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Sep
11

सिलोगी बजार विकास : ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा पर्यटन उदाहरण 

सिलोगी बजार विकास : ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा पर्यटन उदाहरण 
Silogi Market : Example of  Development of Education Tourism in  Rural Uttarakhand उत्तराखंड में शिक्षा पर्यटन संभावनाएं  – 7 
Education Tourism  Development in Uttarakhand -7 
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -  410
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management – 410 
आलेख -      विपणन आचार्य   भीष्म कुकरेती 
- सिलोगी मल्ला ढांगू पौड़ी गढ़वाल  का एक महत्वपूर्ण स्थान है जो लंगूर, डबरालस्यूं , बिछला  ढांगू व मल्ला ढांगू पत्तियों का मिलन स्थल भी कहा जा सकता है।  सिलोगी नाम कैसे पड़ा कोई नहीं बता सकता है किन्तु सिल्ल याने ठंडा व छायादार जगह का गुण सिलोगी के नाम पड़ने के पीछे अवश्य है।  सिलोगी एक 5000  फ़ीट ऊँची पहाड़ी  है जहाँ से  उत्तर में चौखम्भा पहाड़ियां , मसूरी  , व दक्षिण में माबगढ़ आदि पहाड़ियां दिखती है।  पहाड़ी पर कुछ चौरास भी है और दर्शनीय स्थल है।   सन 1923 तक सिलोगी जल्ली (आज कड़ती कांडे ) ग्राम सभा के अंतर्गत खेत वाली जगह थी और गेंहू व दालों हेतु प्रसिद्ध स्थल था।  शायद कड़ती -कांडे वालों के बूसड़ व गौशाला रहे होंगे।     ग्वील मल्ला ढांगू के संत सदानंद कुकरेती जी को ब्रिटिश अत्याचार के कारण विशाल करती का सम्पादन छोड़ना पड़ा और वे चैलूसैण  (डबरालस्यूं ) में एक मिसनरी स्कूल में पढ़ने आ गए।  किन्तु पादरी द्वारा हिन्दू शिल्पकारों का धर्मान्तर करवाने से संत सदानंद कुकरेती ने स्कूल छोड़ दिया और डबरालस्यूं के बिष्ट जी , डबराल जी , लंगूर के पसबोला जी , बदलपुर के हरिराम जखमोला के साथ उन्होंने सिलोगी में मिडल स्कूल (5 वीं से 7 वीं तक ) खोला।  स्कुल के भवन हेतु मल्ला ढांगू के शिल्पकारों ने दान में स्कूल चिना व अन्य लोगों ने कई तरह के दान दिया।  स्कूल को कड़ती -कांडे वालों ने खेत व वन दे दिए।    संत सदानंद जी का कुछ समय बाद इंतकाल हो गया और धनाभाव के कारण स्कूल बंद हो गया।  बाद में ग्वील के ही स्व नंदा  दत्त कुकरेती ने स्कूल को पुनर्जीवित किया और सन 1952 में इसे हाई स्कूल की मान्यता दिलाई।  नंदा दत्त कुकरेती याने ‘मैनेजर साब ‘ ने सिलोगी में एक टेक्निकल स्कूल भी खोला था जो चल न स्का।  सं 80 के बाद सरकार ने स्कूल को अपने हाथ में लिया व इंटर कॉलेज में उच्चीकृत किया।  लंगूर , डबरालस्यूं , ढांगू , उदयपुर में मिडल स्कूल न होने के कारण इन  पत्तियों के छात्र सिलोगी स्कूल में पढ़ने आते थे व विद्यार्थी छात्रावास में रहते थे। जब तक सिलोगी स्कूल सरकार के हाथ में नहीं गया क्षेत्र के लोग चुनाव द्वारा निर्मित कमेटी से स्कूल संचालन करते थे।     