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Feb
22

कौशिकी वृति (केश/बाळ सजाण संबंधी ) आवश्यकता अर योजना

कौशिकी वृति (केश/बाळ  सजाण  संबंधी ) आवश्यकता अर योजना 

    (अप्सराओं , स्याति , नारद की नियुक्ति ) 

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय १ , पद /गद्य भाग ४१   बिटेन  ५१ तक

(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)

पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -  ८२

s = आधा अ

( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न)

पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित

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गढ़वळि  म सर्वाधिक अनुवाद करण वळ अनुवादक   आचार्य  – भीष्म कुकरेती   

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अपण सौ पूतों तै प्रशिक्षण दीणो  उपरांत , हे मुनिजन !  मीन भारती , सात्वती ,अर आरमटी वृतियों पर आश्रित उपक्रमों प्रयोग कार  अर बर्मा श्री समिण ग्यों , सिवा लगाणो परान्त मीन अपण  पूरी तैयार बाराम बताई। कौशिकी वृति भीं अभिनय अर मेरी तैयार सूणी  बर्मा श्रीन  बोली बल अभिनय म तुम यूं वृतियों दगड़  कौशिकी वृति बि ज्वाड़ो अर जु बि  आवश्यक च वो बि  बताओ . तब मीन बोली बल हे भगवन ! कौशिकी वृति जुड़नो हेतु आवश्यक द्रव्य (शिक्षा /ज्ञान ) द्यावो। यीं कौशिकी वृति तैं -जु नृत ,अंगहारों से पूर्ण रस अर भावों का व्यापारवळि  सुनदर वेश भूषा से सुसज्जित तथा श्रृंगार रस से उतपन्न हूण वळि च- तै मीन भगवान शिव नृत  अवशर पर देखि छौ।  पर यीं  कौशिकी वृति म स्त्रीपात्र  का बिन  पाठ नई खिले सक्यांद।  ४१ -४६ ।

तब महातेजस्वी अर सर्व व्यापी बर्मा श्रीन मानसिक संकल्प द्वारा नाट्य प्रयोग अर शोभावर्धन म चतुर अप्सराओं रचना कार अर  अभिनयो मितै देन।  ऊं अप्सराओं नाम छन – मंजुकेशी,सुकेशी,मिश्रकेशी,सुलोचना , सौदामनी,, देकदत्ता,देवसेना,मनोरमा , सुदति , सुंदरी,विदग्धा,विपुला, सुमाला,संतति, सुनंदा,सुमुखी ,मागधी, अर्जुनी,सरला ,केरला,धृति,नंदा,सुपुष्कला , तथा कलमा।  ४७ -५०   ।

स्याति व नारदै  भरत की सौ -सायता बान नियुक्ति -

अर तब बर्माश्रीन  स्वाति मुनि तैं  शिष्यों  सह अवनत  वाद्य यंत्रों  बजाणों अर नारद मुनि व गन्दर्भों तै गाणों न्युयक्त कार।  ये प्रकार कौशिकी वृति व वाद्य -गीत आदि साधन मिलण पर नाट्य  की पूर्ण रूप से , तैयारी, अपण  सौ पूतों  दगड भली भाँती समजिक  वेद अर वेदांगों क्र कारणभूत सृष्टि क स्वामी  पितामह समिण  स्याति अर नारदौ  संग खड़ा हों , तब मीन प्रार्थना कार – भगवन नाट्यौ ग्रहण व सिखण  कार्य पुअर ह्वे गे अब ब्वालो कि अग्वाड़ी  क्या करण ?।  ५० -५१ ।

 

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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई

भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा

भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

 

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