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Sep
21

भिन्न भिन्न सूजनों /शोथुं  लक्षण 

भिन्न भिन्न सूजनों /शोथुं  लक्षण
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  
 खंड – १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    ध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   )   पद  ५   बिटेन  १०  तक 
  अनुवाद भाग -  १४२ 
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती 
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 
यूंमा इथगा  विशेष  च कि -शीत , रूखा ,लघु , विशद अन्न , खानपान , परिश्रम , उपवास , वामन , विरचनादि क भौत करणन अर अति  वर्त धरणन वायु कुपित ह्वेका त्वचा , ल्वे (रक्त ) ,अर मेड आदि धातुओं पर अधिकार करि शोथ उतपन्न कर दीन्द। यु वाट जन्य शोथ जल्दी उतपन्न हूंद अर उनी जल्दी समाप्त बि  ह्वे जांद।  एक रंग काळो , या लाल -काळो या स्वाभाविक रंगक रौंद।  यु शोथ गतिशील , धड़कन युक्त , कर्कश , कठोर , त्वचा फटण वळ , अर बाळ टुट जांदन।  रोगी तै इन लगद जन क्वी चिरणु हो ,  दबाणु हो , मेदन करणु ह्वावो , स्यूण घुप्याणो जन डाउ , किरमळुं चलण जन स्पर्श , लया बुरकण जन चलमलाट सि हूंद , सिकुड़द  अर फैलदो च।  यी वायु जनित शोथ क लक्छण छन।
गरम , तीक्छ्ण , कड़ु , छार ,लुण्या , अर खट्टो पदार्थों खाणन , अजीर्ण अवस्था म भोजन करणन , आग , घामक अति सेवनन , पित्त कुपित ह्वेका त्वचा , मांस , रक्त पर प्रबल ह्वेक शोथ पैदा करद।  यु शोथ जल्दी पैदा हूंद अर जल्दी शांत बि हूंद।  एक रंग काळो , पीलो ,  नीलो , ताम्बा रंग जन हूंद , स्पर्श गरम अर कोमल बाल लाल भूरो या तांबौ रंग जन ह्वे जांदन।  यु शोथ गरम हूंद अर जलन हूंद , पीड़ा दिंदेर अर तपाण वळ , गरम लगद, पसीना आंद ।  ना इ स्पर्श अर  ना इ गरमी सहन कर सकद।  यी पित्त जन्य शोथ क लक्छण छन।
भारी , मधुर , शीत , स्निग्ध , भोजनों से , ज्यादा सीण पर , व्यायाम नि करण पर , बलगम , कफ कुपित ह्वेक त्वचा , मांश , रक्त पर अधिकार कर लींद अर शोथ उतपन्न करद ।  इन शोथ देर से शुरू हूंद अर देर इ म शांत हूंद।  एक रंग धुमैला  या सफेद , स्नेहयुक्त (चिपुळ ) , भारी स्थिर , नि हलण वळ , गाढ़ो व बाळुं अगर भाग रंग सफेद ह्वे जांद। स्पर्श अर गरमी  सहन ह्वे जांद।   यु कफ /बलगम जनित शोथ लक्छण छन।  अपण अपण कारणों द्वी दोष कुपित ह्वेका द्वी दोषुं लक्छण वळ शोथ उतपन्न करदन।  ये हिसाबन संसजन्य शोथ तीन प्रकारौ छन।
तिनि दोषुं क मिलण से उत्तपन्न शोथ सन्निपातिक शोथ एक अलग शोथ च जाइका लक्छण तिनि दोषुं लक्छण हूंदन।
ये हिसाबन  प्रकृति भेद से शोथ द्वी प्रकारक – बाह्य व शारीरिक ; तीन प्रकारौ – वातज , पित्तज  अर कफज  ; चार प्रकारक – वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य अर सन्निपातजन्य; सात प्रकारौ – वातज , पित्तज , कफज अर वातपैत्तिक , वात श्लैष्मिक  पित्तश्लैष्मिक , अर सन्नीपातक हूंदन।  पर सूजन दृष्टि से एकि प्रकारौ हूंद अर्थात सब म सूजन सामन्य च।  ५ – १०।
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २२३   बिटेन  २२४   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम 
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