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Jun
05

मंदिरों , गुरुद्वाराओं के भंडारे/लंगर व भोग -प्रसाद भी भोजन पर्यटन अंग ही हैं

मंदिरों , गुरुद्वाराओं के भंडारे/लंगर व भोग -प्रसाद भी भोजन पर्यटन अंग ही हैं

Bhandra, Bhog from temples are Tourism oriented
भोजन पर्यटन विकास -14
Food /Culinary Tourism Development 14
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना – 398

Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -398

आलेख – विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

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अमूनन हिन्दू भारतीय पूजास्थलों में देवताओं को भोग लगाना व भक्तों हेतु भोजन व्यवस्था आम प्रचलन है। गुरुद्वाराओं में लंगर भी इसी विधान परम्परा का हिस्सा है।

जुहू के इस्कॉन में भोजन

जुहू मुंबई के इस्कॉन मंदिर में हर रविवार को भक्तों हेतु शुद्ध वैष्णवी भोजन पकाया जाता है और भक्तों से भोजन कीमत ली जाती है। दूर दूर से भक्त पर्यटक इस्कॉन मंदिर यात्रा करते हैं और भोजन कर ही लौटते हैं।

सिद्धबली मंदिर कोटद्वार में भी हर रविवार या अन्य दिन भंडारा होता है और भक्तों को मुफ्त भोजन दिया जाता है।

कोई गुरुद्वारा ऐसा न होगा जहाँ लंगर न लगता हो और भक्तों को भोजन न बनता जाय।

जलाराम मंदिरों में भी भंडरा होता है।

पहले गढ़वाल कुमाऊं में जब कोई परिवार जब देवस्थल जैसे सीम यात्रा कर लौटता था तो गाँव वालों व रिश्तेदारों हेतु भंडरा आयोजन करते थे। अब कई सामाजिक संथाएं किसी विशेष देवता के सामूहिक दर्शन बाद सामूहिक भंडरा आयोजन करते हैं। तिरुपति मंदिर में लड्डू भोग भी प्रसिद्ध भोग व प्रसाद है। यमनोत्री गंगोत्री में चावल भोग व प्रसाद भी प्रसिद्ध हैं

उपरोक्त सभी भोजन वास्तव में पर्यटनोगामी हैं।

हरिद्वार आदि स्थलों में आश्रमों द्वारा डे भोजन भी पर्यटनोगामी हैं।

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देव हेतु भोग व भक्तों हेतु प्रसाद

तकरीबन हर देवतषल में देव हेतु विशेष भोग चढ़ाना या चढ़ावा चढ़ाना आम प्रचलन है। यही ब्भोग बाद में प्रसाद रूप में भक्तों में बनता जाता है। सिद्धबली व अन्य नागराजा मंदिरों में गुड़ या भेली चढ़ाया जाता है। बद्रीनाथ में चावल भोग होता है जो प्रसाद रूप में भी बनता जाता है। ग्राम देवताओं को रोट भोग चढ़ाया जाता है।

उपरोक्त सभी प्रकार के उदाहरण भोजन द्वारा पर्यटन विकसित होने के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

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Copyright @ Bhishma Kukreti , 5 /6 /2019
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