को कैश क्रॉप जैसे कभी भी कहीं भी बेचा जा सकता है।

९- बकरी की उत्पादकशीलता अधिक होती है।

१० – बकरी पालन का व्यवसायिक भविष्य उज्जवल है। श्राद्ध छोड़ बकरी मांस भक्षण की कोई सामयिक वर्जना नहीं है। बकरी नास्ते , दोपहर भोजन व रात्रि भोजन सब समय भक्षण हो सकता है। इसी तरह बकरे मारने में कोई वर्जनाएं नहीं है। ब्राह्मण क्या उच्च वर्ग ब्राह्मण भी बकरी मार सकता है। भारत में कुछ क्षेत्र छोड़ बकरी भोजन में कोई जातीय बंधन नहीं है

११- मृत गाय , भैंस की कीमत नहीं के बराबर होती है किन्तु बकरी के साथ यह कमजोरी नहीं है। मृत गाय -भैंस को खड्यारना व लसोरना कठिन है किन्तु मृत बकरी का मांस बिकाऊ होता है याने मृत बकरी डिस्पोजेबल /उपयोगी होती हैं। थैंक गौड गौरक्षक बकरी रक्षा में अतिक्रमण नहीं करते।

१२- बकरी का बकर्वळ बिकाऊ है। बकर्वळ की डिस्पोजिबिलिटी गोबर से सरल है

१३- आधुनिक प्रजनन तकनीक उपलब्ध हैं व वाह्य स्पर्म गर्वाधान तकनीक सरल है

१४ -बकरी पालन में आधुनिक तकनीक उपलब्ध है

सबसे बड़ी कमजोरी

भारत में बकरी पालन से जुडी सबसे बड़ी कमजोरी है बकरी पालन में संगठित , व्यवसायीकरण न होना याने बकरी पालन को व्यापारिक /दुकानदारी दृष्टि से न देखना।

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