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Sep
21

डर

बंद कीजिये खिड़कियाँ
रौशनी से हम तो डर ने लगे
खिडकियों से रौशनी क़ि जगह

दबे पाऊं अबतो दर्द आने लगे !

खुली छत के नीचे जब से
हादसों पे हादसे घटे
कांपते है पाऊ मेरे
अब तो देहलीज को भी लांघते
जिद ना कीजिये रौशनी के लिए
अब तो बंद कमरे भी हमको
रास आने लगे है !

अपने चेहरों पे भी थी कभी
ताजक्गी , रवानगी ….
सूर्य जैसा तम था ,
थी चांदनी जैसी सादगी
बक्त की थपेड़ो के मार की मार से
अब तो आयनों में अक्ष अपना
देखने से डरने लगे …. !

आँख है कसूर वार
दिल की इस तबाही में
अपना हाथ भी है कुछ
अपनी ही तबाही में
डरके डरसे इतने डर गए है हम

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