स्कूल खुलने से सिलाई पर्यटक स्थल बनता गया।  निकटवर्ती गाँवों बागों , बड़ेथ , कड़ती , जसपुर , घनसाली , पाली आदि गाँव वालों ने दुकाने निर्मित कीं  व मकान बनाये जहां छात्र व शिक्षक वास कर  सकें।  बागों के सुर्रा लाला , कड़ती के सूबेदार गोबरधन प्रसाद सिल्सवाल , जसपुर के सेठ विष्णु दत्त जखमोला , बड़ेथ के खेम सिंह  आदि ने दूकान व वास हेतु मकान निर्मित किये इसी तरह पाली के सुनारों ने भी दूकान ही नहीं अपितु मकान भी निर्मित किये।  घनसाली के दुकानदारों ने बजार को नया आयाम दिया।  जसपुर के तीन भाइयों ने सुनार की दूकान निर्मित किये , मल्ल के जोगेश्वर कुकरेती ने भी दूकान निर्माण किया।  बागों के कई लोगों ने दुकाने व मकान निर्मित किये।    दूकान खुलने से सिलोगी क्षेत्रीय मंडी बनता गया व मकानों में छात्र विशेषतः शिल्पकार (इनके लिए छात्रावास न था ) व शिक्षक सपरिवार रहने लगे।     दुकानों के खुलने से दुग्गड़ा से सेल्समैन घोड़ों पर बिक्री हेतु सिलोगी आने लगे रात भी बिताने लगे।     छात्रों , छात्रों के अभिभावक व अन्य पर्यटकों /खरीददारों हेतु चाय , नास्ता , भोजनालय व कई महत्वपूर्ण वस्तुएं सुलभ होने से ढांगू के लोग बार बार सिलोगी आने लगे और धीरे गांवों से छोटे दूकानदार भी यहाँ से होलसेल में सामन खरीदने लगे और बड़ा बजार बनता गया।  आज भी बड़ा बजार है। सिलोगी की सबसे बड़ी कमी हिअ की यहाँ जल की भरी कमी है। हमारे समय हम छात्र सुबह सुबह एक मील नीचे कांड वालों के धारे में  नित्य क्रम हेतु जाते थे।  सभी इसी धारे से जल लाते थे।  अब आधा मील दूर छप्या से पानी सुलभ है.
   यदि जल सुलभ हो जाय तो सिलोगी में कई अन्य तकनीक संस्थान भी खुल सकते हैं क्योंकि जलवायु व भौगोलिक स्थिति स्वास्थ्यपूर्ण है बस जल संकट दूर होना चाहिए। जगह की कोई कमी है है स्थल विस्तार हेतु। उपरोक्त सूचना से हम निम्न निष्कर्ष निकल सकते हैं कि ग्रामीण स्थल में शिक्षा पर्यटन कैसे विकसित हो सकतेा है -        आधारभूत संरचना का सुलभ होना - शिक्षण संस्था जो क्षत्र में न उपलब्ध हो। जैसे सदा नंद कुकरेती ने स्कूल स्थापित किया व अन्य शिक्षितों ने फ्री में अध्यापक बनना स्वीकार किया   छात्रों हेतु छात्रालय छात्रों हेतु खान पान व मकान की व्यवस्था छात्रों के अभिभावकों हेतु बजार का निर्माण समाज द्वारा दुकान व रहवास का निर्माण समाज द्वारा शिक्षण संस्था खोलने में पूरा सहयोग जैसे कड़ती वालों ने खेत दान व अन्य लोगों द्वारा दान सहयोग   समाज द्वारा शिक्षण संस्थान का विकास जैसे नंदा दत्त कुकरेती ने स्कूल को पुनर्जीवित किया व हाई स्कूल में परिवर्तित किया समाज द्वारा स्कूल प्रबंधन संचालन – समाज का योगदान सरकार का सहयोग याने समय समय पर स्कूल का विकास (उच्चीकरण आदेश व सरकारीकरण ) 
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