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Jan
15

द्रव्युं विभिन्न प्रकार

 

 द्रव्युं  विभिन्न प्रकार 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  

 

(महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )

 खंड – १  सूत्रस्थानम पैलो अध्याय  बिटेन ६७ – ७६  तक 

अनुवाद भाग -     

अनुवादक - भीष्म कुकरेती 

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )

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!!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 

 

द्रव्य भेद -

द्रव्य तीन प्रकारै  हूंदन – कुछ द्रव्य वात  आदि दोषों शोधन व शमन करदन जन कि -तेल वायु कु , घी पित्त कु , शहद कफ  कु  शमन करदो ।  कुछ द्रव्य स्वास्थ्य रक्षण करदन, यी स्वस्थ  अवस्था कुण  हितकारी छन   जन कि – लाल चौंळ , सांटी चौंळ , जीवन्ति शाक।  ६७ I

द्रव्य  पुनः तीन प्रकारै  हूंदन – १- जंगम  – प्राणियों से उतपन्न २- औद्भिद – परितवहि से उगण  वळ  वनस्पति ३ -पार्थिव /खनिज

जंगम द्रव्य – शहद , गोरस , दूध , घी आदि , पित्त , वासा , मज्जा , रक्त , मांस , विष्ठा, मूत्र , चर्म  , वीर्य , अस्थि , स्नायु , सींग , नख, खुर , केश , रोम , आदि जंगम बिटेन  लिए जांदन।  ६८ -६९ ।

भौम द्रव्य -

स्वर्ण , स्वर्ण मल (शिलाजीत ), पांच लौह (सीसा , रांगा , ताम्बा , चांदी अर  सिकता ) , बळु , चूना , पार्थिव विष , मनशिला, हरताल (मणि ) , गेरू , अंजन , यी पार्थव औषध छन।  औद्भिद द्रव्य  चार प्रकारै हूंदन – वनस्पति, वोरुत ,वानस्पत्य ,अर औषधि।  ७० -७१ ।

जौंमा बिन पुष्प का फल आंदन वो वनस्पति छन जन – तिमल , बेडु , बौड़ आदि।  जौंमा पुष्प अर  फल द्वी आवन  वो वानस्पत्य छन जन – आम , फळिन्ड आदि।  जु फल आण  पर नष्ट ह्वे  जांदन वो औषध ह्वे  जन ग्यूं -चौंळ  आदि।  जु लता जन फैलणा रौंदन वो विरुध  ह्वे , जन गिलोय।  ७२ ।

मूल , खाल/छाल, अंदरौ  सार  भाग  (सार ), निर्यास – गोंद , नाळ , )स्वरस ), थींची/कूटिक द्रव्य से निकाळयूं  रस, आम जामुन पत्ता (पल्लव ), दूध थॉर आदि (छार ), आदि क फल , पुष्प, भष्म , तैल , मिलायुं आदि, कांड ,पत्ता , शुंग , जु डा ळ  पर हूंदन , कंद आदि औदभिद्धद  हूंदन।  ७३ ।

जौं  वृक्षों मूल प्रयोग म आयी सकदन वो मूलिन  ह्वे।  इन वनस्पति सोळा  छन।  जौं वनस्पति फल काम ांदन वो फलनि छन अर  उन्नीस छन।  चार महासनेह -घी , तेल वसा , मज्जा।  पांच प्रकारौ लूण , आठ प्रकारौ मूत्र  अर  आठ प्रकारौ दूध ,ार संशोधन हेतु छह वृक्ष पुनर्वसु आत्रेय न बताई।  जु  विद्वान् वैद्य रोगों म यूँ सब्युं  प्रयोग करण जणदु  ह्वावो वो आयुर्वेद तै भली भांति  जणदु।  ७४ , ७५ , ७६ ।

 

संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल )

शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

 

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद ;

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