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Jan
24

सात्त्विक भाव का भाव

सात्त्विक  भाव  का भाव
 गढवाल म खिल्यां नाटक आधारित  उदाहरण 
Emotional   Sentiment  in Garhwali Dramas 
( इरानी , अरबी शब्दों क वर्जन प्रयत्न ) 
  

 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय – 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा -  60 

s  = आधी अ

भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती 

सत्वं  नाम मन प्रभवम् I

मनस: समाधौ  सत्त्वनिष्पत्तिभर्वति।।

७. ९३ कु  परवर्ती गद्य )

स्तम्भ:  स्वेदोsथ  रोमांच: स्वरभेदोsथ  वेपथुः I

वैवर्ण्यमश्च  प्रलय इत्यष्टो  सात्त्विका मता: ।  ।

०७। ९४ )

गढ़वाली अनुवाद व व्याख्या  –

अनुवाद – सत्त्व कु  संबंध मन से च , जन कर्ता  की समाधि मन से जुड़ जान्दि , तब सात्विक भावों उतपत्ति  हूंद (७, ९३ )

स्तम्भ , स्वेद, रोमांच , स्वर भंग, वेपथु, वैवर्ण्य , अश्व, अर  प्रलय नामौ आठ स्वात्तिक भाव हूंदन।  (7.94)

 

 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई

भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   

गढ़वाली काव्य म  भाव ; गढ़वाली नाटकों म भाव ;गढ़वाली गद्य म  भाव ; गढवाली लोक कथाओं म  भाव 

 

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