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Sep
20

साहित्य अनुवाद से  लाभ अर चुनौतियां 

साहित्य अनुवाद से  लाभ अर चुनौतियां 
(  डा.  उमेश चमोला की आगामी पुस्तक संर्दभ    )   
  विमर्श  - भीष्म कुकरेती 

  शिक्षाविद , गढ़वाली साहित्यकार डा उमेश चमोला की आगामी पुस्तक  नामी गिरामी साहित्यकार लिओ टॉलस्टॉय की कथाओं अनुवाद च।  ये संदर्भम यु जरूरी च बल गढ़वाली साहित्यकार एक हैंकाक दगड़ साहित्य अनुवाद पर  छ्वीं बथ लगवान , चर्चा कारन , कछेड़यूं म बहस कारन बल गढ़वळि वास्ता विदेश साहित्यो अनुवाद कथगा आवश्यक च , क्या क्या चुनौती छन अर क्या क्या सावधानी बरतेण आवश्यक छन।    उन आधुनिक गढ़वाली गद्य की पवाण  ही बल अनुवाद से लग जब ईसाई मिशनरियोंन ईसाई साहित्य को गढ़वाली म अनुवाद कराई बल 1800 का लग्गाबग्गी।  बुले जांद बल गोविन्द घिल्डियालन हितोपदेश का गढ़वाली अनुवाद प्रकाशित कौर छौ ।   पद्य साहित्य म तो संस्कृत साहित्य भौत अनुवाद ह्वे , विदेशी  नाटकों अनुवाद बि ह्वे , गीतेश नेगी न अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विदेशी कवियों अनुवाद कार अर विमल नेगी व महेश नंद न बंगला ‘गीतांजलि ‘ को अनुवाद कार। बुलणो  मतलब या च बल गढ़वाली म अनुवाद नयो विधा नी च।  हाँ विदेश भाषाओं साहित्य कम इ अनुवाद ह्वे या बात बि सत्य च बल।     जख तलक विदेशी भाषा साहित्य सवाल च ये साहित्य अनुवाद से भौत कुछ लाभ छन।   विदेशी भाषा साहित्य से हम वे देशक क सिद्धांत , आदर्शों व आदर्शों  अर आस्था से सामना करदवां।     गढ़वाली साहित्य तै नया प्रकार का विषय , प्लाट , विधा , स्टाइल मीलल जो गढ़वाली म संभव नी च ।     गढ़वाली साहित्य तै नई ऊर्जा मिलली – यदि गीतेश नेगी द्वारा अनुदित काव्य तै पढ़े जाव अर यूं कविताओं को प्रचार प्रसार हो तो भौत सा कवि स्टीरिओ टाइप विषय या  शैली से भैर ऐ जाला।    इनि  गीतांजलि अनुवाद को  प्रचार से गढ़वाली साहित्य तै नयो अनुवाद मीलल।      अनुदित विदेश साहित्य से स्वदेसी भाषाम (इखम गढ़वाली ) जड़ता inertia खतम हूंद अर नया नया प्रयोग अफि मिल जांदन जौं से प्रेरित ह्वेक स्वदेसी साहित्यकार बि प्रयोग करण लग जांदन। अनुदित साहित्यन शब्द कुठार बढ़द।  भौत सा नया साहित्यिक शब्द जन शेक्सपियर का नाटकों म मिल्दन वो बंबास्टिक क्लासिकल शब्द / अलंकार , कहावत , पहेली  व शैली स्वदेसी भाषा ( इखम  गढ़वाली भाषा ) तै मिल्दन।    नया साहित्यकारों वास्ता सीखणो आधार हूंदन अनुदित साहित्य।   अनुदित साहित्य न नया बँचनेर व नया लिखंदेर मिल्दन।    हाँ विदेशी साहित्य अनुवादक समिण भौत सी चुनौती बि छन जन कि भौति ऊपरी संस्कृति दर्शाण म कठिनाई या अप संस्कृति कु संक्रामक रोग लगणो अंदेसा।    भौत दां  अर्थ कु कुनर्थ को अंदेसा यदि अनुवादक ठीक से अनुवाद नि कौर जाण।    स्वदेसी भाषा पाठकों तै  भौत दै  अनुवाद समझ ही नि ांडो किलैकि द्वी संस्कृतियूं म भौत अंतर्  हूंद।    चुनौती छन किन्तु निदान च बल सावधानी पूर्वक साहित्य कु अनुवाद हो त स्वदेसी भाषा तै लाभ ही लाभ च विषेशकर गढ़वाली भाषा जन 
  
   

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