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Jan
20

आठ मूतों /मूत्रों गुण व कर्म अर दूधों गुण

 

 आठ मूतों /मूत्रों  गुण व कर्म अर   दूधों गुण 

Properties and Uses  of  Urine  and  Milk 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  

 

(महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )

 खंड – १  सूत्रस्थानम पैलो अध्याय  १००   बिटेन  १११ – तक 

अनुवाद भाग -   १४ 

अनुवादक - भीष्म कुकरेती 

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )

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!!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 

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आठ मूतूं  मध्य अलग अलग मूत्र  क गुण  इन छन -

ढिबर /भेद मूतो / मूत्र  गुण - ढिबरो  मूत  थोड़ा तिक्त , स्निघ्ध , अर  पित्त क अवरोधी (रुकण वळ )  होंद , वु  ना तो पित्त कम करदो ना इ  वृद्धि।

बकरी मूत्र , बखरौ मूत - कसैला अर  मिठु रस वळ , स्रान्तों  कुण  हितकारी हूंद ार त्रिदोष निवारक च।

गौड़ी मूत , गाय मूत्र – कुछ मिठो , दोष नाशक , कृमिमारक , हूंद।  ये तैं  पीण  से खज्जी /पीत  समाप्त हूंदन।  गौड़ी मूत वायु उत्पादित रोगों शमन म हितककारी च।

भैंसो मूत , भैंसो मूत्र - भैंसो मूत बबासीर , शोथ , उदर रोग शमन म  हितकारी हूंद . थोड़ा  खारो व मलभेदक च।

हाथी मुर , हस्ती मूत्र - हाथी मूत लुण्या , कृमि अर कुष्ठ रोगम पुरुषों कुण  हितकारी हूंद . अवरुद्ध मल-मूत्र /कब्ज , ॉस्क रोग , विष रोग , श्लेष्मा  जन्य रोग ,  बबासीर  म श्रेष्ठ च।

ऊँटो  मूत /मूत्र – थोड़ा तिक्त , कड़ो , स्वास , कास , अर्श रोगम  हितकारी च।

घ्वाड़ो  मूत तिक्त , कटु अर  कोढ़ , विष , ार व्रण  जन रोगों उपयोगी।

गधौ मूत /गधा मूत्र - गधा मूत मिर्गी , हिस्टीरिया , उन्माद म हितकारी हूंद .  १००- १०४

ये प्रकार से ये शास्त्र म सामन्य अर विशेष द्वी प्रकारों अर्थात मूत जन छन तन्नि  बताये गे।  अब  ान आठ प्रकारौ दूधों  कर्म अर गुण  पर बुले जाल – (१०५ ) -

अब आठ प्रकारौ  दूध -

भेड़ /ढिबरौ , बखरौ , गौड़ी , भैंसौ , ऊंटनी , हाथी, घोड़ी अर  स्त्रियों दूध (१०६ )

 

सब दूध प्राय: मधुर रस /मिठु , स्निग्ध , शीत , (माओं कुण )  दूध वृद्धिकारक , पुष्टिदायक ,  वृद्ध्य  (बाढ़ दायक ), वीर्य वर्धक , वृद्धि कुण  हितकारी , बदलदायक, मन प्रसन्न करंदेर ,  श्रमहारी (थकौट मारक ), खास , कफ छोड़ि  अन्य  कासों  तै मिटाण .  वळ . हूंद  I   दूध रक्त पित्त नाशक, टूटयां  तै जुड़न वळ हूंद।  सब प्राण्युं सात्म्य दोष नाशक , तीस नाशी , तपन वर्धक , क्षीण व कष्ट रोगियों कुण हितकारी , पांडु रोग , वात पित्त , शांप , गुल्म , अतिसार जौर , डाह , शोथ रोगों म विशेष कर  पथ्य च।  यौन रोगों , मूत्र कृच्छ , मलावरोध म  पथ्य हितकारी च।  दूध वात पित्त रोगियों कुण  बि  पथ्य च।  (१०७ – १११ )

 

 

संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021

शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

 

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