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Jan
13

ढांगू , हिमालय की  पाषाण उत्कीर्णन कला व कलाकार 

ढांगू , हिमालय की पाषाण उत्कीर्णन कला व कलाकार

ढांगू गढ़वाल संदर्भ में हिमालय की लोक कलाएं व लोक कलाकार श्रृंखला – 10
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प्रस्तुति – भीष्म कुकरेती
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ढांगू पट्टी , पच्छिमी , दक्षिण पौड़ी गढ़वाल (हिमालय ) में कुछ समय पहले तक कई तरह की पाषाण संबंधी कलाएं जीवित थीं व कुछ आज भी विद्यमान हैं।
ढांगू पट्टी , पच्छिमी , दक्षिण पौड़ी गढ़वाल (हिमालय ) पाषाण शिल्प व कलाओं के बारे में निम्न ब्यौरा प्राप्त हुआ है
ढांगू (हिमालय ) के घरेलू पाषाण पात्र या उपरकरण
पाषाण पयळ/गहरी थाली – भूतकाल में स्वतन्त्रता से कुछ समय पहले तक रसोई संबंधी पात्र जैसे पाषाण थाली (पयळ ) भी ढांगू (हिमालय ) में निर्मित होते थे। पळयो आदि रखने हेतु पयळ सही पात्र होता था। इसके अतिरिक्त मवेशियों को पींड (भोजन ) आदि खिलने हेतु भी पयळ सही पात्र था। पयळ के कलाकार वे ही होते थे जो सिल्ल बट्ट , दास (टोड़ी ) या छज्जा निर्माण करते थे. या छत पत्थर के कलाकार भी पयळ उत्कीर्ण कर सकते थे।
पाषाण ओखली (उरख्यळ ) निर्माण – अधिकतर प्रत्येक गांव में प्रत्येक परिवार की पाषाण ओखली या काठ की ओखली होती थी। पाषाण ओखली हेतु पत्थर छत के पत्थर व छज्जे के दास की खानों से ही मिलता था और वही कलाकार होते थे जो पत्थर निमाकलने व उत्कीर्ण के कलकार होते थे।
सिल्ल बट्ट – पाषाण काल से चले आ रहे इस उपकरण का महत्व आज भी है यद्यपि मिक्सर गरिन्द्र से सिल्ल बट्ट प्रयोग पर प्रभाव अवश्य पड़ा है किन्तु महत्व है ही। सिल्ल बट्ट हेतु पत्थर खान (पख्यड़ खांडि ) लगभग वही खाने होतीं थी जो ओखली , दास (टोड़ी ) , छज्जे के पत्रों हेतु होती थीं और सिल्ल बट्ट निर्माण के व्ही कलाकार होते जो अन्य पाषाण उपकरण उत्कीर्ण करते थे। यही कलाकार बाद में खरल व मूसल के चिकने होने पर छीलते भी थे।
खरल या इम्मा दस्ता (Mortar ) प्रयोग – ढांगू में ठंठोली , गडमोला , नैरूळ -कैन्डूळ , वाड़ , गैंड ,झैड़ , मित्रग्राम -कठूड़ आदि गाँवों में वैद्य होते थे जिन्हे आयुर्वेदीय औषधि पीसने या मिश्रित करने हेतु पाषाण खरल की आवश्यकता पड़ती थी। पाषाण खरल निर्माता भी वही होते थे जो सिल्ल बट्ट , ओखली का उत्कीर्णन करते थे या छज्जा निर्माण कलाकार।
पाषाण चक्कियों का प्रयोग – कुछ समय पहले ढांगू के प्रत्येक घर में एक जंदुर /चक्की का होना आवश्यकता थी। अनाज पीसने हेतु एक आवश्यकता थी व अधिकतर रसोई घर में चक्की बिठाई जाती थी। इसी तरह जहां गधेरे हों वहां पनचक्की भी आवश्यकता थीं। पन चक्कियां अधिकतर पधान, सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत एक चक्की निर्मित करवाते थे व चक्की चलाने हेतु किसी चक्कीवान परिवार को दे देते थे जो चक्की की देखरेख , मरम्मत भी करता था व पिसाने वालों से आटा लेकर आजीवका चलता था। बहुत से व्यक्ति स्वयं भी गदन तट पर चक्की निर्माण करते थे व चक्की को आजीविका साधन बनाते थे। अब दोनों प्रकार की छक्के अप्रासंगिक होती जा रही हैं। अधिकतर चक्की के पाटे , ओखली व और छज्जा खान से उत्कीर्ण होते थे अतः चक्की /पनचक्की के पाट निर्माता भी वही होते थे जो छज्जा , ओखली व सिल्ल बट्ट निर्माता होते थे। चक्की बैठने का कार्य वही करते थे जो भवन निर्माण करते थे (मिस्त्री या ओड ) . हाँ चक्कियों को बाद में छिलाई हेतु स्थानीय कारीगर या कलाकार होते थे।
