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Jan
21

दूध व छाल उपयोगी वृक्ष

  दूध व छाल  उपयोगी वृक्ष 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  

 

(महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )

 खंड – १  सूत्रस्थानम पैलो अध्याय ११२  बिटेन  – ११९  तक 

अनुवाद भाग -   १५ 

अनुवादक - भीष्म कुकरेती 

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )

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!!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 

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दूध कर्म्म -

यु दूध नस्य कर्मंम , अवगाहन (चिंतन मनन )  क्रिया म, आलेपन म ,उकै (वमन ) म , आस्थापन  म , बस्ति म , विरेचन म , स्नेह म , वाजीकरण आदि म उपयोग हूंद।  िखम आठ दूधों समय गुण कर्म्म  तै सामान्य रूपम बताये गे  अगवाड़ी प्रत्येक दूध क बारे म  कर्मानुसार बताये जाल ( सूत्र स्थान अध्याय  २७  ) I ११२ , ११३

अब शोधन म बुले गे छह वृक्षों मोदी तीनुं  दूध अर  तीनूं त्वचा ग्रहण करे जांद। यूं  मेड प्रथम तीन वृक्ष फलनि अर  मूलनी वनस्पतियों से भिन्न छन।   ऊंक नाम -  स्नुही (धोर, सेहुंड  ) , अर्क ( आक ) अर  अश्मंतक (मूँज जन )। अश्मंतक कु  दूध उल्टी (वमन ) म , स्नूही क दूध विरेचन म ार आक  को दूध द्वी -विरेचन व वमन म उपयोग करे जाण  चयेंद।  ११४ – ११५

दुसर  तीन वृक्ष छन  जौंकि छाल (त्वचा ) हितकारी  छन।   वूं  वृक्षों नाम – पुतीक (करंज ), कृष्णगंधा, अर तिल्वक (लोध्र ) छन ।  यूं मादे  करंज अर  लोध्र की  छाल विरेचन म उपयोग हूंद।  अर  कृष्णगंधा की छाल परिसर्प (वीमर्ष , एक्जिमा , त्वचा रोग ) म शोथ , अर्श रोग , दद्रु (दाद ), विद्रधि , गण्डमाला , कोढ़ , अर अल्जी  नाना रोगों उपयोग हूंद।  ११६- ११७ , ११८

यी मथ्याक वृक्षों  तैं शोधनकारक जाणो।

उपसंहार -

फलनि १९ , मूलनी १६ , स्नेह ४ , लवण ५ , मूत ८ , दूध ८ , अर  शोधन वृक्ष  ६ (परिष्करण म उपयोग ), जौंक दूध व छाल का आंद वु  बुले गेन ।  ११९

संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021

शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

 

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद ;

Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  first-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita

 

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