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Jun
09

जसपुर का नागराजा शिल्पकारों ने स्थापित किया और सवर्णों ने अधिगृहीत किया

जसपुर का नागराजा शिल्पकारों ने स्थापित किया और सवर्णों ने अधिगृहीत किया
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भीष्म कुकरेती
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मल्ला ढांगू में जसपुर , बड़ेथ , ढौंर , ढासी , खै ंडुड़ी प्राचीन गाँवों हैं व इनका अपना इतिहास भी है। जसपुर कुकरेतियों का मूल गाँव है जहां कुकरेती चौदवीं सदी में बसे। मेरे ऐतिहासिक विश्लेषण से लगता है जसपुर का नाम कसगांव (हो सकता है खसगाँव भी रहा हो। ढांगू पर आम गढ़वाल की भांति खस प्रभुत्व था बाद में ब्राह्मणों व राजपूतों ने प्रभुत्व जमा लिया।
जसपुर (ग्वील वालों पूर्वज गाँव ) सदा से ही शिल्पकार बाहुल्य गाँव रहा है और जसपुर शिल्प की प्रसिद्धि पहले श्रीनगर व ततपश्चात टिहरी तक भी थी। जसपुर के घांडी , हुक्का की प्रसिद्धि तो सन अस्सी तक भी थी जब तक स्व गैणू राम आर्य ज़िंदा थे।
एक समय ऐसा आया बल जब जसपुर या कहें मल्ला ढांगू टमटा परिवार कमजोर पड़ गए थे (ग्वील बस गया था ) और सुनार परिवार कोई न था। तब ग्वील के पधान (स्व मस्तराम /अम्बिका दत्त के दादा जी ) ने टिहरी गढ़वाल के चन्द्रवदनी क्षेत्र के एक सुनार /टमटा परिवार को जसपुर में बसाया। इस समय की पीढ़ी श्री महिपाल व श्री देवराज का कहना है कि उनके मूल पुरुष ने ग्वील पधान से जमीन खरीदी थी। जो भी हो मेरे आकलन से यह परिवार 1890 के आस पास ही जसपुर में बसा होगा। याने यह परिवार जसपुर में बहुगुणाओं व ठंठोली कण्डवालों के पश्चात ही बसे। होंगे।
सन 1970 परिवार में स्व खिमा नंद शाह सुनार , जयानंद आर्य टमटा रूप में व लखनऊ में श्री कालिका प्रसाद सरकारी प्रशासक प्रसिद्ध हुए।
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जसपुर -ग्वील -ढांगळ क्या अन्य कुकरेतियों के कुल देवता ग्विल्ल थे व इसका मंदिर अविभाज्य जसपुर के गौड़धार (टंकाण ) में था। बाद में ग्वील जसपुर बिभाजन बाद जसपुर में ग्विल्ल मंदिर ठटगळ /डंगुल्ड के नीचे स्थापित किया गया। आज भी ग्विल्ल की पूजा करते वक्त ब्राह्मण /गुरु /जागरी मंदिर में प्रवेश नहीं करते अपितु कोई जसपुर के मूल कुकरेती ही मंदिर अंदर पूजा करता है। कहा जाता है कि पूर्वज ग्विल्ल (प्रतीक सांप , त्रिशूल आदि प्रतिमा ) काली कुमाऊं से लाये थे।
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जहां तक नागराजा मंदिर का प्रश्न है अभिभाज्य जसपुर -ग्वील में कोई नागराजा मंदिर न था। जब चन्द्रबदनी क्षेत्र के सुनार /टमटा परिवार जसपुर में बस गए तो कुछ समय उपरान्त वे अपने मूल गांव से नागराजा प्रतीक सांप त्रिशील लाये और आज के नागराजा धार में इस प्रवासी परिवार ने एक बहुत ही छोटा नागराजा मंदिर स्थापित किया। पहले पहल केवल शिल्पकार ही नागराजा पूजा करते थे किन्तु बाद में बहुगुणा परिवार के आग्रह पर इस शिल्पकार परिवार ने नागराजा मंदिर अधिगृहित किया। श्री महिपाल व देवराज ने केवल इतना बतलाया कि बाद में बहुगुनाओं ने मदिर का स्वामित्व ले लिया पुजारी बन गए।
किन्तु श्री ललित बहुगुणा अनुसार बहुगुणा परिवार ने सुनार /टम्टा परिवार को सोने का धगुल देकर नागराजा मंदिर अधिग्रहित किया वा पुजारी बन गये। जो भी हो मंदिर गर्भ गृह में शिल्पकारों का प्रवेश बंद हो गया। बहगुणाओं के प्रेरणा से गाँव वालों ने मंदिर को कुछ बड़ा किया (आम मकान जैसा छोटा ) आज तो मंदिर सर्वथा बड़ा हो गया व बड़ा परिवर्तन किया गया है।
श्री ललित बहगुणा व स्व शत्रुघ्न बहुगुणा अनुसार कुछ समय बाद बहुगुनाओं के ग्वील में भी नागराजा मंदिर स्थापित किया गया.

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