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Jan
14

वायु, पित्त अर कफ

 

 

वायु, पित्त  अर  कफ   

 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  

 

(महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )

 खंड – १  सूत्रस्थानम 

अध्याय १५९  बिटेन  – ६६ तक 

अनुवाद भाग -    

अनुवादक - भीष्म कुकरेती 

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )

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!!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 

वायु का लक्षण -वायु रूखी, शीत , छुटि , सूक्ष्म , गतिशील , अविच्छिल , अर  कठोर च।  या एक विपरीत /विरोधी गुण  वळ स्निग्ध , उष्ण, गुरु , स्थूल, स्थिर , पिच्छिल , अर कुंगळ /मृदु द्रव्यों से शांत हूंद।  ५९

पित्त का लसखन -

पित्त थुड़ा स्निग्ध , गरम , तीक्ष /   शीघ्र कार्य करण  वळ ,  स्यूणो  टुपणा  जन तीक्ष्ण, द्रव , अम्ल/खट्टो , गमनशील व कटु  रस च।  ६०

कफ को लक्षण -

गुरु , शीत , मृदु , स्निग्ध, स्थिर अर  पिच्छिल यी कफौ  गुण  छन विपरीत गुण  वळ  पदार्थों से कफ शांत ह्वे   जांद ।  ६१ ।

विपरीत गुण  वळ द्रव्यों क देश (स्थान ), मात्रा अर  कालौ  अनुसार योजनाबद्ध रूप से औषधि दीण से साध्य व्याधि शांत ह्वे  जांद, असाध्य व्याधि  शांत नि  हूंदन।  अर  जु  रोग औषध्यूं  कुण  असाध्य छन ऊंकुण  औषधि उपदेस नि  दिए जांद।  यांक अगवाड़ी विस्तार से एक एक द्रव्यौ   गुण  कर्म क बाराम आचार्य ब्वालल।  ६२, ६३ ।

रसनेंद्रियों से  ग्राह्य गुण  रस च।  ये रस्क आधार जल अर पृथ्वी छन।  ये रसौ  भेद करणम अगास , वायु अर  अग्नि यी तिन्नी  निमित्त कारण हूंदन।   वास्तवम रस कु उतपति स्थल जल च  अर  पृथ्वी एक आधार च।  ६४ ।

अर   संक्षेप म स्वादु , मधुर , अम्ल, लवण , कटु , तिक्त  /तीखो  अर कपाय  छह रस छन।  यूंक  विस्तार से यी  ६३   भेद /पृथक पृथक ह्वे  जांदन।  ६५ ।

स्वादु , अम्ल अर लवणौ  रस वायुक शमन करदन।  कपाय , मधुर अर तिक्त रस पित्त तैं , कपाय , कटु अर तिक्त  रस कफ तै शमन करदन।  ६६ ।

 

 

संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल )

शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

 

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद ;

Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  first-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita

 

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