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Nov
10

दुबिधा

कोई तो पथ मिले मुझे एसा
जिस पर गमन करूँ …
कोई तो सुरत मिले मुझे ऐसी

जिसको नमन करूं !पथभ्रष्ट यहाँ है , पथ और पथिक
किसको क्या कहूँ ……
दो राहें , चौराहे भ्रमित करते मुझको
किस पे बिश्वास करूँघात /प्रतिघातो के आघातों से
पीड़ित और बिचलित हूँ ,,
शंशय और शंकाओं से घिरा
स्याम से क्या कहूँ
मिरगत्रिष्णये बनी भावनाये
किस पर शेष रहूँ !

व्यंग और अट्हासोके बीच
परिहास सा बना हूँ मै
मधु और मदिरा के बीच
सकी जैसा प्यासा हूँ मै
परितार्णाये देती उल्ल्हने
मुझको अब मै क्या करूं !

सुरत और सीरत के छलवों ने छला
भंवर सा भटक गया हूँ मै …
नभ में स्वछन्द बिचरित डोलती
पवन सा डोल गया हूँ मै
सागर सा मन मंथन कर
तोड़ गया सीमाए ..
सीमाओं का क्या करूं !

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