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Aug
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भाजपा का महात्मा गाँधी की छवि छीनने का प्रयत्न

भाजपा का महात्मा गाँधी की छवि छीनने का प्रयत्न

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भीष्म कुकरेती
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हमारे जीवन में छवि का बहुत महत्व है। राजनीति तो छवि का ही खेल। प्रत्येक राजनैतिक दल किसी न किसी प्रतीक को धोता है और अपनी छवि को जिन्दा रखता है है या उस छवि को विकसित करता रहता है। तामिलनाडु में द्रविड़ दल एना रामास्वामी पेरियार की छवि को अपने दल में समाये रहते हैं तो मायावती बाबा साहेब आंबेडकर की छवि पर अधिकार समझती है। समाजवादी पार्टियां भी किसी न किसी छवि को अपना आधार बनाये रहते हैं।
कॉंग्रेस के पास तो स्वतंत्रता आंदोलन का आधार है तो कॉंग्रेस अपनी छवि के साथ स्वतन्त्रता आंदोलन प्रतीक को अवश्य ही जोड़ती है। साथ साथ में कॉंग्रेस अपनी राजनैतिक छवि को सुदृढ़ करने हेतु नेहरू गाँधी की छवि को जोड़े रहती ही है। नेहरू गाँधी के दो अर्थ हैं नेहरू और महात्मा गांधी और नेहरू व इंदिरा गाँधी।
भाजपा के पास स्वतन्त्रता आंदोलन का आधार इतना बड़ा आधार नहीं है कि भाजपा इसे आधार बनाये या अपने साथ जोड़े । शायमा प्रसाद मुखर्जी या दीं दयाल उपाध्याय अथवा अटल बिहारी बाजपेयी राष्ट्रिय स्तर के प्रसिद्ध नेता हुए हैं किन्तु वे इतने बड़े नेता न थे कि प्रत्येक भारतीय के मन में छवि बना सकें। अतः भाजपा को स्वतन्त्रता आंदोलन संबंधी छवि वाले नेताओं की आवश्यकता स्वाभाविक है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी व उनके थिंक टैंक राजनैतिक छवि निर्माण या छवि को साथ रखने में संवेदनशील हैं व बड़ी सावधानी बरतते हैं। नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने भाजपा को सरदार पटेल से जोड़ने की सबसे ऊँची प्रतिमा स्थापित करने की शुरवात कर ली थी। आज सरदार पटेल को भाजपा से जोड़ा जाने लगा है और कॉंग्रेस को ऐसी स्थिति में ला दिया है कि कॉंग्रेसी खुले मन से सरदार पटेल को कॉंग्रेस की धरोहर नहीं मानते जिसके पीछे कॉंग्रेस ही दोषी है जिसने नेहरू व नेहरू परिवार को सर्वाधिक प्रचार दने का कार्य किया। भाजपा ने कॉंग्रेस के लिए ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि धीरे धीरे कॉंग्रेस से सरदार पटेल का पल्ला छूट जाएगा और भाजपा सरदार पटेल से पललबन्द करते नजर आएंगे।
महात्मा गांधी अधिक काल के भगवान है जिसकी छवि हर कोई अपनी धरोहर बनाना चाहता है। भाजपा , राष्ट्रिय स्ययं संघ के पास गाँधी से संबंध बनाने का कोई मूल भी नहीं है और ना हो कोई तर्कसंगत इतिहास। किन्तु भाजपा को भारत में सालों तक जड़े जमाना है तो महत्मा गांधी से जुड़ना व जवाहर लाल नेहरू की छवि कमजोर करना आवश्यक है। भाजपा द्वारा नेहरू की छवि को पृष्ट भूमि में डालना छवि -प्रबंधन की दृष्टि से बिलकुल सही कदम माना जायेगा। भाजपा सरकारें जवाहर लाल नेहरू की छवि को किसी न किसी तरह पृष्ठभूमि में डालने का कार्य करती रहेगी।
जहाँ तक महत्मा गाँधी की छवि का प्रश्न है हर राजनैतिक दल महत्मा छवि को अपने साथ जोड़ना चाहेगा। भाजपा का सम्पूर्ण भारत में लम्बे समय तक जड़े जमाने हेतु भी भाजपा का महात्मा गांधी के साथ जुड़ना आवश्यक है।
भाजपा को वास्तव में कॉंग्रेस से महत्मा गाँधी की छवि को छीनना पड़ेगा इसके अतिरिक्त भाजपा के पास कोई विकल्प भी नहीं है केवल एक ही विकल्प है कॉंग्रेस से महात्मा गांधी की छवि छीनना।
भाजपा को पता है महत्मा गांधी की छवि को भाजपा से सुगमता से नहीं जोड़ा जा सकता। इसके लिए नरेंद्र मोदी व अमित शाह ने रणनीति घोषित भी कर दी है।
महात्मा गाँधी की 150 वें जन्म जयंती के उपलक्ष में दो अक्टूबर से 31 दिसंबर तक भाजपा नेता सारे भारत में स्थल स्थल पर जाकर गांधी विचारों का प्रचार करेंगे। चूँकि कॉंग्रेस सघन कार्यकर्ता विहीन हो गयी है तो वह ऐसे कार्क्रम करेगी नहीं तो भाजपा द्वारा महत्मा गाँधी विचार कायक्रमों का आयोजन कुछ नहीं अपितु महात्मा गांधी की छवि को भाजपा से जोड़ने की सकारात्मक रणनीति है और सम्भवतया भाजपा इस रणनीति में सफल भी होगी। भाजपा को गाँधी विचार प्रचार कार्यक्रमों से कई लाभ है। एक तो महात्मा गाँधी की छवि युवाओं के मन में भाजपा से कहीं न कहीं जुड़ जाएगी , दूसरा लाभ यह है कि भाजपा को जनता से संवाद बनने हेतु कोई साधन मिल रहा है और कॉंग्रेस को कमजोर करने का लाभ तो मिलेगा ही।
कॉंग्रेस की लाचारी है कि अभी उनके पास कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष ही नहीं है तो भाजपा द्वारा गाँधी को भाजपा से जोड़ने की रणनीति के विरुद्ध कुछ भी करने में असमर्थ रहेगी।

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