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Jan
22

वास्तविक वैद्य को च ? झोला छाप वैद्य पछ्याणक

 

 वास्तविक वैद्य को च झोला  छाप वैद्य पछ्याणक 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  

 

(महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )

 खंड – १  सूत्रस्थानम पैलो अध्याय  १२०  बिटेन १३०   - तक 

अनुवाद भाग -   १६ 

अनुवादक - भीष्म कुकरेती 

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )

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!!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 

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बखर , ढिबर, गोर चराण वळ अर अन्य  तपस्वी या भील  जु  बौण -वासिन्दा छन  यी औषधि नाम अर आकृति पछ्याण दा  छन।  १२०

मात्र औषध्यूं  नाम , रूप , योग -प्रयोगों जणन से बि क्वी  औषधि क सम्यक प्रयोग नि  जाण सकद।  इलै  स्जास्टर म यांक वर्णन हूंद।

जु  वैद औषध्यूं  नाम रूप अर ऊंको योग – प्रयोग  जणदु  च वु तत्वविद् छैं  इ  च, जु  वैद औषधयूं  तै सबि  भांति  समजद  वैकुण  त क्या बुले जाव ? अर  जु व्यक्ति प्रत्येक पुरुषक बल , सरैल , आहार , स्तर , सात्म्य , सत्व , प्रकृति , अर वे को विचार करिक देश (क्षेत्र )  , काल अर अर  मात्रानुसार औषधयूं तै जणदु  हो वो वेदों म श्रेष्ठ च।  १२१ , १२२ , १२३ ,

अजाण औषध्यूं  से हानि -

जै प्रकार अजाण विष , जै प्रकार शस्त्र , जै प्रकार आग , जै प्रकार बज्जर /बिजली  , मृत्यु कारण बणदन  उनी  नि जणि औषधि बि मृत्यु कारण ह्वे सकद अर नाम रूप अर गुणुं  से जणी  औषधि अमृत तुल्य च।  नाम , रूप अर गुण  से अनभिज्ञ औषध या देश -काल आदि विचार न करि देण  से अनिष्ट हूंद, वा भारी अनर्थ मचांदी ।  १२४ , १२५

तीक्ष्ण  प्राण नाशी विष बि सम्यक प्रकार से प्रयोग करण पर उत्तम औसधौ काम करद।  औषध बि अनुचित  प्रकार प्रयोग पर तीक्ष्ण  प्राण नाशक विषौ काम करदी।

इलै अनुचित रूपम प्रयोग करे जाण  वळि  औषधि  विषौ  सामान हूण   से आयु अर आरोग्य चाही बुद्धिमान व्यक्ति  तै देश , काल व मात्रा क विचार नि  करीं   औषध मूढ़ वैद्य से कबि  बि  नि उपयोग करण  चयेंद। १२६ , १२७

इन्द्रक हाथ से छुट्युं  बज्जर मनिखों मुंडम पोड़ जावो तो वैक बचण सम्भव च , किन्तु मूर्ख वैद्य दियीं  औषध रोगी तै समाप्त कर दींदी, वै  से बचण  असम्भव च। १२८

जु प्राज्ञमानी अफु  तै बुद्धिमान वैद्य गणन  वळ , औषध से अजाण  यदि दुखी , अचेत पड़्युं , वैद्य म श्रद्धा करण  वळ रोगी तै औषध द्यावो तो इन अधर्मी , विश्वासघाती , मृत्य सम  साक्छात  ज्यूंरा /यमराज अर दुर्मति , अज्ञानी व मूर्ख वैद्य दगड़  बचळ्याण बि मनिख नरकगामी ह्वे  जांद, तथापि स्पर्श /भिड़याण   से क्या नि होलु।   १२९ , १३०

 

 

 

संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021

शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

 

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