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Sep
16

शरीर जन्य शोथ ) सूजन कारण

 

 

शरीर जन्य  शोथ ) सूजन  कारण 

 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  

 खंड – १  सूत्रस्थानम अठारवां    अध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   )    पद   बिटेन      तक 

अनुवाद भाग -  १४१ 

गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती 

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 !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 

निज अर्थात शरीर क शोथ – स्नेह ,स्वेद , वमन , विरेचन ,आस्थापन , अनुवासन , शिरोविरेचन के अति या हीन अथवा मिथ्या योगन यूं कर्मों पैथर अपथ्य , वमन , अलसक ,विसूचिका , श्वास , खास , अतिसार , शोष , पाण्डु रोग , जौर , पुटुकौ रोग , प्रदर , भगंदर , प्रदर , अर्श रोगन  , संशोधन कर्म से , कुष्ठ , खाज ,पिडका आदि से , छींक , डंकार , शुक्र , मल , वायु क वेग रुकण से , संशोधन कर्मों से उतपन्न रोगों से , उपवासन ,शरीर क अधिक कर्षणन , एकदम से भारी , खट्टा नमकीन भोजन खाण से , पीठि  से बण्यू    भोजन से ,  फल , शाक , राग (रायता ), खीर , दही हरी भुज्जी , मद्य , धीमा मद्य , अंगर्यां अन्न , शूक धान्य ग्युं आदि , शामी धान्य ,उड़द , मूंग , जलचर प्राणियों सेवनन ,मिट्टी , कीचड़ , खाण से , बिंडी लूण खाणन , गर्भ पर दबाब से , गर्भपात से , प्रसव पश्चात , उचित परिचरय्या नि हूण से , दोषों बढ़न से शोथ उतपन्न हूंद।  यी शरीर जन्य साथ क लक्षण छन।  ४।

 

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य

संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २२०   बिटेन    तक

सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021

शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

 

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