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Nov
07

अभिन्दन

शिखरों पर फैलती प्रकाश
करता भोर का अभिनन्दन
बन-उपबन में भेद तम को

प्राण फूंकती प्रभाती किरण
रात्री का ब्याकुल अकुलाता छण
तब करता शुभ प्रभात का
अभिनन्दन …………………… !

खग के, कल कल करते कलरब
देबाल्यो से आते प्रभाती स्वर
ब्योम पर तैरती सिंदूरी रंग
देती नव सुबहो को आमंत्रण !

सरिता बहती अल्हड नव युवगना सी
मेरु हर्षित होते बाल पुलकित सी
बेग उन्मत होकर करती आलिंगन
उस सृष्ठी की पहली पहर का …
धरती करती तिलक उस पवित्र पल का !

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