ढांगू (हिमालय ) में पत्थर की तकली – बहुत बार काठ की तकली के स्थान पर पत्थर की तकली भी प्रयोग होती थी। पाषाण तकली हेतु कड़क पत्थर का प्रयोग होता था और अधिकतर भवन निर्माता कालकर पाषाण तकली बना देते थे।
ढांगू (हिमालय ) में उड़्यार /गुफा में लेखन – यद्यपि कम ही उड़्यार /गुफा के पत्थरों में लेख मिले हैं हाँ कई उड्यारों में शिक्षा प्रसार के बाद उड्यारों के पत्थर पर बच्चे या शिक्षित अपना नाम या कुछ भी उत्कीर्ण कर देते थे या करते हैं। उड्यार पाषाण पर उत्कीर्ण हेतु पत्थर या , कूटी आदि से लिखाई की जाती है।
ढांगू (हिमालय ) में पाषाण देव प्रतिमाएं – पाषाण देव प्रतिमा जो भी होंगे वे प्राचीन या कम से कम सौ डेढ़ सौ साल पहले की प्रतिमाएं या प्रतीक होंगे। किन्तु ढांगू (हिमालय ) में इसका उल्लेख कम ही किया जाता कि फलां देव स्थल में पाषाण प्रतिमा लगाई गयी आदि। गोल ढुंग रखकर देव मूर्ति (प्रतीक ) समझी जाती थी। कहीं कही किसी गाँव में भैरव जैसे क्षेत्रपाल की पाषाण प्रतिमा दीवाल पर लगी हैं। इस दिशा में खोज की अति आवश्यकता है।
धार /मगर – कूल से पानी को नियम से गिराने हेतु ढांगू में भी पत्थर के धार या मगर का प्रयोग होता है। जहां तक अभी तक इस लेखक को जो भी सूचना मिली है उसके अनुसार ढांगू (हिमालय ) में पाषाण धार या पाषाण मगर गढ़वाल से बाहर से ही मंगाए गए हैं। जो धार लगवाता था (दान में ) वह धार के नीचे पत्थर पर शिलालेख भी उत्कीर्ण करवाता था उदाहरणार्थ जसपुर में मथि धार के धार को स्व लोकमणि बहुगुणा ने लगवाया था और शिला पर कुछ या उनका नाम उत्कीर्ण था (संस्कृत में ) . यह खोज का विषय है कि शिलालेख भी बाहर ही खुदवाया गया था या किसी स्थानीय कलाकार ने लेख खुदाई की थी।
वास्तु शिल्प हेतु पाषाण प्रयोग – गढ़वाल की भाँति ही ढांगू में भी मकान निर्माण हेतु कई प्रकार के पत्थरों की आवश्यकता पड़ती थी
छत के पत्थर हेतु सिलेटी पत्थर – ऐसे पत्थरों हेतु खाने होतीं थी और उन खानों से पत्थर निकालने वाले व उन्हें अकार में काटने का कार्य विशेष कलाकार करते थे।
छज्जे – छज्जे की खाने ढांगू में कम ही थीं याने उपयोगी पथ्हर न थे तो छज्जे व चक्की पाषाण हेतु पैडलस्यूं पर निर्भरता थी।
छज्जे के दास या टोड़ी हेतु तथर – अधिकतर छत के पटाळ की खानों से ही दास मिल जाया करता था अन्यथा पैडळस्यूं पर निर्भर।
मकान चिनाई हेतु पत्थर – मकान चिनाई में कई तरह के पत्थरों की आवश्यकता पड़ती है। पत्थरों हेतु मकान वाला अपने खेतों में विद्यमान पत्थर खान या किसी अन्य से मांगकर पत्थर खान से उपयोगी पत्थर निकलते थे। पत्थर निकलने वाले भी कुछ ना कुछ हिसाब से ट्रेंड ही होते थे।
पहाड़ी खेतों की दीवाल या अन्य दीवालों आदि हेतु भी पत्थरों का उपयोग करते थे।
कभी कभी पाषाण कलाकार बच्चों हेतु पत्थर से खिलोने भी बनाते थे। किन्तु कम प्रचलन था।

कहा जा सकता है कि ढांगू पाषाण कला के मामले में हिमलाई क्षेत्र की पाषाण कला समझने हेतु एक सही उदाहरण है। ढांगू में वे सभी पाषाण कलाएं मिलती हैं जो कलाएं हिमालय के अन्य स्कूटरों में मिलते हैं।

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