«

»

Apr
08

पूर्वरंग विधान

पूर्वरंग विधान 

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  तिसर ,  चौथो    ,  १ पद /गद्य भाग   बिटेन   १६ तक

(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)

पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -

 

 

s = आधा अ

( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )

पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित

-

गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक -   आचार्य  भीष्म कुकरेती   

-

ये प्रकार विधिवत पूजन उपरांत मीन पितामह बरमा  श्री से बोली – तुम शीघ्र आज्ञा द्यावो बल कु  नाटक खिले जाव ! I १।

तब पितामह न बोले – ब्यटा ! तुम अमृतमंथन नाटक ख्यालो।  नाटक डिवॉन तै भलो लगद अर उंकुण उत्साहवर्धी बि  च।  २।

हे विद्वान् ! मीन जै समवकार की रचना कार वो धर्म , काम  अर  अर्थ  को साधक च।  तुम अब ये नाटक का प्रयोग कारो।  ३।

ये समवकार का प्रस्तुत हूणो  उपरान्त दिबता अर दैत्यगण अभिनय , दृश्य , भावो , कल्पनाओं देखि  पुळेन।  ४।

तब कै समयम कमलयोनि ब्रह्मा श्रीन मे से बवाल – हमर अपर  ये नाटक तै महात्मा शंकर समिण दिखौला।  ५।

तब पितामह व देवगण भगवान शिवक निवास म गेन  अर विधिवत अर्चना उपरान्त उंन बोली – हे देवाधिदेव ! मीन जै समवकार की रचना कार वै  तै सुणनो  -दिखणो  कृपा कारो।  ६, ७ ।

भगवान शंकरन ब्रह्मा श्री से बोली – हम अवश्य दिखला।  तब ब्रह्मा श्रीन मीम ब्वाल – मुनि ये समवकार का प्रदर्शनै  तैयार कारो।  ८।

ये श्रेष्ठ मुनिगण  ! तब तब वे हिमालय पर्वतौ  प्रदेश पर जु  भौत सा पर्वतों से घिर्यूं छौ , जखम भौत सा भूतगण छा अर   जख  सुरम्य उड़्यारों  अर छिंछ्वड़ छा।  उख मीन पूर्वरंग विधान का उपरान्त  अमृतमंथन समवकार (नाटक ) व त्रिपुर दाह  नाटक डिम कु  प्रयोग कार।  ९ – १०।

तब सबि  भूतगण कार्य अर भावों प्रयोग देखि अति पुळेन अर भगवान शिवन  बि  अति  संतुष्ट ह्वेका ,   पितामह ब्रह्मा से ब्वाल- ।  ११।

हे महामते ! तुमन यु  नाटक  प्रयोग को श्रेष्ठ निर्माण कार जु यशदिंदेर , शुभ अर्थों साधक , पवित्र अर बुद्धि संवर्धक  च।  १२।

स्याम दैं  संध्या समय जब मीन नृत्य निर्माण कार तब मीन ये तै अंगहारों  (शरीर का हलण - चलण ) से जो करणों  से मीलि  निर्मित हूंदन युक्त करदा और बि  सुंदर छन।  तुम यूँ अंगहारों का नाटक पूर्वरंगविधि म प्रयोग कारो।  १३।

——– पूर्व रंगा   द्वी प्रकार -

वर्धमानक , आसारित,, गीत , महागीत , की अवस्था म एको भावों का  भल  प्रकार  से अभिनय कर   सकिल्या क्या  ?  तुमन जो पूर्व रंग प्रयुक्त कार वु  शुद्ध पूर्वरंग च पर जब वर्धमानक आदि  मिल जाला तो मिश्रण  से यु पूर्वरंग  चित्र पूर्वरंग ह्वे  जांद।  १४- १६ ।

 

 

 

-

सन्दर्भ – बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ – ८३ बिटेन  ८६

 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई

भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा

भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

 

Copy Protected by Chetans WP-Copyprotect.