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Sep
15

जुगराज रयाँ भग्यान

गढ़वाळी कविता-*****जुगराज रयाँ भग्यान****

कवि- डॉ नरेन्द्र गौनियाल

जुगराज रयाँ भग्यान
ऊ सबि, जु अबी बि
गौं मा रैकि
खेती-पाती कना छन
हैळ लगैकी
पहाडे धरती तै
हैरी-भैरी रखणा छन
नवल़ा-धारों बिटि
पाणि ल्याणा छन
बणों मा गोर-बखरा चरांद
बंसुली बजाणा छन
छ्वै लगैकी
लारा धूणा छन
भ्यूंल कु गाळण बणेकि
मुंड धूणा छन
जु दाना-दीवाना
अग्यलु जल़ेकि
आग पळचाणा छन
भैयाँ चिलम बणाणा छन
कुटणा छन पिसणा छन
गोर-गोठ करणा छन
नौना पिट्ठू-गुलीडंडा ख्यलणा छन
नौनि बट्टा-गिट्टा ख्यलणा छन

जु बैद अबी बि
जड़ी-बूटी,चूरण-काढ़ा दीणा छन
जु औजी अबी बि
लारा सिलणा छन
ढोल बजाणा छन,चैत मंगणा छन
जु रुडिया अबी बि
बांस-रिंगाळ कि कंडी
सुप्पी-ड्वलणि बणाणा छन
जु कोळी अबी बि
क्वलड़ा मा राडू-लया अटेरणा छन
जु लुहार अबी बि
अणसेल़ा मा कुटल़ा-दथड़ा पल्य़ाणा छन
जु नौनि-नौना
फुल संगरांद का दिन फूल ख्यलणा छन
जें दादी का कंदुड़ा मा
मुरख्ला-मुंदड़ा छन
जें ब्वे का गौलुन्द हंसूळी
हाथों मा चांदी का धगुला छन
जें तिबारी मा अबी बि
बीरा भैणि अर सात भयों कि कथा लगणी छन
जु अबी बि थड्या-चौफुला लगाणा छन
जु अबी बि कंडाळी कु साग
मंडुवा कु टिक्कड़ खाणा छन
जु प्रवासी रिटैर हूणा का बाद हर्बि
अपणी मातृभूमि पहाड़ मा आणा छन

डॉ नरेन्द्र गौनियाल .सर्वाधिकार सुरक्षित ..narendragauniyal@gmail.com

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