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Sep
15

बाह्य जनित सूजन का कारण

बाह्य जनित सूजन का कारण 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  
 खंड – १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    ध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय )  १  पद  ३  बिटेन   तक 
  अनुवाद भाग -  १४० 
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती 
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 
ये से अगनै त्रिशोथिय अध्याय कु  व्याख्यान करला जन न बोलि  छौ।  १ -२।
शोथ या सूजन तीन प्रकारा  हूंदन – वातन , पित्तन , कफ़न जन्म्या सूजन।  यु तीन प्रकारौ शोथ फिर द्वी प्रकारौ हूंदन – १ शरीर म पैदा हूण  वळ निज  २ व  भैर से प्रभावित आगन्तु सूजन।  यूंमा आगन्तु शोथ छेदन , भेदन /फड़न , चूरा  करण ,भंजन या सर्जरी , भौत जोर कैक दबाण से , पीसण , लपेटन , चोट , मरण , बंधण , पीड़न आदि से हूंद।  या भिलाव क पुष्प रस से , कौंच की  फली से , रोंयेदार कीड़ा से , बिच्छू घास /कंडाळी पत्तों से , झाड़ -झंकारक स्पर्श से , आगन्तु शोथ पैदा हूंद।  अथवा विषयुक्त प्राणियों पसीना /मैल /मल से , शरीर पर चलण -फिरण से , विषैला  दाढ़ , ,सींग  नंग क प्रहार से , कृत्रिम विषयुक्त वायु से , वर्फ या ागक स्पर्श से हूंदन।  यी आगन्तु शोथ प्रथम कारणों से प्रकट होंदन।  आगन्तु शोथ से पैल लक्छण पैदा हूंदन अर बीमारी पैथर।  यी पट्टी , लेप , मंत्र ,ौषध प्रलेप , सेक आदि से या शोधन रोपणादि चिकित्सा से शांत हूंदन।  ३।
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २२०   बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम 
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