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Oct
21

दिनम सीणो नुक्सान

दिन में  , सोने से हानि 

दिनम सीणो नुक्सान 
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद  
 खंड – १  सूत्रस्थानम ,  इक्कीसवां   ध्याय  (  अष्टौनिंदितीय अध्याय   )   पद  ४३  बिटेन ५१   तक 
  अनुवाद भाग -  १७१ 
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती 
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!! 
ग्रीष्म ऋतू  रुखो हूंद, ये समय वायु बढ़द ,रात छुटि हूंदन , इलै दिनम सीण उत्तम च।  ग्रीष्म ऋतू छोड़ि हौर ऋतु म दिनम सीण से पित्त व कफ विकृत ह्वे जांदन।  इलै यूं ऋतुउं म दिनम सीण ठीक नी।  मेदस्यो , नित्य स्नेह क सेवन करदार , कफ प्रकृति , कफरोगी , दूषित विष से पीड़ित व्यक्ति ,तैं दिनम कदापि नि  सीण चयेंद।  दिनम सीणन हलीमक , शिरोवेदना , अंगुम भारीपन , अंगुंम नमि ढकणो प्रतीति , अंगुंम टूटन ,जठराग्नि की शिथलता , हृदय क कफ से लिप्त हूण , सूजन , अरुचि , वमन इच्छा , पीनस , कोठ , फुन्सी , खज्जी , तंद्रा , अळगस , गौळ क रोग , स्मृति नास , बुद्धि नाश , मूर्छा , स्रोतों क अवरोध , जौर , इन्द्रियों म असमर्थता , विष्क वेग मुंड तरफ , का  लक्छण  अहितकारी दिनम सीण से  उतपन्न हूंदन।  इलै बुद्धिमान मनिख तै अहितकारी दिनम सीणो त्याग करण चयेंद अर हितकारी निंदक सेवन कारो ।  रात म बिजण से रूखापन व दिन म बिजण से स्निग्धता बढ़ांद ।   बैठि बैठि सीण म ना त रूखापन ना हि स्निग्धता उतपन्न हूंदन।  शरीर कुण जन भोजन लाभकारी हूंद तनि निंद बि।  इलै स्थूलता (मोटापा ) व कृशता मुख्य रूप से आहार व निंद पर आश्रित हूंदन।
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २५३ -२५४
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम 
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